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सोमवार, 28 जनवरी 2013

स्वास्थ संजीवनी

गतिशीलता ही जीवन है और गतिहीनता ही मृत्यु। गतिशील जीवन ही भविष्य में पल्लवित और पुष्पित होता हुआ संसार को सौरभमय बना देता है।मन की प्रफुल्ता से हमारा स्वास्थ भी सुन्दर और निरोग रहता है।जीवन जीना और स्वस्थ रहना एक मानवीय आवश्यकता के साथ साथ एक कला भी है ,यदि सही तरीके से कुछ नियमानुसार जिन्दगी को ढाल ले तो बहुत हद तक हम सुखी एंव निरोग रह सकते है। जैसे की कोई भी काम एक प्लान के अनुसार शुरू करते हैं उसी प्रकार हमारी दिनचर्या या जीवन शैली भी एक प्लान के अनुसार होनी चाहिए। आज हम इन्ही कुछ खास बिन्दुओ पर प्रकाश डालेंगे।
  1. सूर्योदय से दो घंटे पहले हमे अवश्य जग जाना चाहिए।देर तक सोना स्वस्थ के लिए बहुत ही हानिकारक है।इस समय प्रकृति मुक्तहस्त से स्वास्थ्य,प्राणवायु, प्रसन्नता, मेघा, बुद्धि की वर्षा करती है। 
  2. सुबह उठ कर तांबे के लोटे में भरा पानी का सेवन जो रात्रि में ही रखा हो करना चाहिए,कम से कम दो ग्लास की मात्रा होनी चाहिए। बासी मुँह 2-3 गिलास शीतल जल के सेवन की आदत सिरदर्द, अम्लपित्त, कब्ज, मोटापा, रक्तचाप, नैत्र रोग, अपच सहित कई रोगों से हमारा बचाव करती है।
  3. नित्य क्रिया के पश्चात सुबह में एक मील तक टहलने अवश्य ही जाये। उसके बाद प्राणायाम,आसन और व्यायाम 15 से 20 मिनट करना चाहिए।
  4. प्रतिदिन हो सके तो गुनगुने पानी से रगड़  रगड़ स्नान करना सेहत के लिए बहुत ही लाभदायक है। स्नान के समय सर्वप्रथम जल सिर पर डालना चाहिए, ऐसा करने से मस्तिष्क की गर्मी पैरों से निकल जाती है
  5. सूर्य स्नान भी शरीर के लिए बहुत ही लाभप्रद है।इससे प्राकृतिक रूप से विटामिन 'डी' की प्राप्ति होती है। सुबह में आधे घंटे धुप में बैठे।
  6. हो सके तो प्रतिदिन नही तो सप्ताह में सरसों तेल या ओलिव आयल से शरीर की अच्छी तरह से मालिस करनी चाहिए।
  7. सुबह का नास्ता  सुपाच्य और पौष्टिक होना चाहिए।सुबह में नास्ते  की आदत अवश्य डाले।
  8. भोजन करने से पूर्व हाथ की अच्छी तरह से साफ कर  लेना नितांत आवश्यक है।
  9. ठूस ठूस कर  खाने से बचना चाहिए। हमेश भोजन भूख से कम ही करना बेहतर है।
  10. भोजन हमेशा शांतचित  होकर करना चाहिये। प्रत्येक निवाला को खूब चबा चबाकर  खाना चाहिए।
  11. भोजन करने के क्रम में बार बार पानी नही पीनी चाहिये। आवश्यकता के अनुसार  दो-चार घूंट पी  सकते हैं। भोजन करने के लगभग 45 मिनट बाद ही पानी पीनी चाहिये। एक बात और भोजन से पहले भी पानी का  सेवन न करे,नही तो जठराग्नि मंद पड़ जाती है।
  12. सुलभता के अनुसार भोजन में सलाद, हरी साग-सब्जी,और मौसमी फलो का सेवन करना चाहिए।
  13. भोजन के अंत में मठ्ठा का सेवन भी पाचन के लिए लाभप्रद है।
  14. भोजन के बाद  हाथ और दाँतों  की अच्छी तरह सफाई करनी चाहिये। भोजन के बाद  लघुशंका कर  थोड़ी देर टहलना भी चाहिए।
  15. भोजन करते समय ढीले ढाले वस्त्रों को ही धारण करना चाहिए।
  16. प्रकृति विरुद्ध,मौसम विरुद्ध और  शरीर विरुद्ध भोजन से वचना चाहिए। भोजन ज्यादा गरम  या ज्यादा ठंडा भी नही होना चाहिए। बसी भोजन से परहेज करना चाहिए।
  17. सप्ताह में एक दिन उपवास भी आवश्यक है,उस दिन अन्न का सेवन न करें,कुछ फल के रस का ही सेवन करें।इससे हमारा स्वास्थ ठीक रहता है,पेट सबंधी बीमारियों से बचाव होता है।
  18. भोजन के तुरंत बाद सोना कई बिमारियों को न्योता देना है।
  19. रात्रि का भोजन सोने के तीन  घंटे पहले करें। यदि रात्रि फल, दूध  लेना है तो भोजन के एक घंटे बाद लें।
  20. खाने के तुरंत बाद सहवास से बचना चाहिए। सहवास के तुरंत बाद शिशु को माँ का दूध वर्जित है।
  21. सोने से पहले हाथ-पैर धोकर पोंछ ले, अपने इष्टदेव का स्मरण करते हुए सो जाएँ। सर्वप्रथम चित होकर दस सांसे ले,फिर दायें करवट छः गहरी सांसे लें,फिर बायीं करवट लेकर सो जाएँ।
  22. सोने के समय मुहँ ढँक कर  नही सोना चाहिए। सोने का कमरा भी हवादार हो बहुत ही अच्छा।
  23. सोने से पहले संगीत सुनना  भी लाभप्रद है।
  24. यदि स्वस्थ रहना है तो शराब,धूम्रपान और बुरे व्यसनों से दूर रहना चाहिए।
  25. दिन में सोने से जठराग्नि मंद पड़ जाती है।जिससे शरीर में भारीपन,शरीर टूटना,जी  मिचलाना ,सिरदर्द,ह्रदय में भारीपन अदि लक्षण उत्पन्न हो जाते है।
  26. रात्रि जागरण से वात की वृद्धि होती है,जिससे शरीर रुक्ष होता है।बैठे बैठे थोड़ी  झपकी लेना स्वास्थ  के लिए अच्छा है।
  27.  दिन में 2 बार मुँह में जल भरकर, नैत्रों को शीतल जल से धोना नेत्र दृष्टि के लिए लाभकारी है।
  28. नहाने से पूर्व, सोने से पूर्व एवं भोजन के पश्चात् मूत्र त्याग अवश्य करना चाहिए। यह आदत आपको कमर दर्द, पथरी तथा मूत्र सम्बन्धी बीमारियों से बचाती है।
  29. भोजन के प्रारम्भ में मधुर-रस (मीठा), मध्य में अम्ल, लवण रस (खट्टा, नमकीन) तथा अन्त में कटु, तिक्त, कषाय (तीखा, चटपटा, कसेला) रस के पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
  30. स्वास्थ्य चाहने वाले व्यक्ति को मूत्र, मल, शुक्र, अपानवायु, वमन, छींक, डकार, जंभाई, प्यास, आँसू नींद और परिश्रमजन्य श्वास के वेगों को उत्पन्न होने के साथ ही शरीर से बाहर निकाल देना चाहिए।


     (नोट:आपकी अच्छी दिनचर्या के इंतजार में, आपका परामर्श सर आँखों पर।)

    8 टिप्‍पणियां:

    1. अति उत्तम परामर्श है आपका कुछ नियमो का पालन तो पहले से ही करता हु , कुछ नियमो का पालन करने की कोर्शिस जरूर कँरूगा । इसमे एक नियम तो ऐसा है जिसकी जानकारी मुझे बिलकुल नही थी ।

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    2. Achche nushkhe diye....karne wale to khush na karnewalon k liye naseehat..

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    3. इतना करना इतना मुश्किल हैँ कि क्या कहे कितना मुश्किल थोडा ढीला कर दो नियम इसे रोज रोज पालन करे तो ये जिँदगी एक T.V का सिरियल लगने लगेगा




      बातोँ मे तो भुल ही गया कि


      बहुत अच्छा पोस्ट मधुर जानकारी ।

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    4. बहुत अच्छी प्रतुति आपने दी हार्दीक धन्यबाद

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    5. स्वास्थ पर इतनी सुंदर जानकारी दी मन बाग बाग हो गया,बहुत बहुत धन्यबाद।

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    6. स्वास्थ पर सुंदर जानकारी दी,बहुत धन्यबाद।

      उत्तर देंहटाएं

    इस जानकारी की सटिकता, समयबद्धता और वास्‍तविकता सुनिश्‍चित करने का हर सम्‍भव प्रयास किया गया है । हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्‍सक से अवश्‍य संपर्क करें। हमारा उद्देश्‍य आपको रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी मुहैया कराना मात्र है। आपका चिकित्‍सक आपकी सेहत के बारे में बेहतर जानता है और उसकी सलाह का कोई विकल्‍प नहीं है।हमारी जानकारी-आपका विचार.आपकी मार्गदर्शन की आवश्यकता है, आपकी टिप्पणियाँ उत्साहवर्धन करती है....आभार !!!