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शनिवार, 8 मार्च 2014

"बीमारी और परहेज"

संतुलित भोजन  का सीधा कनेक्शन हमारी सेहत के साथ है। संतुलित भोजन से न सिर्फ बीमारियों से बचा जा सकता है ,बल्कि बीमार होने के बाद रिकवरी भी जल्दी हो सकती है। क्रॉनिक और लाइफस्टाइल बीमारियों में अच्छी डायट की भूमिका और बढ़ जाती है। एक्सपर्ट्स की सलाह से हम बता रहे हैं , कुछ आम बीमारियों में डायट क्या हो।खाद्य पदाथों को नजरंदाज करके और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करके आप ज्यादा जल्दी ठीक हो सकते हैं और बीमारी के लक्षणों को काफी हद तक कम कर सकते हैं। आइये जानते हैं कि वे कौन से आहार हैं जिन्‍हें बीमार पड़ने पर कभी नहीं खाने चाहिये, नहीं तो तबियत और भी ज्‍यादा खराब हो जाती है।

जो खान पान हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है या जो रोग बढ़ाने में सहायक है या वह रहन सहन जो रोग को बढ़ाने में मदद करते है उनको अपनाने का नाम ही परहेज है।  हमारे शरीर में जो रोग होते है वे मुख्यतः वात, पित्त, कफ की श्रेणियों में आते है। जैसे खांसी, जुकाम, फोड़े-फुंसी, कफ के दायरे में आते है। ऐसे में कफ को बढ़ाने वाली वस्तुओ जैसे – चावल, दही, केला आदि से परहेज जरूरी है इसके बाद पित्त आता है। अरीर्ण, जलन, अधिक प्यास, घवराहट, खुश्की पित्त के लक्षण होते है अत: तेज धुप, गर्मी, अधिक मेहनत, शोर शराबा, गर्म व खुश्क तासीर की चीजों से बचना इसका परहेज है। आइये अब कुछ बिमारियों में पथ्य और अपथ्य भोजन पर चर्चा करते हैं। 
डायबीटीज़ :
शुगर के मरीजों के लिए जरूरी है कि वे बैलेंस्ड डायट लें। ज्यादा न खाएं , लेकिन तीनों वक्त खाना खाएं और बीच में दो बार स्नैक्स भी लें। उन्हें प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का अच्छा कॉम्बिनेशन लेना चाहिए। मसलन , नाश्ते में दूधवाला दलिया लें या फिर ब्रेड के साथ अंडा लें। इसी तरह खाने में सब्जी के साथ दाल भी लें। इससे शुगर का लेवल सही रहता है। असल में , कार्बोहाइड्रेट से शुगर जल्दी बनती है , जबकि प्रोटीन से धीरे-धीरे शुगर रिलीज़ होती है , जिससे ज्यादा देर तक पेट भरा हुआ लगता है और ज्यादा खाने से बच जाते हैं। कुल खाने की 55-60 फीसदी कैलरी कार्बोहाइड्रेट से , 15-20 फीसदी प्रोटीन से और 15-20 फीसदी फैट से मिलनी चाहिए। ज्यादा तला-भुना न खाएं। 

- लो ग्लाइसिमिक इंडेक्स वाली चीजें यानी जो शरीर में जाकर धीरे-धीरे ग्लूकोज़ में बदलती हैं , खानी चाहिए। इनमें हरी सब्जियां , सोया , मूंग दाल , काला चना , राजमा , ब्राउन राइस , अंडे का सफेद हिस्सा आदि शामिल हैं। 

- खाने में करीब 20 फीसदी फाइबर जरूर होना चाहिए। गेहूं से चोकर न निकालें। लोबिया , राजमा , स्प्राउट्स आदि खाएं क्योंकि इनसे प्रोटीन और फाइबर दोनों मिलते हैं। स्प्राउट्स में ऐंटि-ऑक्सिडेंट भी काफी होते हैं। 

- दिन भर में 4-5 बार फल और सब्जियां खाएं लेकिन एक ही बार में सब कुछ खाने की बजाय बार-बार थोड़ा-थोड़ा करके खाएं। फलों में चेरी , स्ट्रॉबेरी , सेब , संतरा , अनार , पपीता , मौसमी आदि और सब्जियों में करेला, घीया , तोरी , सीताफल , खीरा , टमाटर आदि खाएं। 

- रोजाना एक मुट्ठी ड्राइ-फ्रूट्स खाएं यानी 10-12 बादाम या 5-7 बादाम और 3-4 अखरोट खा सकते हैं। 

- घीया , करेला , खीरा , टमाटर , अलोवेरा और आंवला का जूस खास फायदेमंद है। 

- लो फैट दही और स्किम्ड/डबल टोंड दूध लेना चाहिए। ग्रीन टी पीना अच्छा है। चाय के साथ हाई फाइबर बिस्किट या फीके बिस्किट ले सकते हैं। बीपी नहीं है तो नमकीन बिस्किट भी खा सकते हैं। 

- जौ (बारले) , काला चना , मूंग दाल और जामुन खासतौर पर फायदेमंद हैं। इनका ग्लाइसिमिक इंडेक्स भी कम है और ये पित्त के इंबैलेंस को कम करने के साथ-साथ अगर अंदर सूजन हो गई है तो उसे भी कम करते हैं। 

- काला नमक डालकर छाछ पिएं। नारियल पानी पिएं। घर में बने सूप पिएं। 

- नीम-करेला पाउडर ले सकते हैं। हालांकि इसका कोई फौरी फायदा नहीं होता कि कोई उलटा-सीधा खाने के बाद सोचे कि दो चम्मच नीम-करेला पाउडर खा लेंगे तो ठीक हो जाएगा। यह गलत है। लेकिन लंबे वक्त में यह जरूर फायदा पहुंचाता है। 

परहेज करें 
- चीनी , शक्कर , गुड़ , गन्ना , शहद , चॉकलेट , पेस्ट्री , केक , आइसक्रीम आदि मीठी चीजें न खाएं। 

- हाई ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाली चीजों से बचें क्योंकि ये जल्दी ग्लूकोज में बदल जाती हैं। इससे शरीर में शुगर एकदम से बढ़ जाता है। ऐसे में इंसुलिन को शुगर कंट्रोल करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है। इनमें प्रमुख हैं मैदा , सूजी , सफेद चावल , वाइट ब्रेड , नूडल्स , पिज़्ज़ा , बिस्किट , तरबूज , अंगूर , सिंघाड़ा , चीकू , केला, आम , लीची आदि। 

- पूरी , पराठें , पकौड़े आदि न खाएं। इनसे वजन के साथ-साथ कॉलेस्ट्रॉल भी बढ़ता है। 

- जूस से बचना चाहिए क्योंकि इनमें शुगर की मात्रा ज्यादा होती है। पैक्ड जूस बिल्कुल न लें। सीधे फल खाना ज्यादा फायदेमंद है। 

- सब्जियों में आलू , अरबी , कटहल , जिमिकंद , शकरकंद , चुकंदर न खाएं। इनमें स्टार्च और कार्बोहाइड्रेट काफी ज्यादा होता है , जो शुगर बढ़ा सकते हैं। वैसे , इन्हें उबाल कर कभी-कभी खाया जा सकता है लेकिन फ्राई करके कभी न खाएं। 

- फलों में आम , चीकू , अंगूर , केला , पाइन ऐपल , शरीफा आदि से परहेज करें क्योंकि इनमें शुगर काफी ज्यादा होती है। 

- मैदा और मक्के का आटा न खाएं। इनका ग्लाइसिमिक इंडेक्स ज्यादा होता है और ये रिफाइन भी होते हैं। 

- वाइट राइस की बजाय ब्राउन राइस खाएं। चावलों का मांड निकालकर खाना सही नहीं है क्योंकि इससे सारे विटामिन और मिनरल निकल जाते हैं। 

- ऐनिमल फैट (मक्खन , पनीर , मीट आदि) कम कर देना चाहिए। 

- शराब डॉक्टर की सलाह पर ही पीएं। खाली पेट बिल्कुल न पीएं। इससे हाइपोग्लाइसीमिया (शुगर लेवल का एकदम नीचे गिर जाना) हो सकता है। ज्यादा शराब पीने से यूरिक एसिड और ट्राइग्लाइसराइड बढ़ता है और शुगर को कंट्रोल करना मुश्किल होता है। 

नोट : शुगर के इलाज में डायट का रोल 60 फीसदी है। बाकी 40 फीसदी एक्सर्साइज और स्ट्रेस मैनेजमेंट पर निर्भर करता है। 

कॉलेस्ट्रॉल 
कॉलेस्ट्रॉल के मरीजों को हेल्थी और बैलेंस्ड डायट लेनी चाहिए। वजन कंट्रोल में रखने के लिए उन्हें कम कैलरी खानी चाहिए। ध्यान देनेवाली बात यह है कि कॉलेस्ट्रॉल के कई मरीज फैट पूरी तरह बंद कर देते हैं। यह सही नहीं है क्योंकि शरीर के लिए फैट्स भी जरूरी हैं , बस क्वॉलिटी और क्वॉन्टिटी का ध्यान रखें। 

- तेलों का सही बैलेंस जरूरी है। एक दिन में कुल तीन चम्मच तेल काफी है। तेल बदल-बदल कर और कॉम्बिनेशन में खाएं , मसलन एक महीने सरसों और मूंगफली का तेल यूज करें तो दूसरे महीने रिफाइंड और कनोला का। ये सिर्फ उदाहरण हैं। आप अपनी पसंद से कॉम्बिनेशन बना सकते हैं। कॉम्बिनेशन और बदल-बदल कर तेल खाने से शरीर को सभी जरूरी फैट्स मिल जाते हैं। ऑलिव ऑइल यूज करें। इससे कॉलेस्ट्रॉल कम होता है , लेकिन इसे ज्यादा गरम न करें। इसे सलाद आदि पर डालकर खा सकते हैं। 

- ऐसी चीजें खाएं , जिनमें फाइबर खूब हो , जैसे कि गेहूं , ज्वार , बाजरा , जई आदि। दलिया , स्प्राउट्स ,ओट्स और दालों के फाइबर से कॉलेस्ट्रॉल कम होता है। आटे में चोकर मिलाकर इस्तेमाल करें। 

- हरी सब्जियां , साग , शलजम , बीन्स , मटर , ओट्स , सनफ्लावर सीड्स , अलसी आदि खाएं। इनसे फॉलिक एसिड होता है , जो कॉलेस्ट्रॉल लेवल को मेंटेन करने में मदद करता है। 

- अलसी , बादाम , बीन्स , फिश और सरसों तेल में काफी ओमेगा-थ्री होता है , जो दिल के लिए अच्छा है। 

- मेथी , लहसुन , प्याज , हल्दी , बादाम , सोयाबीन आदि खाएं। इनसे कॉलेस्ट्रॉल कम होता है। एक चम्मच मेथी के दानों को पानी में भिगो लें। सुबह उस पानी को पी लें। मेथी के बीजों को स्प्राउट्स में मिला लें , उसमें फाइबर होता है। 

- एचडीएल यानी गुड कॉलेस्ट्रॉल बढ़ाने के लिए रोजाना पांच-छह बादाम खाएं। इसके अलावा ओमेगा थ्री वाली चीजें अखरोट , फिश लीवर ऑयल , सामन मछली , फ्लैक्स सीड्स (अलसी के बीज) खाने चाहिए। 

- कॉलेस्ट्रॉल लिवर के डिस्ऑर्डर से बढ़ता है। लिवर को डिटॉक्सिफाइ करने के लिए अलोवेरा जूस , आंवला जूस और वेजिटेबल जूस लें। इन तीनों को मिलाकर रोजाना एक गिलास जूस लें। कॉलेस्ट्रॉल ज्यादा है तो दिन में दो गिलास भी पी सकते हैं। 

- नारियल पानी पीएं। शहद ले सकते हैं क्योंकि इससे इम्युनिटी बढ़ती है। 

परहेज करें 
- तला-भुना खाना न खाएं। भाप में पकाकर खाना खाएं। देसी घी , डालडा , मियोनिज , बटर न लें। बिस्किट ,कुकीज , मट्ठी आदि में काफी ट्रांसफैट होता है , जो सीधा लिवर पर असर करता है। उससे बचें। 

- प्रोसेस्ड और जंक फूड से बचें। पेस्ट्री , केक , आइसक्रीम , मीट , पोर्क , भुजिया आदि से भी परहेज करें। 

- फुल क्रीम दूध और उससे बना पनीर या खोया न खाएं। 

- नारियल और नारियल के दूध से परहेज करें। इसमें तेल होता है। 

- उड़द दाल , नमक , और चावल ज्यादा न खाएं। कॉफी भी ज्यादा न पिएं। 

नोट : खूब एक्सर्साइज करें क्योंकि सिर्फ खाने से बहुत फायदा नहीं होता। दवाओं खासकर पेनकिलर दवाओं और स्टेरॉइड क्रीम/इंजेक्शन का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह पर ही करें , क्योंकि इनका लिवर पर सीधा बुरा असर हो सकता है और शरीर में पानी भी रुक सकता है। स्टेरॉइड हॉर्मोंस होते हैं और इनका इस्तेमाल इनफर्टिलिटी ,सर्जरी , साइनस आदि में परेशानी बढ़ने पर होता है। शराब या सिगरेट पीने से बचें। लिवर और कॉलेस्ट्रॉल के बीच सीधा संबंध है। लिवर को ठीक रखना जरूरी है क्योंकि लिवर ठीक है तो कॉलेस्ट्रॉल बढ़ेगा ही नहीं। दूसरी ओर , कॉलेस्ट्रॉल ज्यादा है तो फैटी लिवर हो सकता है। 

हाई ब्लड प्रेशर 
हाई बीपी दिल की बीमारी का इशारा हो सकता है। डायट में सैचुरेटिड फैट जैसे कि मक्खन , घी , मलाई आदि कम करें क्योंकि इससे दिल की नलियों के संकरा होने का खतरा बढ़ जाता है। जितना हो सके , लो फैट डायट लें।

- कैल्शियम , मैग्नीशियम और पोटैशियम आदि प्रचुर मात्रा में खाएं। ये तत्व दूध , हरी सब्जियां , दालें , संतरा ,स्ट्रॉबेरी , खुबानी , बादाम , केला और सीताफल आदि में खूब मिलते हैं। 

- सूप , सलाद , खट्टे फल , नीबू पानी , नारियल पानी , काला चना , लोबिया , अलसी , आडू , सोया आदि खाना फायदेमंद है। 

- गाजर , पत्ता गोभी , ब्रोकली , पालक , कटहल , टमाटर , लहसुन , प्याज और पत्तेदार सब्जियां खाएं। मौसमी फल खूब खाएं। 

- पानी खूब पीएं। दिन भर में करीब 10 गिलास पानी पिएं। 

- ओमेगा थ्री वाली चीजें , जैसे कि अखरोट , बादाम , फिश ऑयल , अलसी आदि खाएं। रोजाना पांच-सात बादाम और 3-4 अखरोट जरूर खाएं। 

- बीपी के लिए इन दिनों DASH डायट यानी डायट्री अप्रोचिस टु स्टॉप हाइपरटेंशन खूब चलन में है। इसमें क्या न खाएं से ज्यादा जोर इस बात पर होता है कि क्या खाएं। इसे अमेरिकन हार्ट असोसिएशन के साथ-साथ इंडियन नैशनल कैंसर इंस्टिट्यूट ने भी रेकमेंड किया है। इसमें दिन भर में एक किलो तक फल-सब्जियां और कार्बोहाइड्रेट व लो फैट मिल्क प्रॉडक्ट्स पर खूब जोर होता है। 

परहेज करें 
- नमक कम खाएं। दिन में करीब आधा चम्मच नमक काफी है। टेबल सॉल्ट यूज न करें। दिन भर में आधा चम्मच के करीब नमक खाएं। यह हमें खाने से आसानी से मिल जाता है। वैसे , अनाज , फल , सब्जियों आदि से भी हमें नैचरल तरीके से नमक मिल जाता है। हफ्ते में एक बार बिना नमक के खाने की आदत डालें। 

- सॉस , अचार , चटनी , अजीनोमोटो , बेकिंग पाउडर आदि से परहेज करें। पापड़ भी बिना नमक वाला खाएं। 

- पैक्ड या फ्रोजन आइटम न खाएं। इनमें प्रिजरवेटिव होते हैं और नमक भी ज्यादा होता है। इसी तरह बेकरी आइटम्स में सैचुरेटिड फैट ज्यादा होता है। चिप्स , बिस्कुट , भुजिया , कुकीज , फ्रोजन मटर , केक , पेस्ट्री आदि से बचें। 

- खाने में ऊपर से नमक न मिलाएं। सलाद , रायते आदि में भी नमक न डालें। 

- नियमित रूप से नॉन वेज खासकर हेवी नॉन वेज (रेड मीट आदि) खाने से बीपी की आशंका बढ़ जाती है। 

नोट : बीपी कंट्रोल करने में डायट का रोल 50 फीसदी है। स्ट्रेस मैनेजमेंट और एक्सर्साइज से बाकी फायदा मिलता है। योगासन , प्राणायाम और मेडिटेशन करें। भ्रामरी प्राणायाम खासतौर से फायदेमंद है। 

लो ब्लडप्रेशर 
लो बीपी में खाने का कोई खास परहेज नहीं होता। उन्हें हेल्थी चीजें खानी चाहिए और तीनों वक्त खाना और दो बार स्नैक्स लेने चाहिए। इन्हें ध्यान रखना होगा कि खाने की क्वॉलिटी के साथ क्वॉन्टिटी भी अच्छी हो , यानी भरपूर खाएं। कम खाने से बीपी और लो हो सकता है। 

- अगर बीपी एकदम लो हो गया है तो कॉफी या चाय पी लें। इससे फौरी राहत मिलती है और चाय-कॉफी में मौजूद टेनिन व निकोटिन बीपी को बढ़ा देता है। लेकिन लंबे समय में इसका कोई फायदा नहीं होगा। 

- नॉर्मल बैलेंस डायट लें। स्प्राउट्स , दालें , काला चना , फल या सब्जियां खूब खाएं। हर दो-तीन घंटे में हल्का-फुल्का खाएं। इससे बीपी में बहुत उतार-चढ़ाव नहीं होगा। 

- केसर , खजूर , केला , दालचीनी और काली मिर्च खाएं। 

- पानी खूब पीएं। दिन में 10-12 गिलास पानी जरूर पीएं। अगर मरीज के अंदर सोडियम लेवल कम है तो डॉक्टर उससे डायट में नमक बढ़ाने को कहते हैं। 

नोट : एक्सर्साइज न करने से बीपी लो हो सकता है। नियमित रूप से एक्सर्साइज जरूर करें। 

हेपटाइटिस 
हेपटाइटिस ए , बी , सी , डी और ई के मरीजों को नॉर्मल हेल्थी डायट लेनी चाहिए। किसी भी हेपटाइटिस में खाने का खास परहेज नहीं होता। बस , सिरोसिस होने पर नमक कम खाना बेहतर होता है। बहुत तला-भुना खाना नहीं खाना चाहिए। इससे लिवर पर दबाव पड़ता है। कार्बोहाइट्रेड खूब खाने चाहिए और उनके मुकाबले प्रोटीन थोड़े कम क्योंकि इन्हें पचाने के लिए लिवर को काफी मेहनत करनी पड़ती है। हालांकि मरीज की लिवर की स्थिति देखकर भी डॉक्टर प्रोटीन की मात्रा तय करते हैं। ज्यादातर लोग मानते हैं कि उन्हें हेल्थी और तेल नहीं लेना चाहिए , जो कि सही नहीं है। 

- हाई कार्बोहाइड्रेट और मीठी चीजें खाएं , जैसे कि केला , चीकू , आलू , शकरकंद , जैम , ग्लूकोज , रूहअफजा आदि। मीठे में कार्बोहाइड्रेट ज्यादा होते हैं , जिनसे एनर्जी ज्यादा मिलती है और लिवर पर भी जोर नहीं पड़ता। 

- ऐनिमल प्रोटीन के मुकाबले वेजिटेबल प्रोटीन ज्यादा खाएं। जैसे कि मूंग दाल , काला चना , लोबिया , अरहर ,मलका मसूर आदि। मूंग दाल खासतौर से फायदेमंद है। खिचड़ी में भी डालकर खा सकते हैं। 

- गाय का फैट-फ्री दूध और छाछ ले सकते हैं। दूध से बने हुए कस्टर्ड , खीर आदि भी फायदेमंद है। 

- खिचड़ी , दलिया , चावल , रोटी , मक्का , सूप , उपमा , पोहा , इडली आदि खाएं। मीठे फल खूब खाएं। सब्जियों में हरी सब्जियां , आलू और जिमिकंद खाएं। 

- सलाद को हल्का भाप में पका लें। इससे इनफेक्शन होने का खतरा कम होता है। 

- फ्रेश जूस , सोया मिल्क और नारियल पानी पिएं। 

- तला-भुना न खाएं। इससे पहले से कमजोर हो चुके लिवर पर प्रेशर पड़ता है। 

- गैस बनानेवाली चीजें जैसे राजमा , छोले , उड़द दाल आदि कम खाएं। 

- नमक कम कर दें। खासकर सिरोसिस है तो नमक बेहद कम कर दें। ज्यादा खाने से शरीर में पानी जमा हो सकता है। 

- कच्ची सब्जियां खाने से बचना चाहिए। इससे इनफेक्शन होने की आशंका बढ़ जाती है। 

- शराब पीना बिल्कुल बंद कर दें। इलाज के बाद अगर डॉक्टर इजाजत दे तो ही शराब पिएं और वह भी लिमिट में। 

नोट : शरीर के बाकी अंगों के मुकाबले लिवर में ठीक होने और फिर से तैयार होने की क्षमता सबसे ज्यादा होती है , इसलिए मरीज संयम न खोए और अपनी दवा और डायट का पूरा ध्यान रखें। 

अस्थमा 
अस्थमा के मरीजों के लिए अलग से कोई डायट रेकमेंड नहीं की जाती। उन्हें बस न्यूट्रिशन से भरपूर खाना खाने की सलाह दी जाती है। ये लोग आमतौर पर ऐलर्जी के शिकार जल्दी बनते हैं , इसलिए इन्हें उन चीजों से दूर रहने की सलाह दी जाती है , जिनसे ऐलर्जी हो सकती है , जैसे कि अंडा , मछली या तीखी महक वाली चीजें। हालांकि हर किसी को ऐलर्जी हो , या सबको एक ही चीज से ऐलर्जी हो , यह जरूरी नहीं है। 

- जिस वक्त अस्थमा का अटैक होता है , उस वक्त मरीज को पानी ज्यादा पीना चाहिए। पानी के साथ-साथ जूस ,नारियल पानी , लस्सी आदि भी भरपूर पिएं क्योंकि लगातार तेज-तेज सांस लेने से पानी की कमी हो जाती है। 

- हाई फाइबर और प्रोटीन से भरपूर डायट लेनी चाहिए। इस दौरान मसल्स ज्यादा काम करती हैं , इसलिए प्रोटीन से भरपूर दालें , सोयाबीन , अंडा आदि खाएं। 

- विटामिन बी वाली चीजें जैसे कि हरी पत्तेदार सब्जियां और दालें खाएं। ब्रोकली खासतौर पर फायदेमंद है। मैग्नीशियम से भरपूर सूरजमुखी का तेल या बीज खाएं। 

- इनफेक्शन से बचने की कोशिश करें। जिस चीज से ऐलर्जी है , वह न खाएं। साथ ही बहुत ज्यादा ठंडा या गर्म खाना न खाएं। सामान्य तापमान वाली चीजें खाना बेहतर है। 

- अस्थमा के मरीज को खट्टा और सामान्य ठंडा नहीं खाना चाहिए , यह मिथ है। जिन्हें इनसे ऐलर्जी होती है ,उन्हें ही इससे नुकसान होता है। बाकी मरीज खा सकते हैं , लेकिन एक्ट्रीम टेंपरेचर यानी बहुत ज्यादा ठंडी और बहुत ज्यादा गर्म चीजों से बचें। 

- आयुर्वेद के मुताबिक कफ बढ़ानेवाली चीजें न खाएं , जैसे कि दूध से बनी चीजें और खट्टी व ठंडी चीजें। 

किसका सोर्स क्या 
कार्बोहाइड्रेट : अनाज , चावल , दलिया , कॉर्नफ्लैक्स , ब्रेड , बिस्कुट , नूडल्स , मैदा , शुगर , आलू , शकरकंद, चुकंदर आदि। दालों में भी करीब 50 फीसदी कार्बोहाइड्रेट होते हैं। किशमिश , मुनक्का जैसे ड्राइ-फ्रूट्स में हेल्थी कार्बोहाइड्रेट होते हैं। 

प्रोटीन : नॉनवेज , अंडा , फिश , दालें , स्प्राउट्स , सोया आदि प्रोटीन के मुख्य सोर्स हैं। 

विटामिन/मिनरल : सब्जियां , फल , ड्राइ-फ्रूट्स , छिलके वाली चीजें जैसे कि दालें , गेहूं का चोकर , ब्राउन राइस आदि। 

फैट : बादाम , अखरोट , पिस्ता , चिलकोजा , सनफ्लावर बीज , ऑलिव ऑइल आदि में हेल्थी फैट होते हैं। बाकी सभी तरह के तेल और घी फैट का सोर्स हैं। 

फाइबर : फल , सब्जियां , दलिया , ब्राउन राइस , चोकर आदि। 

ओमेगा थ्री : फिश , अलसी , बीन्स , बादाम , सरसों का तेल आदि।

रविवार, 26 मई 2013

वास्तु और स्वास्थ्य

वास्तु का भी हमारे जीवन में विशेष प्रभाव रहता है.मानसिक हालत कमजोर होने की स्थिति में हम डिप्रेशन या अवसाद का शिकार हो जाते हैं। ऐसा होने पर व्यक्ति के विचारों, व्यवहार, भावनाओं और दूसरी गतिविधियों पर असर पड़ता है। डिप्रेशन से प्रभावित व्यक्ति अक्सर उदास रहने लगता है, उसे बात-बात पर गुस्सा आता है, भूख कम लगती है, नींद कम आती है और किसी भी काम में उसका मन नहीं लगता। लंबे समय तक ये हालत बने रहने पर व्यक्ति मोटापे का शिकार बन जाता है, उसकी ऊर्जा में कमी आने लगती है, दर्द के एहसास के साथ उसे पाचन से जुड़ी शिकायतें होने लगती हैं। कहने का मतलब यह है कि डिप्रेशन केवल एक मन की बीमारी नहीं है, यह हमारे शरीर को भी बुरी तरह प्रभावित करता है। डिप्रेशन के शिकार किसी व्यक्ति में इनमें से कुछ कम लक्षण पाए जाते हैं और किसी में ज्यादा।
आमतौर पर शरीर में बीमारी होने पर हम उसके बायोलॉजिकल, मनोवैज्ञानकि या सामाजिक कारणों पर जाते हैं। यहां पर आज हम बीमारियों के उस पहलू पर गौर करेंगे, जो हमारे घर के वास्तु से जुड़ा है। कई बीमारियों की वजह घर में वास्तु के नियमों की अनदेखी भी हो सकती है। अगर आप इन नियमों को जान लेंगे और उनका पालन करना शुरू करेंगे तो आपको इन बीमारियों से छुटकारा मिल सकता है।

  1. जैसे वास्तु में यह माना जाता है कि अगर आप दक्षिण दिशा में सिर करके सोते हैं तो आपके स्वास्थ्य में सुधार होता है। जहां तक करवट का सवाल है तो वात और कफ प्रवृत्ति के लोगों को बाईं और पित्त प्रवृत्ति वालों को दाईं करवट लेटने की सलाह दी जाती है। 
  2. सीढ़ियों का घर के बीच में होना स्वास्थ्य के लिहाज से नुकसान देने वाला होता है, इसलिए साढ़ियों को बीच के बजाय किनारे की ओर बनवाएं। 
  3. इसी तरह भारी फर्नीचर को भी घर के बीच में रखना अच्छा नहीं माना जाता। इस जगह में कंक्रीट का इस्तेमाल भी वास्तु के अनुकूल नहीं होता। दरअसल घर के बीच की जगह ब्रह्मस्थान कहलाती है, जहां तक संभव हो तो इस जगह को खाली छोड़ना बेहतर होता है।
  4.  घर के बीचोबीच में बीम का होना दिमाग के लिए नुकसानदायक माना जाता है। 
  5. वास्तु के नियमों के हिसाब से बीमारी की एक बड़ी वजह घर में अग्नि का गलत स्थान भी है। जैसे कि अगर आपका घर दक्षिण दिशा में है, तो इसी दिशा में अग्नि को न रखें।
  6.  रोशनी देने वाली चीज को दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखना स्वास्थ्य के लिए शुभ माना जाता है। घर में बीमार व्यक्ति के कमरे में कुछ सप्ताह तक लगातार मोमबत्ती जलाए रखना भी उसके स्वास्थ्य के लिए शुभ होता है।
  7. अगर घर का दरवाजा भी दक्षिण दिशा में है, तो इसे बंद करके रखें। यह दरवाजा लकड़ी का और ऐसा    होना चाहिए, जिससे सड़क अंदर से न दिखे।
  8. घर में किचन की जगह का भी हमारे स्वास्थ्य से संबंध होता है। दक्षिण-पश्चिम दिशा में किचन होने से  व्यक्ति अवसाद से दूर रहता है। 
  9. घर के मुख्य द्वार से यदि रसोई कक्ष दिखाई दे तो घर की स्वामिनी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है और उसके बनाए खाने को भी परिवार के लोग ज्यादा पसंद नहीं करते हैं।यदि आपकी रसोई बड़ी है तो आपको रसोई घर में बैठ कर ही भोजन करना चाहिए। इससे कुंडली में राहु के दुष्प्रभावों का शमन होता है।
  10. पूरे परिवार के अच्छे स्वास्थ्य के लिए घर में दक्षिण दिशा में हनुमान का चित्र लगाना चाहिए।
  11. शैया की माप के बारे में विधान है कि शैया की लंबाई सोने वाले व्यक्ति की लंबाई से कुछ अधिक होना चाहिए। पलंग में लगा शीशा वास्तु की दृष्टि से दोष है, क्योंकि शयनकर्ता को शयन के समय अपना प्रतिबिम्ब नजर आना उसकी आयु क्षीण करने के अलावा दीर्घ रोग को जन्म देने वाला होता है।
  12. बेड को कोने में दीवार से सटाकर बिलकुल न रखें। कमरे में दर्पण को कुछ इस तरह रखें, जिससे लेटी अवस्था में आपका प्रतिबिम्ब उस पर न पड़े।
  13. शयनकक्ष में साइड टेबल पर दवाई रखने का स्थान न हो। अनिवार्य दवाई को भी सुबह वहाँ से हटाकर अन्यत्र रख दें।फ्रिज कभी भी बेडरूम में न हो।
  
                                                                                                         कुछ टिप्स:राजीव एस. खट्टर-हिदुस्तान

रविवार, 31 मार्च 2013

"नीम का औषधीय गुण"



कड़वे नीम के ढेरों लाभ वैसे तो हम लोग आजकल पश्चिमी चिकित्सा पद्धति का ही प्रयोग करते हैं, और इसकी अच्छाइयों को झुठलाया नहीं जा सकता है। लेकिन इसकी काफ़ी कमियां भी जैसे कि अनजाने प्रभाव या साइड इफ़ेक्टस। इस मामले में भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा काफ़ी बेहतर है और इनमें से कुछ उपचार तो अब घरेलू हो चुके हैं। ऐसी ही कुछ दवाओं में है नीम।आयुर्वेद में नीम की बड़ी महिमा गाई गई है।भारत में एक कहावत प्रचलित है कि जिस धरती पर नीम के पेड़ होते हैं वहाँ मृत्यु और बीमारी कैसे हो सकती है।  इस वृक्ष के ढेरों औषधीय गुण हैं। पौराणिक काल से ही नीम का उपयोग कई बीमारियों के उपचार के लिए किया जाता रहा है। आज भी बहुत सी ऐसी दवाइयां हैं जिनमें नीम के पत्तों का रस, नीम के पेड़ के दूसरों हिस्सों का इस्तेमाल होता है। नीम के पेड़ की छांव की तो बात ही कुछ और है क्योंकि यह उन वृक्षों में शुमार होता है जो सबसे ज्यादा वातावरण में ऑक्सीजन प्रदान करता है।

नीम के यूं तो ढेरों लाभ है,इसमें से कुछ इस प्रकार हैं...............

  • नीम के तेल से मालिश करने से विभिन्न प्रकार के चर्म रोग ठीक हो जाते हैं।
  • नीम का लेप सभी प्रकार के चर्म रोगों के निवारण में सहायक है।
  • नीम की दातुन करने से दांत व मसूढे मज़बूत होते है और दांतों में कीडा नहीं लगता है, तथा मुंह से दुर्गंध आना बंद हो जाता है।
  • इसमें दोगुना पिसा सेंधा नमक मिलाकर मंजन करने से पायरिया, दांत-दाढ़ का दर्द आदि दूर हो जाता है।
  • नीम की कोपलों को पानी में उबालकर कुल्ले करने से दाँतों का दर्द जाता रहता है।
  • नीम की पत्तियां चबाने से रक्त शोधन होता है और त्वचा विकार रहित और चमकदार होती है।
  • नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर और पानी ठंडा करके उस पानी से नहाने से चर्म विकार दूर होते हैं, और ये ख़ासतौर से चेचक के उपचार में सहायक है और उसके विषाणु को फैलने न देने में सहायक है।
  • चेचक होने पर रोगी को नीम की पत्तियों बिछाकर उस पर लिटाएं।
  • नीम की छाल के काढे में धनिया और सौंठ का चूर्ण मिलाकर पीने से मलेरिया रोग में जल्दी लाभ होता है।
  • नीम मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों को दूर रखने में अत्यन्त सहायक है। जिस वातावरण में नीम के पेड़ रहते हैं, वहाँ मलेरिया नहीं फैलता है। नीम के पत्ते जलाकर रात को धुआं करने से मच्छर नष्ट हो जाते हैं और विषम ज्वर (मलेरिया) से बचाव होता है।
  • नीम के फल (छोटा सा) और उसकी पत्तियों से निकाले गये तेल से मालिश की जाये तो शरीर के लिये अच्छा रहता है।
  • नीम के द्वारा बनाया गया लेप वालों में लगाने से बाल स्वस्थ रहते हैं और कम झड़ते हैं।
  • नीम और बेर के पत्तों को पानी में उबालें, ठंण्डा होने पर इससे बाल, धोयें स्नान करें कुछ दिनों तक प्रयोग करने से बाल झडने बन्द हो जायेगें व बाल काले व मज़बूत रहेंगें।
  • नीम की पत्तियों के रस को आंखों में डालने से आंख आने की बीमारी (कंजेक्टिवाइटिस) समाप्त हो जाती है।
  • नीम की पत्तियों के रस और शहद को 2:1 के अनुपात में पीने से पीलिया में फ़ायदा होता है, और इसको कान में डालने कान के विकारों में भी फ़ायदा होता है।
  • नीम के तेल की 5-10 बूंदों को सोते समय दूध में डालकर पीने से ज़्यादा पसीना आने और जलन होने सम्बन्धी विकारों में बहुत फ़ायदा होता है।
  • नीम के बीजों के चूर्ण को ख़ाली पेट गुनगुने पानी के साथ लेने से बवासीर में काफ़ी फ़ायदा होता है।
  • नीम की निम्बोली का चूर्ण बनाकर एक-दो ग्राम रात को गुनगुने पानी से लें कुछ दिनों तक नियमित प्रयोग करने से कब्ज रोग नहीं होता है एवं आंतें मज़बूत बनती है।
  • गर्मियों में लू लग जाने पर नीम के बारीक पंचांग (फूल, फल, पत्तियां, छाल एवं जड) चूर्ण को पानी मे मिलाकर पीने से लू का प्रभाव शांत हो जाता है।
  • बिच्छू के काटने पर नीम के पत्ते मसल कर काटे गये स्थान पर लगाने से जलन नहीं होती है और ज़हर का असर कम हो जाता है।
  • नीम के 25 ग्राम तेल में थोडा सा कपूर मिलाकर रखें यह तेल फोडा-फुंसी, घाव आदि में उपयोग रहता है।
  • गठिया की सूजन पर नीम के तेल की मालिश करें।
  • नीम के पत्ते कीढ़े मारते हैं, इसलिये पत्तों को अनाज, कपड़ों में रखते हैं।
  • नीम की 20 पत्तियाँ पीसकर एक कप पानी में मिलाकर पिलाने से हैजा़ ठीक हो जाता है।
  • निबोरी नीम का फल होता है, इससे तेल निकला जाता है। आग से जले घाव में इसका तेल लगाने से घाव बहुत जल्दी भर जाता है।
  • नीम का फूल तथा निबोरियाँ खाने से पेट के रोग नहीं होते।
  • नीम की जड़ को पानी में उबालकर पीने से बुखार दूर हो जाता है।
  • छाल को जलाकर उसकी राख में तुलसी के पत्तों का रस मिलाकर लगाने से दाग़ तथा अन्य चर्म रोग ठीक होते हैं।
  • विदेशों में नीम को एक ऐसे पेड़ के रूप में पेश किया जा रहा है, जो मधुमेह से लेकर एड्स, कैंसर और न जाने किस-किस तरह की बीमारियों का इलाज कर सकता है।
  • विभिन्न रोगों में नीम का उपयोग
    १. प्रसव एवं प्रसूता काल में नीम का उपयोग
    १.१ नीम की जड़ को गर्भवती स्त्री के कमर में बांधने से बच्चा आसानी से पैदा हो जाता है। किन्तु बच्चा पैदा होते ही नीम की जड़ को कमर से खोलकर तुरन्त फेंक देने का सुझाव दिया जाता है। यह प्रयोग देश के कुछ ग्रामीण अंचलों में होते देखा गया है। परीक्षणों के बाद आयुर्वेद ने भी इसे मान्यता दी है।
    १.२ प्रसूता को बच्चा जनने के दिन से ही नीम के पत्तों का रस कुछ दिन तक नियमित पिलाने से गर्भाशय संकोचन एवं रक्त की सफाई होती है, गर्भाशय और उसके आस-पास के अंगों का सूजन उतर जाता है, भूख लगती है, दस्त साफ होता है, ज्वर नहीं आता, यदि आता भी है तो उसका वेग अधिक नहीं होता। यह आयुर्वेद का मत है।
    १.३ आयुर्वेद के मतानुसार प्रसव के छ: दिनों तक प्रसूता को प्यास लगने पर नीम के छाल का औटाया हुआ पानी देने से उसकी प्रकृति अच्छी रहती है। नीम के पत्ते या तने के भीतरी छाल को औंटकर गरम जल से प्रसूता स्त्री की योनि का प्रक्षालन करने से प्रसव के कारण होने वाला योनिशूल (दर्द) और सूजन नष्ट होता है। घाव जल्दी सूख जाता है तथा योनि शुद्ध तथा संकुचित होता है।
    १.४ प्रसव होने पर प्रसूता के घर के दरवाजे पर नीम की पत्तियाँ तथा गोमूत्र रखने की ग्रामीण परम्परा मिलती है। ऐसा करने के पीछे मान्यता है कि घर के अन्दर दुष्ट आत्माएं अर्थात संक्रामक कीटाणुओं वाली हवा न प्रवेश करे। नीम पत्ती और गोमूत्र दोनों में रोगाणुरोधी (anti bacterial) गुण पाये जाते हैं। गुजरात के बड़ौदा में प्रसूता को नीम छाल का काढ़ा एवं नीम तेल पिलाया जाता है, इससे भी स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
    २. मासिक धर्म, सुजाक एवं सहवास क्षत में नीम
    २.१ आयुर्वेद मत में नीम की कोमल छाल ४ माशा तथा पुराना गुड २ तोला, डेढ़ पाव पानी में औंटकर, जब आधा पाव रह जाय तब छानकर स्त्रियों को पिलाने से रुका हुआ मासिक धर्म पुन: शुरू हो जाता है। एक अन्य वैद्य के अनुसार नीम छाल २ तोला सोंठ, ४ माशा एवं गुण २ तोला मिलाकर उसका काढ़ा बनाकर देने से मासिक धर्म की गड़बड़ी ठीक होती है।
    २.२ स्त्री योनि में सुजाक (फुंसी, चकते) होने पर नीम के पत्तों के उबले गुनगुने जल से धोने से लाभ होता है। एक बड़े व चौड़े बर्तन में नीम पत्ती के उबले पर्याप्त जल में जो सुसुम हो, बैठने से सुजाक का शमन होता है और शान्ति मिलती है। पुरूष लिंग में भी सुजाक होने पर यही सुझाव दिया जाता है। इससे सूजन भी उतर जाता है और पेशाब ठीक होने लगता है।
    २.३ नीम पत्ती को गरम कर स्त्री के कमर में बांधने से मासिक धर्म के समय होने वाला कष्ट या पुरूषप्रसंग के समय होने वाला दर्द नष्ट होता है।
    २.४ नीम के पत्तों को पीस कर उसकी टिकिया तवे पर सेंककर पानी के साथ लेने से सहवास के समय स्त्री योनि के अन्दर या पुरूष लिंग में हुए क्षत भर जाते हैं, दर्द मिट जाता है।
    ३. प्रदर रोग (Leocorea) में नीम
    ३.१ प्रदर रोग मुख्यत: दो तरह के होते हैं-श्वेत एवं रक्त। जब योनि से सड़ी मछली के समान गन्ध जैसा, कच्चे अंडे की सफेदी के समान गाढ़ा पीला एवं चिपचिपा पदार्थ निकलता है, तब उसे श्वेत प्रदर कहा जाता है। यह रोग प्रजनन अंगों की नियमित सफाई न होने, संतुलित भोजन के अभाव, बेमेल विवाह, मानसिक तनाव, हारमोन की गड़बड़ी, शरीर से श्रम न करने, मधुमेह, रक्तदोष या चर्मरोग इत्यादि से होता है। इस रोग की अवस्था में जांघ के आस-पास जलन महसूस होता है, शौच नियमित नहीं होता, सिर भारी रहता है और कभी-कभी चक्कर भी आता है। रक्त प्रदर एक गंभीर रोग है। योनि मार्ग से अधिक मात्रा में रक्त का बहना इसका मुख्य लक्षण है। यह मासिक धर्म के साथ या बाद में भी होता है। इस रोग में हाथ-पैर में जलन, प्यास ज्यादा लगना, कमजोरी, मूर्च्छा तथा अधिक नींद आने की शिकायतें होती हैं।
    ३.२ श्वेत प्रदर में नीम की पत्तियों के क्वाथ से योनिद्वार को धोना और नीम छाल को जलाकर उसका धुआं लगाना लाभदायक माना गया है। दुर्गन्ध तथा चिपचिपापन दूर होने के साथ योनिद्वार शुद्ध एवं संकुचित होता है। यह आयुर्वेद ग्रंथ 'गण-निग्रह' का अभिमत है।
    ३.३ रक्त प्रदर में नीम के तने की भीतरी छाल का रस तथा जीरे का चूर्ण मिलाकर पीने से रक्तस्राव बन्द होता है तथा इस रोग की अन्य शिकायतें भी दूर होती हैं।
    ३.४ प्रदर रोग में (कफ होने पर) नीम का मद एवं गुडची का रस शराब के साथ लेने से लाभ होता है।
    ४. घाव, फोड़े-फुंसी, बदगांठ, घमौरी तथा नासूर में नीम
    ४.१ घाव एवं चर्मरोग बैक्टेरियाजनित रोग हैं और नीम का हर अंग अपने बैक्टेरियारोधी गुणों के कारण इस रोग के लिए सदियों से रामवाण औषधि के रूप में मान्यता प्राप्त है। घाव एवं चर्मरोग में नीम के समान आज भी विश्व के किसी भी चिकित्सा-पद्धति में दूसरी कोई प्रभावकारी औषधि नहीं है। इसे आज दुनियाँ के चिकित्सा वैज्ञानिक भी एकमत से स्वीकारने लगे हैं।
    ४.२ घाव चाहे छोटा हो या बड़ा नीम की पत्तियों के उबले जल से धोने, नीम पत्तियों को पीस कर उसपर छापने और नीम का पत्ता पीसकर पीने से शीघ्र लाभ होता है। फोड़े-फुंसी व बलतोड़ में भी नीम पत्तियाँ पीस कर छापी जाती हैं।
    ४.३ दुष्ट व न भरने वाले घाव को नीम पत्ते के उबले जल से धोने और उस पर नीम का तेल लगाने से वह जल्दी भर जाता है। नीम की पत्तियाँ भी पीसकर छापने से लाभ होता है।
    ४.४ गर्मी के दिनों में घमौरियाँ निकलने पर नीम पत्ते के उबले जल से नहाने पर लाभ होता है।
    ४.५ नीम की पत्तियों का रस, सरसों का तेल और पानी, इनको पकाकर लगाने से विषैले घाव भी ठीक हो जाते हैं।॥
    ४.६ नीम का मरहम लगाने से हर तरह के विकृत, विषैले एवं दुष्ट घाव भी ठीक होते हैं। इसे बनाने की विधि इस प्रकार है-नीम तेल एक पाव, मोम आधा पाव, नीम की हरी पत्तियों का रस एक सेर, नीम की जड़ के छाल का चूर्ण एक छटाक, नीम पत्तियों की राख ढाई तोला। एक कड़ाही में नीम तेल तथा पत्तियों का रस डालकर हल्की आँच पर पकावें। जब जलते-जलते एक छटाक रह जाय तब उसमें मोम डाल दें। गल जाने के बाद कड़ाही को चूल्हे पर से उतार कर और मिश्रण को कपड़े से छानकर गाज अलग कर दें। फिर नीम की छाल का चूर्ण और पत्तियों की राख उसमें बढ़िया से मिला दें। नीम का मरहम तैयार।
    ४.७ हमेशा बहते रहने वाले फोड़े पर नीम की छाल का भष्म लगाने से लाभ होता है।
    ४.८ छाँव में सूखी नीम की पत्ती और बुझे हुए चूने को नीम के हरे पत्ते के रस में घोटकर नासूर में भर देने से वह ठीक हो जाता है। जिस घाव में नासूर पड़ गया हो तथा उससे बराबर मवाद आता हो, तो उसमें नीम की पत्तियों का पुल्टिस बांधने से लाभ होता है।
    ५. उकतव (एक्जिमा), खुजली, दिनाय में नीम
    ५.१ रक्त की अशुद्धि तथा परोपजीवी (Parasitic) कीटाणुओं के प्रवेश से उकवत, खुजली, दाद-दिनाय जैसे चर्मरोग होते हैं। इसमें नीम का अधिकांश भाग उपयोगी है।
    ५.२ उकवत में शरीर के अंगों की चमड़ी कभी-कभी इतनी विकृत एवं विद्रूप हो जाती है कि एलोपैथी चिकित्सक उस अंग को काटने तक की भी सलाह दे देते हैं, किन्तु वैद्यों का अनुभव है कि ऐसे भयंकर चर्मरोग में भी नीम प्रभावकारी होता है। एक तोला मजिष्ठादि क्वाथ तथा नीम एवं पीपल की छाल एक-एक तोला तथा गिलोय का क्वाथ एक तोला मिलाकर प्रतिदिन एक महीने तक लगाने से एक्जिमा नष्ट होता है।
    ५.३ एक्जिमा में नीम का रस (जिसे मद भी कहते हैं) नियमित कुछ दिन तक लगाने और एक चम्मच रोज पीने से भी १०० प्रतिशत लाभ होता है। सासाराम (बिहार) के एक मरीज पर इसका लाभ होते प्रत्यक्ष देखा गया। खुजली और दिनाय में भी नीम का रस समान रूप से प्रभावकारी है।
    ५.४ कुटकी के काटने से होने वाली खुजली पर नीम की पत्ती और हल्दी ४:१ अनुपात में पीसकर छापने से खुजली में ९७ प्रतिशत तक लाभ पाया गया है। यह प्रयोग १५ दिन तक किया जाना चाहिए।
    ५.५ नीम के पत्तों को पीसकर दही में मिलाकर लगाने से भी दाद मिट जाता है।
    ५.६ वसंत ऋतु में दस दिन तक नीम की कोमल पत्ती तथा गोलमीर्च पीसकर खाली पेट पीने से साल भर तक कोई चर्मरोग नहीं होता, रक्त शुद्ध रहता है। रक्त विकार दूर करने में नीम के जड़ की छाल, नीम का मद एवं नीम फूल का अर्क भी काफी गुणकारी है। चर्मरोग में नीम तेल की मालिश करने तथा छाल का क्वाथ पीने की भी सलाह दी जाती है।
    ६. जले-कटे में नीम
    ६.१ आग से जले स्थान पर नीम का तेल लगाने अथवा नीम तेल में नीम पत्तों को पीस कर छापने से शान्ति मिलती है। नीम में प्रदाहक-रोधी (anti-inflammatory) गुण होने के कारण ऐसा होता है।
    ६.२ नीम की पत्ती को पानी में उबाल कर उसमें जले हुए अंग को डुबोने से भी शीघ्र राहत मिलती है।
    ६.३ नीम के तेल एवं पत्तियों में anticeptic गुण होते हैं। कटे स्थान पर इनका तेल लगाने से टिटनेस का भय नहीं होता।
    ७. कुष्ठरोग में नीम
    ७.१ दुनियाँ में २५ करोड़ से भी अधिक और भारत में पचासों लाख लोग कुष्ट रोग के शिकार हैं। सैकड़ों कोढ़ नियंत्रण चिकित्सा केन्द्रों के बावजूद इस रोग से पीड़ितों की संख्या में मामूली कमी आयी है। यह रोग एक छड़नुमा 'माइक्रोबैक्टेरिया लेबी' से होता है। चमड़ी एवं तंत्रिकाओं में इसका असर होता है। यह दो तरह का होता है-पेप्सी बेसीलरी, जो चमड़ी पर धब्बे के रूप में होता है, स्थान सुन्न हो जाता है। दूसरा मल्टीबेसीलरी, इसमें मुँह लाल, उंगलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी तथा नाक चिपटी हो जाती है। नाक से खून आता है। दूसरा संक्रामक किस्म का रोग है। इसमें डैपसोन रिफैमिसीन और क्लोरोफाजीमिन नामक एलोपैथी दवा दी जाती है। लेकिन इसे नीम से भी ठीक किया जा सकता है।
    ७.२ प्राचीन आयुर्वेद का मत है कि कुष्ठरोगी को बारहों महीने नीम वृक्ष के नीचे रहने, नीम के खाट पर सोने, नीम का दातुन करने, प्रात:काल नित्य एक छटाक नीम की पत्तियों को पीस कर पीने, पूरे शरीर में नित्य नीम तेल की मालिश करने, भोजन के वक्त नित्य पाँच तोला नीम का मद पीने, शैय्या पर नीम की ताजी पत्तियाँ बिछाने, नीम पत्तियों का रस जल में मिलाकर स्नान करने तथा नीम तेल में नीम की पत्तियों की राख मिलाकर घाव पर लगाने से पुराना से पुराना कोढ़ भी नष्ट हो जाता है।
    ८. धवल रोग (Leucoderma) में नीम
    ८.१ शरीर के विभिन्न भागों में चकते के रूप में चमड़ी का सफेद हो जाना, फिर पूरे शरीर की चमड़ी का रंग बदल जाना, धवल रोग है। इसका स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ता, इसके होने का कारण भी बहुत ज्ञात नहीं,किन्तु यूनानी चिकित्सा का मत है कि यह रक्त की खराबी, हाजमें की गड़बड़ी, कफ की अधिकता, पेट में कीड़ों के होने, असंयमित खान-पान, मानसिक तनाव, अधिक एंटीबायोटिक दवाइयों के सेवन आदि से होता है।
    ८.२ नीम की ताजी पत्ती के साथ बगुची का बीज (Psora corylifolia) तथा चना (Circerarietinum) पीसकर लगाने से यह रोग दूर होता है।
    ९. बवासीर
    ९.१ प्रतिदिन नीम की २१ पत्तियों को मूंग की भिंगोई और धोयी हुई दाल मे पीसकर बिना कोई मशाला डाले पकौड़ी बनाकर २१ दिन तक खाने से हर तरह का बवासीर निर्बल होकर गिर जाता है। पथ्य में सिर्फ ताजा मट्ठा, भात एवं सेंघा नमक लिया जाना चाहिए।
    ९.२ नीम बीज का पाउडर शहद में मिलाकर दिन में दो बार खाने से भी कुछ दिनों में बवासीर नष्ट हो जाते हैं। यह प्रयोग बुन्देलखण्ड के आदिवासियों द्वारा करते देखा गया है। इसमें नीम के टूसे बवासीर पर बांधने की सलाह दी जाती है।
    १०. आँख की बीमारी में नीम
    १०.१ नीम की हरी निबोली का दूध आँखों पर लगाने से रतौंधी दूर होती है। आँख में जलन या दर्द हो तो नीम की पत्ती कनपटी पर बांधने से आराम मिलता है। नीम के पत्ते का रस थोड़ा सुसुम कर जिस ओर आंख में दर्द हो, उसके दूसरी ओर कान में डालने से लाभ होता है। दोनों आँख में दर्द हो तो दोनों कान में सुसुम तेल डालना चाहिए।
    १०.२ नीम के फूल छाँव में सुखाकर समान भाग कलमी शोरे के साथ पीसकर कपड़े से छानकर आँख में आँजन करने से फूली, धुंध, माडा, रतौंधी आदि दूर होते हैं, आँखों की ज्योति बढ़ती है।
    १०.३ नीम की पत्तियों का रस तथा लाल फिटकिरी जल में मिलाकर उससे धोने से आँख का जाला साफ होता है तथा स्पष्ट दिखाई पड़ने लगता है।
    १०.४ दु:खती आँख में नीम पत्तियों का रस शहद में मिलाकर लगाने से भी दर्द दूर होता है और साफ दिखाई पड़ता है। नीम की लकड़ी जलाकर उसकी राख का सूरमा भी लगाने से इसमें लाभ होता है।
    १०.५ नीम की निबोली (फल) का रस, लोहे के किसी पात्र में रगड़कर और हल्का गर्म कर पलकों पर लेप करने से नेत्र का धुंधलापन दूर होता है।
    १०.६ शुष्ठी और नीम के पत्तों को सेंधा नमक के साथ पीसकर नेत्र पलकों पर लगाने से सूजन, जलन, दर्द तथा आंखो का गड़ना समाप्त होता है।
    १०.७ नीम की पत्तियों तथा लोधरा का पाउडर कपड़े में बांधकर पानी में कुछ देर छोड़ दें, फिर उस पानी से आँख धोने से नेत्र-विकार दूर होते हैं।
    १०.८ नीम काजल : नीम की पीली सूखी पत्तियाँ ७ नग, नीम के सूखे फलों का चूर्ण एक माशा, नीम तेल एक तोला, साफ महीन कपड़ा ४ इंच। कपड़े पर नीम की सूखी पत्तियाँ तथा फलों का चूर्ण रखकर, हाथ से मसलकर तथा लपेटकर बत्ती बना लें। एक मिट्टी के दीपक में नीम का तेल डालकर उसमें बत्ती डूबो कर जला दें। जब बत्ती अच्छी तरह जलने लगे, तब उस पर एक ढकनी लगाकर काजल एकत्र कर लें। इसको आँखों में लगाने से हर प्रकार के नेत्र रोग दूर होते हैं और आँखों की ज्योति बढ़ती है। नीम के फूलों का भी काजल लगाने से लाभ होता है।
    १०.९ नीम का तेल आँखों में आँजने और नीम का मद ६ तोला दो तीन दिन तक प्रात: पीने से भी रतौंधी दूर होती है। किन्तु मद को दो-तीन दिन से अधिक नहीं पीना चाहिए।
    १०.१० नीम की पत्तियों का रस आँख में टपकाने से भी नेत्र के जलन व विकार नष्ट होते हैं।
    ११ कान रोग में नीम
    ११.१ नीम का तेल गर्म कर एवं थोड़ा ठंढ़ा कर कान में कुछ दिन तक नियमित डालने से बहरापन दूर होता है।
    ११.२ कान-दर्द या कान-बहने में नीम तेल कुछ दिन तक कान में नियमित डालने से ठीक होता है।
    ११.३ कान के घाव एवं उससे मवाद आने में नीम का रस (मद) शहद के साथ मिलाकर डालने या बत्ती भिंगोकर कान में रखने से मवाद निकलना बन्द होता है और घाव सूखता है।
    १२. नाक तथा दाँत की बीमारी में नीम
    १२.१ नीम की पत्तियाँ तथा अजवाइन दोनों पीसकर कनपट्टियों पर लेप करने से नकसीर बन्द होता है।
    १२.२ मसूड़ों से खून आने और पायरिया होने पर नीम के तने की भीतरी छाल या पत्तों को पानी में औंटकर कुल्ला करने से लाभ होता है। इससे मसूड़े और दाँत मजबूत होते हैं। नीम के फूलों का काढ़ा बनाकर पीने से भी इसमें लाभ होता है।
    १२.३ नीम का दातुन नित्य करने से दाँतों के अन्दर पाये जाने वाले कीटाणु नष्ट होते हैं। दाँत चमकीला एवं मसूड़े मजबूत व निरोग होते हैं। इससे चित्त प्रसन्न रहता है।
    १३. बालों के जुंए, भूरापन तथा कील-मुहांसा में नीम
    १३.१ पुराने समय में स्त्रियाँ नीम के तने का भीतरी छाल घिसकर चेहरे पर लगाती थीं, जिससे त्वचा कोमल तथा कील-मुहांसों से मुक्त होता था।
    १३.२ बालों में नीम का तेल लगाने से जुएं तथा रूसी नष्ट होते हैं।
    १३.३ नीम तेल नियमित सिर में लगाने से गंजापन या बाल का तेजी से झड़ना रूक जाता है। यह बालों को भूरा होने से भी बचाता है। नीम तेल से हेयर आयल तथा हेयर लोशन भी बनाये जाते हैं। मार्गो या नीम साबुन भी इसमें लाभप्रद है। किन्तु नीम तेल या उससे बने साबुन, तेल, लोशन आदि लगाने से माथे में गर्मी भी होती है, अत: बहुत जरूरी होने पर ही इनका प्रयोग करना चाहिए।
    १४. पेट-कृमि में नीम
    १४.१ आंत में पड़ने वाली सफेद कृमि या केचुए को जड़ से नष्ट करने में संभवत: नीम जैसा गुणकारी कोई अन्य औषधि नहीं है। नीम की पत्ती १५-२० नग तथा काली मिर्च १० नग थोड़े से नमक के साथ पीसकर एक गिलास जल में घोलकर खाली पेट ३-४ दिन तक पी लेने से इन कृमियों से कम से कम २-३ वर्ष तक के लिए मुक्ति मिल जाती है।
    १४.२ बैगन या किसी दूसरे साग के साथ नीम की पत्तियों की छौंक लगाकर खाने से भी कृमि नष्ट होती है। सिर्फ नीम की पत्तियों का चूर्ण १०-१५ दिन खा लेने से भी लाभ होता है।
    १४.३ एक अन्य मत के अनुसार दस ग्राम नीम के पत्ते, दस ग्राम शुद्ध हींग के साथ कुछ दिन नियमित सेवन करने से भी पेट के सभी प्रकार के कीड़े मर जाते हैं।
    १५. मलेरिया में नीम
    १५.१ नीम वृक्ष मलेरिया-रोधी के रूप में प्रसिद्ध है। इसकी छाया में रहने और इसकी हवा लेने वालों पर मलेरिया का प्रकोप नहीं होता, यह ग्रामीण अनुभव है। इस वृक्ष के आस-पास मलेरिया तथा अन्य संक्रामक बीमारियों के वायरस भी जल्दी नहीं आते। यह वायरस-विरोधी (anti Viral) वृक्ष है। अत: घर के आस-पास नीम वृक्ष लगाने और स्वच्छता रखने की सलाह दी जाती है।
    १५.२ मलेरिया मुख्यत: मच्छरों के काटने से होता है। सर्दी, कंपकपाहट, तेज बुखार, बेहोशी, बुखार उतरने पर पसीना छूटना, इसके प्रमुख लक्षण हैं। इस रोग में नीम के तने की छाल का काढ़ा दिन में तीन बार पिलाने अथवा नीम के जड़ की अन्तर छाल एक छटाक ६० तोला पानी में १८ मिनट तक उबालकर और छानकर ज्वर चढ़ने से पहले २-३ बार पिलाना चाहिए। इससे ज्वर उतर जाता है। १५.३ नीम तेल में नारियल या सरसो का तेल मिलाकर शरीर पर मालिश करने से भी मच्छरों के कारण उत्पन्न मलेरिया ज्वर उतर जाता है।
    १६. सामान्य एवं विषम ज्वर में नीम
    १६.१ नीम के अन्तर छाल का चूर्ण, सोंठ तथा मीर्च का काढ़ा विषम ज्वर में देने से लाभ होता है। इसमें नीम के तेल की मालिश करने तथा प्रमाण से रोगी को पिलाने से भी लाभ होता है। छाल की अपेक्षा तेल का प्रभाव जल्द होता बताया गया है। सूजनयुक्त ज्वर या उष्मज्वर में नीम का छाल अधिक उपयोगी पाया गया है। नीम पत्तों को पीस-छान कर भी रोगी को पिलाया जा सकता है। ये सारी औषधियाँ रोगी को कुछ खिलाने से पहले दी जानी चाहिए।
    १६.२ मलेरियस ज्वर में नीम तेल की ५-१० बूंद दिन में दो बार देने से अच्छा लाभ होते देखा गया है। जीर्ण ज्वर में नीम का छाल एक तोला १० छटांक पानी में औंटकर, जब एक छटाक रह जाय तो छानकर प्रात: काल पिलाने से कुछ ही दिनों में अन्दर रहने वाला ज्वर विल्कुल निकल जाता है।
    १६.३ तेज सिहरनयुक्त ज्वर के साथ कै होने पर नीम की पत्ती के रस शहद एवं गुड़ के साथ देने से लाभ होता है। नीम का पंचांग (पता, जड़ फूल, फल और छाल) को एक साथ कूटकर घी के साथ मिलाकर देने से भी लाभ होता है। यह सुश्रुत एवं काश्यप का मत है। १६.४ साधारण बुखार में नीम की पत्तियाँ पीस कर दिन में तीन बार पानी में छानकर पिलाने से बुखार उतर जाता है। साधारण या विषम ज्वर में नीम के पत्तों की राख रोगी के शरीर पर मालिश करना लाभदायक होता है।
    १७. चेचक में नीम
    १७.१ इसकी भयंकरता के कारण इस रोग को दैवी प्रकोप माना जाता रहा है। यह जब उग्र रूप धारण करता है तब बड़े-बड़े चिकित्सकों की भी कुछ नहीं सुनता। आयुर्वेद में चेचक के रोकथाम के जो निदान बातये गये हैं उनमें नीम का उपयोग ही सर्वाधिक वर्णित है। इसके सेवन से या तो चेचक निकलता ही नहीं अथवा निकलता भी है तो उग्र नहीं होता, क्रमश: शान्त हो जाता है। नीम में चूंकि दाहकता शान्त करने के शीतल गुण हैं, इसलिए यह लोक जीवन में शीतला देवी के रूप में भी पूजित है।
    १७.२ चेचक कभी निकले ही नहीं, इसके लिए आयुर्वेद मत में उपाय है कि चैत्र में दस दिन तक प्रात:काल नीम की कोमल पत्तियाँ गोल मिर्च के साथ पीस कर पीना चाहिए। नीम का बीज, बहेड़े का बीज और हल्दी समान भाग में लेकर पीस-छानकर कुछ दिन पीने से भी शीतला/चेचक का डर नहीं रह जाता।
    १७.३ चेचक निकलने पर रोगी को स्वच्छ घर में नीम के पत्तों पर लिटाना, घर में नीम की ताजा पत्तियों की टहनी का बन्दनवार लटकाना तथा नीम का चंवर बनाकर रोगी को हवा देना चाहिए। बिस्तरे की पत्तियाँ नित्य बदल देनी चाहिए। रोगी को यदि अधिक जलन महसूस हो तो नीम की पत्तियों को पीसकर पानी में घोलकर तथा मथानी से मथकर उसका फेन चेचक के दानों पर सावधानी पूर्वक लगाना चाहिए। इससे भी राहत नहीं मिलने पर नीम की कोमल पत्तियाँ पीसकर चेचक के दानों पर हल्का लेप चढ़ाना चाहिए। नीम के बीज की गिरी को पीसकर भी लेप करने से दाहकता शीघ्र कम होती है। रोगी को प्यास लगने पर नीम के छाल को जलाकर उसके अंगारों को पानी में बुझाकर उस पानी को छान कर पिलाना चाहिए। नीम की पत्तियों को पानी में औंटकर पिलाने से भी दाहकता शान्त होती है। इससे चेचक का विष एवं ज्वर भी कम होता है, चेचक के दाने शीघ्र सूखते हैं। चेचक के दाने ठीक से न निकलने पर भी बेचैनी होती है। अत: नीम की पत्तियाँ पीस कर दिन में तीन बार पिलाने से वह शीघ्र निकल आते हैं। जब दाने सूख जांय तब नीम का पत्ता जल में उबालकर रोगी को कुछ दिन नियमित स्नान और नीम तेल की मालिश करनी चाहिए। इससे चेचक के दाग भी मिट जाते हैं। नीम बीज की गिरी पानी में गाढ़ा पीस कर दाग पर लगाना भी फायदेमंद होता है। चेचक होने पर कई रोगियों के कुछ बाल भी झड़ जाते हैं। इसमें नीम तेल माथे पर लगाने से बाल पुन: उग आते हैं।
    १७.४ चेचक में भूलकर भी नीम के अलावे कोई दूसरा इलाज करना बैद्यों ने मना किया है।
    १८. प्लेग में नीम
    १८.१ वायरस कीटाणुओं से होने वाला यह एक संक्रामक बीमारी है। मिट्टी, जल और वायु के प्रदूषण से इसके कीटाणु (पिप्सू) संक्रमित होते हैं, जो पहले चूहों में लगते हैं, फिर चूहों से मिट्टी, खाद्य पदार्थ, जल एवं वायु के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करते हैं। तेज बुखार, साँस लेने में कठिनाई, खून की उल्टियाँ, आँत में दर्द, बगल तथा गले में सूजन अथवा गांठे पड़ जाना इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। आयुर्वेद में इसे ग्रन्थिक या वातलिकार ज्वर कहा जाता है। यह बहुत तेजी से फैलता है। इसके वायरस शरीर की कोशिकाओं को नष्ट कर व्यक्ति को अपनी चपेट में तुरन्त ले लेते हैं।
    १८.२ प्लेग फैलते ही स्वस्थ लोगों को नीम के पत्ते पीस कर नित्य पीते रहना चाहिए, इससे प्लेग का उनपर असर नही होता। प्लेग के शिकार रोगी को नीम का पंचाग (बीज, छाल, पत्ता, फूल, गोद) कूटकर पानी मे छानकर दस-दस तोले की मात्रा हर पन्द्रह मिनट पर देनी चाहिए। तत्काल नीम के पांचों अंग न मिले तो जो भी मिले उसी को देना चाहिए। १८.३ शरीर के जोड़ों पर नीम की पत्तियों की पुल्टिस बांधने तथा आस-पास नीम की लकड़ी-पत्तों की घूनी करने से भी प्लेग का शमन होता है।
    १९. हैजा में नीम
    १९.१ यह अशुद्ध/दूषित जल के उपयोग से फैलने वाला संक्रामक रोग है। इसकी अभी कोई कारगार दवा इजाद नहीं हुई है। इसके जीवाणु पहले आंत में प्रतिक्रिया करते हैं। तत्काल उपाय न होने पर देखते-देखते रोगी मर जाता है। ग्लूकोज या नमक चीनी का घोल तुरन्त दिया जाना लाभदायक होता है। इसके फैलने पर व्यक्ति को पानी उबालकर पीना चाहिए, मांस-मंछली वर्जित करना चाहिए, खुले स्थान के मल को मिट्टी से ढक देना या लैट्रिन की विधिवत सफाई होती रहनी चाहिए। हैजा 'विब्रियो कैलेरा' नामक जीवाणु से संक्रमित होता है। कूड़े-कचड़ों के सड़न में इनका निवास अधिक होता है। इस बैक्टेरिया से ग्रस्त व्यक्ति अपने मल द्वारा हैजे के करोड़ों जीवाणु वातावरण में छोड़ता है, उससे जल, मिट्टी, खाद्य पदार्थ तथा वायु संक्रमित होते हैं। मक्खियाँ भी इसके संवाहक बनती हैं। उल्टी-दस्त, हाथ-पांव में ऐठन और तेज प्यास इसके प्रमुख लक्षण हैं।
    १९.२ नीम के पत्तों को पीसकर, गोला बनाकर तथा कपड़े में बांधकर ऊपर सनी हुई मिट्टी का मोटा लेप चढ़ाकर उसे आग के धूमल (भभूत) में पकाना चाहिए, जब वह लाल हो जाय तब थोड़ी-थोड़ी देर पर उस पके हुए गोले को अर्क गुलाब के साथ रोगी को देने से दस्त, वमन एवं प्यास रूकता है। नीम तेल की मालिश से शरीर का ऐंठन कम होता है। हैजे में नीम तेल पानी के साथ पीने से भी लाभ होता है। नीम छाल का काढ़ा पतले दस्त में भी लाभकारी होता है।
    २०. पिलिया/जौंडिस में नीम
    २०.१ नीम का रस (मद) या छाल का क्वाथ शहद में मिलाकर नित्य सुबह लेने से पिलिया में लाभ होता है। मोथा और कियू (Costus speciosus) के जूस में नीम का छाल मिलाकर उसका क्वाथ देने से भी यह रोग नष्ट होता है।
    २१. मधुमेह/डायबिटीज में नीम
    २१.१ हार्मोन की कमी के कारण रक्त में शर्करा की अधिकता और बार-बार पेशाब लगना, अधिक प्यास, कमजोरी, पैरो में झुनझुनी तथा बेहोशी भी इंसुलिन आधारित मधुमेह के प्रमुख लक्षण हैं। व्यायाम की कमी तथा आहार में प्रोटीन के अभाव से भी मधुमेह होता है, जिसका आधार इंसुलिन नहीं होता। इसमें घबराहट, नसों में दर्द, कमजोरी, थकान, शरीर का सूखना, वजन घटना, अधिक भूख, प्यास और पेशाब का लगना, कभी-कभी अंधापन भी इस रोग के लक्षण हैं।
    २१.२ नीम के तने की भीतरी छाल तथा मेथी के चूर्ण का काढ़ा बनाकर कुछ दिनों तक नियमित पीने से मधुमेह की हर स्थिति में लाभ मिलता है।
    २२. गठिया, बातरोग, साइटिका, जोड़ों में दर्द (अर्थराइटीस) में नीम
    २२.१ इन रोगों में नीम तेल की मालिश, नीम की पत्तियों को पीसकर एवं गर्म कर जोड़ों पर छापने, नीम का मद पीने, नीम के सूखे बीज का चूर्ण हर तीसरे दिन महीने भर खाने से काफी लाभ मिलता है। नीम के छाल को पानी के साथ पीस कर जोड़ों के दर्द वाले स्थान पर गाढ़ा लेप करने से भी दर्द दूर होता है।
    २३. सूजन, लकवा, चोट-मोच में नीम
    २३.१ नीम के छाल का अर्क २ से ४ तोले तक नित्य पीने और इसके सेवन के २ घंटे बाद तत्काल बनी रोटी घी के साथ खाने से लकवा अर्द्धांश में लाभ होता है। पक्षाघात वाले अंगों पर नीम तेल की मालिश करने की भी सलाह दी जाती है।
    २३.२ चोट लगने के कारण आयी मोच और गिल्टियों के सूजन पर नीम की पत्तियों का बफारा देने से लाभ होता है।
    २४. कफ, पित्त, दमा, रक्त एवं हृदय विकार तथा पथरी में नीम
    २४.१ नीम तथा वक के छाल का काढ़ा कफ में लाभदायक होता है।
    २४.२ नीम का फूल, इमली तथा शहद के साथ खाने से कफ एवं पित्त दोनों का शमन होता है।
    २४.३ नीम का शुद्ध तेल ३० से ६० बूंद तक पान में रखकर खाने से दमा से छुटकारा मिलता है। नीम के २० ग्राम पत्ते को आधा लीटर पानी में उबालकर जब एक कप रह जाय, कुछ दिन पीते रहने से भी दमा जड़ से नष्ट होता है।
    २४.४ नीम का मद, नीम के जड़ की छाल, नीम की कोमल पत्तियाँ अथवा पंचांग (पत्ते, जड़, फूल, फल एवं छाल) का काढ़ा इनमें से किसी का भी सेवन करने से रक्त-विकार दूर होता है। पित्त का भी शमन होता है और हृदय रोग की भी आशंका नहीं होती है। २४.५ नीम का गोंद रक्त की गति बढ़ाने वाला, स्फूर्तिदायक पदार्थ है। नीम के जड़ की छाल का काढ़ा त्रिदोषों - कफ, वात, पित्त का शमन करता है।
    २४.६ नीम की पत्तियों की राख २ माशा जल के साथ नियमित कुछ दिन तक खाते रहने से पथरी गलकर नष्ट हो जाती है।
    २५. मन्दाग्नि, वायुरोग, पशु-हाजमा में नीम
    २५.१ नीम की पकी निबोली अथवा नीम का फूल कुछ दिन नित्य खाने से मंदाग्नि में काफी लाभ होता है।
    २५.२ नीम तेल ३० बूंद पान के साथ खाने से वायु विकार तथा पेट का मरोड़ दूर होता है।
    २५.३ पशु हाजमा में नीम की पत्तियाँ गुड़ तथा नमक के साथ कूटकर खिलाने से लाभ होता है। इससे आंत के कीड़े भी मरते हैं।
    २६. वमन, विरेचन तथा नशा एवं विष उतारने में नीम
    २६.१ नीम बीज जल के साथ खिलाने पर वमन होता है। यह मृदु विरेचक है।
    २६.२ कई वर्षों तक लगातार हर साल १०-१५ दिन तक नीम की पत्तियों का सेवन किये हुए व्यक्ति को सर्प, बिच्छू आदि के विष का असर नहीं होता। नीम बीज का चूर्ण गर्म पानी के साथ पीने से भी विष उतरता है।
    २६.३ हड्डी, बिच्छू तथा मधुमक्खी के काटने पर नीम की पत्तियों को पीसकर छापनी चाहिए। इसको पीने से संखिया का विष भी उतर जाता है। नीम पत्तों का तेज अर्क अफीम के विष का नाशक है। कच्ची या पक्की निबोली गर्म पानी से पिलाने पर उल्टी होती है, इससे विष का असर नष्ट होता है।
    २७. लू से बचाव में नीम
    २७.१ नीम के पंचांग (पत्ता, जड़, फूल, फल एवं छाल) तथा मिश्री एक-एक तोला पानी के साथ पीसकर पीने से लू का प्रभाव नष्ट होता है। नीम की पत्ती पीसकर नीम के रस के साथ माथे पर छापने से भी लू का असर कम होता है।
    २७.२ चैत्र में दस दिन तक नीम की कोमल पत्ती एवं काली मिर्च पीने वाले व्यक्ति को गर्मी में लू नहीं लगती, शरीर में ढंठक बनी रहती है, कोई फोड़ा-फूंसी, चर्मरोग भी नहीं होता।
    २८. एड्स रोग में नीम
    २८.१ अभी कुछ ही वर्ष पहले नीम से असाध्य रोग एड्स के वायरस (एच.आई.वी.) प्रतिरोधी कुछ एनजाइम्स की खोज की गई है। भविष्य में नीम से बने एड्स विरोधी टीके आने वाले हैं। नीम छाल से एक ऐसा रसायन तैयार किया गया है जो एड्स को रोकने में काफी प्रभावकारी सिद्ध हुआ है।
    २९. अरूचिनाश तथा शुद्धिकरण में नीम
    २९.१ नीम की कोमल पत्तियाँ घी में भूनकर खाने से भयंकर अरूचि भी नष्ट होती है।
    २९.२ पुराने देशी घी या तेल को शुद्ध करने के लिए गर्म करते समय नीम की पत्तियाँ डाली जाती हैं।
    २९.३ अधिक नीम के सेवन से उत्पन्न हुए विकार दूध या सेंधा नमक खाने से दूर होते हैं।
    २९.४ नीम की पत्तियों से उबला जल या नीम तेल पानी में मिलाकर फर्श धोने से वातावरण शुद्ध होता है।
    २९.५ शवदाह के बाद लौटने या कोई घृणित चीज देखने से उत्पन्न हुए चित्त विकार नीम की पत्तियाँ/टूसे चबाने से दूर होते हैं।
    ३०. अतिसार, पेचीस में नीम
    ३०.१ मेघालय की खासी और जैतिया आदिवासी नीम की पत्ती अतिसार (दस्त), पेचिस, क्षयरोग (यक्ष्मा, तपेदिक) और हृदय रोग में व्यवहार करते हैं।
    ३१. कुपोषण में नीम विटामिन 'ए' का एक समृद्ध स्रोत है। विटामिन 'ए' की कमी से भी रतौंधी के अलावे फोड़े-फुंसी, खुजली, दाद, चमड़ी का खुरदुरा हो जाना या सिकुड़ जाना, हाथ-पाँव, कन्धं तथा जाँघों में फुंसियाँ निकल आना, जुकाम, खाँसी, निमोनिया, स्वाँस की बीमारी, पाचन सम्बन्धी रोग आदि होते हैं। इन कुपोषण-जनित रोगों में नीम का विभिन्न रूपों में उपयोग किया जाता है।
    ३२. कैलेस्ट्रोल नियंत्रण में नीम
    कैलेस्ट्रोल रक्त में पाया जाने वाला पीले रंग का एक मोमी पदार्थ है। जब रक्त में यह अधिक हो जाता है, तब रक्त-वाहिनी धमनियों के अन्दर यह जमने लगता है, थक्का बनाकर रक्त-प्रवाह को अवरुद्ध करता है। कैलेस्ट्रोल दो तरह के होते हैं- एच.डी.एल. और एल.डी.एल.। इसमें पहला स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, दूसरा बुरा। बुरा कैलेस्ट्रोल अधिक वसायुक्त पदार्थ (तेल, घी, डालडा), माँस, सिगरेट तथा अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से पैदा होता है। बुरा कैलेस्ट्रोल की वृद्धि से रक्त दूषित होता है, उसका प्रवाह रुकता है और हार्ट अटैक का दौरा पड़ता है। नीम एक रक्त-शोधक औषधि है, यह बुरे कैलेस्ट्रोल को कम या नष्ट करता है। नीम का महीने में १० दिन तक सेवन करते रहने से हार्ट अटैक की बीमारी दूर हो सकती है। कोयम्बटूर के एक आयुर्वेदीय अनुसंधान संस्थान में पशुओं पर प्रयोग करके देखा गया कि २०० ग्राम तक नीम पत्तियों के प्रयोग से कैलेस्ट्रोल की मात्रा काफी कम हो जाती है। लीवर की बीमारी में भी नीम पत्ती का सेवन लाभदायक पाया गया है।
    ३३. नीम के अधिक सेवन से नपुंसकता
    ३३.१ एक स्वस्थ व्यक्ति को अनावश्यक रूप से नीम का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए, इससे नपुंसकता आती है। बहुत से साधु-संत प्रबल कामशक्ति को जीतने के लिए बारहो मास नीम का सेवन करते हैं। प्रात:काल उषापान करने वाले स्वस्थ व्यक्ति को नीम का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए। नीम का दातुन इसमें अपवाद है।
    बिशेष फार्मूला:यदि चैत मास के प्रथम पक्ष में १५ दिनों तक सुबह वासी मुहं नीम की १५ कोमल पत्तियों (फुनगी)का सेवन कर लिया जाय तो पुरे वर्ष तक फोड़े फुन्सियों से बचा जा सकता है.आजमाया हुआ है.
    (आलेख कुछ ज्यादा ही विस्तृत हो गया है क्षमाप्रार्थी हैं.)
    (मुख्य स्रोत:विकिपीडिया)

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