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मंगलवार, 30 जनवरी 2018

मांसपेशियों के दर्द: Homeopathic treatment for muscle aches

मांसपेशियों में दर्द बहुत आम है, और कई अलग अलग चीजों के कारण हो सकता है। कोई चीज़ पकड़ते या उठाते हुए, सीढ़ियां चढ़ते हुए या फिर तेज भागने से मांसपेशियां खिंच सकती है। इसे मांसपेशियों में खिंचाव या तनाव कहा जाता है। मांसपेशियों का ये खिंचाव हाथ, पैर, जोड़ों या पीठ में हो सकता है। इसके अलावा इससे घुटने, कंधे, कोहनी में सूजन या दर्द भी उठ सकता है। कभी कभी बहुत अधिक व्यायाम करने से भी मांसपेशियों में दर्द हो जाता है। आजकल की व्‍यस्‍त और भाग-दौड़ भरी दिनचर्या में मांसपेशियों में दर्द एक आम समस्‍या बन गई है। वैसे तो मांसपेशियों का दर्द किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है, लेकिन तीस से चालीस वर्ष की आयुवर्ग के युवाओं में यह समस्‍या तेजी से बढ़ रही है। इस दर्द का सामना कुछ लोगों को कभी-कभी होता है, लेकिन कुछ लोगों को स्थाई रूप से इसका सामना करना पड़ता है।

Homeopathic Remedies for muscle pain and aches

मांसपेशियों के दर्द को होम्योपैथिक औषधियों से दूर करने के लिए कुछ प्रभावी उपचार उपलब्ध है।

Homeopathic Medicines to Help You Beat Spring Aches and Pain

Homeopathic treatment for muscle aches

What is the top best homeopathic cure for muscle pain and weakness?

Top 4 homeopathic medicine for muscle pain and weakness

आर्निका: मांसपेशियों के दर्द में आर्निका एक प्रभावी औषधि है। चोट लगने या गिरने के कारण होनेवाले माँसपेशियों के दर्द में आर्निका उपयोगी है। चोट लगने में सबसे पहले आर्निका की तरफ ध्यान जाता है। इस औषधि के लोशन का बाह्य उपयोग भी लाभकारी है।

Single medicines like Arnica montana help relieve these common spring aches and pain.

सिमसिफुएगा: इसे ऐक्टिया रेसिमोसा भी कहा जाता है। शारीरिक-लक्षणों के दब जाने पर मानसिक-लक्षणों का प्रकट हो जाना और मानसिक-लक्षणों के दब जाने पर शारीरिक-लक्षणों का प्रकट होना इस औषधि का विशेष गुण है। यह शीत-प्रधान औषधि है। Often times people that will benefit from cimicifuga are prone to depression and hormone imbalance.

नक्स वोमिका: नक्सवोमिका मासपेशियों के दर्द में काफी प्रभावी रूप से असर करती है। मासपेशियों के ऐठन, अकड़न का भाव दिखाई पड़ता है। Often times people that will benefit from nux vomica suffer from digestive problems such as heartburn or stomach aches and they are easily irritated or constantly feel fatigued.  नक्स प्रकृति का व्यक्ति बड़ा नाजुक-मिजाज (Oversensitive) होता है। ऊंची आवाज, तेज रोशनी, हवा का तेज झोंका – किसी चीज को बर्दाश्त नहीं कर सकता।  नक्स को जहां तक संभव हो, प्रात:काल नहीं देना चाहिये। औषधि लेने के बाद किसी प्रकार का मानसिक-कार्य-पढ़ना-लिखना, वाद-विवाद, ध्यान आदि नहीं करना चाहिये।

रस टॉक्स: विश्राम से रोग-वृद्धि; हरकत से रोग घटना, प्रथम हरकत से दर्द, गर्मी से, गर्मी सूखी हवा से रोग में कमी नमी या ठंड को न सह सकना, लगातार हरकत से रोग में कमी गर्मी या पसीने की हालत में भीग जाने या ठंड लगने से उत्पन्न हुए रोग मांसपेशियों के अकड़ जाने से उनमें दर्द होने से बेचैनी आदि लक्षण रहने पर यह औषधि कारगर है मांसपेशियों के दर्द में। इस औषधि का मुख्य प्रभाव मांसपेशियों, पुट्ठों पर होता है। मांसपेशियों के पुट्ठे अकड़ जाते हैं, दर्द करने लगते हैं। This treatment works best if the symptoms tend to improve when the person is active or applies warm applications.

Also read slip disc problem

इन मुख्य औषधियों के अलावा बहुत सारी होमियोपैथिक औषधियाँ जो मांसपेशियों के दर्द में लक्षणानुसार उपयोग की जाती हैं, जैसे की ब्रायोनिया, मैग फास, क्यूप्रम मेटालिकम ,रूटा  आदि।    


बुधवार, 10 जनवरी 2018

बिच्छु डंक का होमियोपैथिक इलाज (Scorpion sting homeopathic treatment)

बिच्छु डंक का होमियोपैथिक इलाज

बिच्छू काटने पर कितना दर्द होता है इसको वहीं जानता है जिसको बिच्छु ने डंक मारा हो। ऐसे तो बहुत सारे घरेलू उपचार हैं परन्तु मैं यहाँ केवल होमियोपैथिक इलाज के बारे में ही चर्चा करूँगा। 
सर्वप्रथम आप  Silicea साइलीसिया २०० शक्ति की दवा १-१ बून्द १०-१० मिनट के अंतराल पर केवल तीन बार दें।  इससे बिच्छु का डंक बाहर आ जायेगा और  आधा कष्ट दूर हो जायेगा। इसके बाद आप निचे लिखे औषधि का सेवन करें। 
Scorpion sting homeopathic treatment
Scorpion sting homeopathic treatment

एपिस, द्रौणा, इचिनेसिया और लीडम पाल
की मूल औषधि यानि Q शक्ति का मिश्रण तैयार करें और १०-१० बून्द पांच पांच मिनट पर रोगी को दें। ज्यादा कष्ट में ५ बून्द दवा 2CC डिसटिल वाटर के साथ मिला कर  काटे स्थान पर त्वचा में इंजेक्ट कर दें।  यह आजमाया और शर्तिया कष्ट को दूर करने में लाभकारी है। 

. धन्यवाद,


रविवार, 13 मार्च 2016

Homeopathic treatment of impotence (नपुंसकता का होमियोपैथिक इलाज)

जैसा की आपने पिछले पोस्ट में स्वप्नदोष (Nocturnal emission) के होमियोपैथिक उपचार के बारे में पढ़ा होगा।
Homeopathic treatment of impotence
यौन दुर्बलता (sexual weakness) में नपुंसकतता (impotence) भी एक बड़ी समस्या है।स्त्री-पुरुष की मैथुन क्रिया में पुरुष पक्ष जब किसी कारणवश सम्भोग क्रिया को पूर्ण नही कर पता या वह किसी असमर्थतावश स्त्री से सम्भोग नही कर पाता तो ऐसी स्थिति  नपुंसकता कहलाती है। 
By nature, men and women complement each other and colleagues have created and are incomplete without each other. When both are together and both are enjoying their lives when their real-life is called successful. The sex life of men and women contribute greatly to success. If the husband and wife's marriage is completely satisfied both mentally and physically so they can stay healthy and depressed. Otherwise, their disease, disease, suffering, discord arises wall slowly shake the foundation of the relationship of husband and wife is a sweet and holy, and finally many terrible outcomes.
नपुंसकता इसको स्तंभन दोष भी कहा जाता है, दुनिया भर में पुरुषों के लिए और जीवन के सभी चरणों में आम है।होम्योपैथिक उपचार इरेक्टाइल डिसफंक्शन से संबंधित समस्याओं की एक विस्तृत रेंज है, जो या तो शारीरिक या मनोवैज्ञानिक समस्याओं या दोनों की वजह से हो सकता है के लिए उत्कृष्ट परिणाम प्रदान करते हैं। यौन रोग से ग्रसित होना कोई  शर्म की बात नहीं है, यदि हम सर्दी बुखार आदि होने पर डॉक्टर से सलाह लेने में संकोच नही करते फिर जनेन्द्रियों से संबंधित किसी भी विकार से ग्रसित होने पर संकोच कैसा ? 
Erectile dysfunction, also called impotence, is common to men worldwide and at all stages of life.
Homeopathic remedies provide excellent results for a wide range of problems related to erectile dysfunction, which may be caused by either physical or psychological problems or both.
                  These are some among the many homeopathic remedies which cater to relieve of impotence specifically.
Homeopathic treatment of impotence
Impotency Treatment
Top Homeopathic Remedies For Impotency
पुरुषों में नपुंसकता की स्थिति आने पर निम्नलिखित होमियोपैथिक अौषधियों का लक्षणानुसार सेवन करना चाहिए.... 

Top 10 Homeopathic medicine for impotence

रविवार, 13 सितंबर 2015

A handbook of materia medica and homoeopathic therapeutics (E-Book)


रविवार, 25 मई 2014

मस्सों का घरेलू उपचार (Home remedies for warts)

प्रिये मित्रों मस्सा शब्द से शायद ही आप अनजान हों।मस्से शरीर पर कहीं भी हों खूबसूरती को कम कर देते हैं, विशेषकर चेहरे पर होने वाले मस्से। मस्सा (wart) शरीर पर कहीं कहीं काले रंग का उभरा हुआ मांस का छोटा दाना जो चिकित्सा विज्ञान के अनुसार एक प्रकार का चर्मरोग माना जाता है। यह प्रायः सरसों अथवा मूँग के आकार से लेकर बेर तक के आकार का होता है। यह प्रायः हाथों और पैर पर होता है किन्तु शरीर के अन्य अंगों पर भी हो सकता है।त्वचा पर पेपीलोमा वायरस के कारण छोटे खुरदरे कठोर गोल पिण्ड बन जाते हैं जिसे मस्सा कहते हैं।
मस्से विषाणु संक्रमण से पैदा होते हैं। प्रायः 'मानव पेपिल्लोमैविरस' नामक विषाणु की
कोई प्रजाति इसका कारण होती है। लगभग दस प्रकार के मस्से होते हैं। मस्से संक्रमण (छुआछूत) से हो सकते हैं और शरीर में वहाँ प्रवेश करते हैं जहाँ त्वचा कटी-फटी हो। प्रायः ये कुछ माह में स्वयं समाप्त हो जाते हैं किन्तु कभी-कभी वर्षों तक बने रह सकते हैं या पुनः हो सकते हैं।शरीर पर अनचाहे मस्सों के उग जाने से मन से बार बार यही आवाज आती है कि इन मस्सों से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है। ये मस्से आपकी सुदरता में धब्बा बन कर आपको परेशान कर रहे हैं तो इन आसान उपायों की सहायता से आप इनसे छुटकारा पा सकते हैं। 
१. रोज दो तीन बार प्याज का लेप मस्सों पर करने से ये मस्से जड़ से खत्म हो जाएंगे। प्याज को काट कर मस्से पर घिसना भी लाभप्रद है। 
२. शरीर की त्वचा पर यदि छोटे-छोटे काले मस्से हो गए हों तो उन पर काजू के छिलकों का लेप लगाने से मस्से साफ हो जाते हैं।
3. चूना और घी एक समान मात्रा में लेकर दोनों को खूब फेंटकर सुरक्षित रखें। उसे दिन में 3-4 बार मस्सों पर लगाएं। उससे मस्से जड़ से हट जाएंगे और दूबारा नहीं होंगे।
४. सोडा कास्टिक 6 ग्राम को 250 ग्राम की बोतल में घोलकर सुरक्षित जगह पर रख दें। सावधानी से रूई की सहायता से मस्सों पर लगाएं। मस्सों को दूर करने के लिए यह रामबाण दवा है। 
५. बी काम्पलेक्स, विटामिन ए, सी, ई युक्तआहार के सेवन से मस्सों को दूर किया जा सकता है।मस्सों से छुटकारा पाने के लिए पोटेशियम बहुत लाभदायक है। पोटेशियम बहुत सी साग-सब्जी और फलों में पाया जाता है। जैसे - सेब, केला, अंगूर, आलू, मशरूम, टमाटर, पालक इत्यादि।
६. खट्टी सेब का रस मस्सों पर लगाने से मस्सों के छोटे-छोटे टुकड़े होकर गिर जाएंगे।
७. मुहासे या मस्से हों तो फिटकरी और काली मिर्च आधा-आधा ग्राम पानी में पीसकर मुहा पर मलने से लाभ होता है।
८. बरगद के पेड़ के पत्तों का रस मस्सों के उपचार के लिए बहुत ही असरदार होता है। इस प्रयोग से त्वचा सौम्य हो जाती है और मस्से अपने आप गिर जाते हैं।
९. एक चम्मच कोथमीर के रस में एक चुटकी हल्दी डालकर सेवन करने से मस्सों से राहत मिलती है।
१०. कच्चे आलू का एक स्लाइस नियमित रूप से दस मिनट तक मस्से पर लगाकर रखने से मस्सों से छुटकारा मिल जायेगा।
११. मस्सा खत्म करने के लिए एक अगरबत्ती जला लें और अगरबत्ती के जले हुए गुल को मस्से का स्पर्श कर तुरन्त हटा लें। ऐसा 8-10 बार करें, इस उपाय से मस्सा सूखकर झड़ जाएगा।
१२. ताजा अंजीर लें। इसे कुचलकर -मसलकर इसकी कुछ मात्रा मस्से पर लगावें और ३० मिनिट तक लगा रहने दें फ़िर गरम पानी से धोलें। ३-४ हफ़्ते में मस्से समाप्त होंगे।
१३. केले के छिलके को अंदर की तरफ से मस्से पर रखकर उसे एक पट्टी से बांध लें। और ऐसा दिन में दो बार करें और लगातार करते रहें जब तक कि मस्से ख़तम नहीं हो जाते।
१४. अरंडी का तेल नियमित रूप से मस्सों पर लगायें। इससे मस्से नरम पड़ जायेंगे, और धीरे धीरे गायब हो जायेंगे। अरंडी के तेल के बदले कपूर के तेल का भी प्रयोग कर सकते हैं। 
१५. कलौंजी के कुछ दाने सिरके में पीस कर मस्सों पर लगा कर सो जाए कुछ दिनों में मस्से
कट जायेंगे।
१६. लहसून के एक टुकड़े को पीस लें, लेकिन बहुत महीन नहीं, और इस पीसे हुए लहसून को मस्से पर रखकर पट्टी से बांध लें। इससे भी मस्सों के उपचार में सहायता मिलती है।१७. एक बूँद ताजे मौसमी का रस मस्से पर लगा दें, और इसे भी पट्टी से बांध लें। ऐसा दिन में लगभग 3 या 4 बार करें। ऐसा करने से मस्से गायब हो जायेंगे। 
१८. बंगला, मलबारी, कपूरी, या नागरबेल के पत्ते के डंठल का रस मस्से पर लगाने से मस्से झड़ जाते हैं। अगर तब भी न झड़ें, तो पान में खाने का चूना मिलाकर घिसें। 
१९. अम्लाकी को मस्सों पर तब तक मलते रहें जब तक मस्से उस रस को सोख न लें। या अम्लाकी के रस को मस्से पर मल कर पट्टी से बांध लें।
२०. कसीसादी तेल मस्सों पर रखकर पट्टी से बांध लें।
२१. थूहर का दूध या कार्बोलिक एसिड सावधानीपूर्वक लगाने से मस्से निकल जाते हैं। -मस्सों पर अलो वेरा को दिन में तीन बार लगायें। ऐसा एक सप्ताह तक करते रहें, मस्से गायब हो जायेंगे।
२२. बेकिंग सोडा और अरंडी तेल को बराबर मात्रा में मिलाकर इस्तेमाल करने से मस्से धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं।
२३. हरे धनिए को पीसकर उसका पेस्ट बना लें और इसे रोजाना मस्सों पर लगाएं। 
२४. चेहरे को अच्छी तरह धोएं और कॉटन को सिरके में भिगोकर तिल-मस्सों पर लगाएं। दस मिनट बाद गर्म पानी से फेस धो लें। कुछ दिनों में मस्से गायब हो जाएंगे।
२५. रात को सोते वक्त और सुबह के समय मस्सों पर शहद लगाने के लाभकारी परिणाम मिले हैं।
२६. ग्वार पाठा (एलोवेरा) से मस्से की चिकित्सा की जा सकती है। एलोवेरा के रस में रूई का फ़ाया (काटन बाल) एक मिनट के लिये भिगोएं फ़िर इसे मस्से पर रखें और चिपकने वाली पटी (एढीसिव टेप। से स्थिर कर दें। यह प्रक्रिया दिन में कई बार करना उचित है। ३-४ हफ़्ते में मस्से साफ़ हो जाएंगे।
२७. ताजा अंजीर मसलकर इसकी कुछ मात्रा मस्से पर लगाएं। 30 मिनट तक लगा रहने दें। फिर गुनगुने पानी से धो लें। मस्से खत्म हो जाएंगे।

अगले अंक में मस्सों का होमियोपैथिक उपचार पढ़ें  ……। 

मंगलवार, 18 मार्च 2014

"गुर्दे की पथरी की चिकित्सा" (Homeopathic treatment of kidney stones)


आजकल पथरी का रोग लोगों में आम समस्या बनती जा रही है| जो अक्सर गलत खान पान की वजह से होता है।गुर्दे की पथरी (वृक्कीय कैल्कली, नेफरोलिथियासिस) (अंग्रेजी:Kidney stones) मूत्रतंत्र की एक ऐसी स्थिति है जिसमें, वृक्क (गुर्दे) के अन्दर छोटे-छोटे पत्थर सदृश कठोर वस्तुओं का निर्माण होता है। गुर्दें में एक समय में एक या अधिक पथरी हो सकती है। सामान्यत: ये पथरियाँ बिना किसी तकलीफ मूत्रमार्ग से शरीर से बाहर निकाल दी जाती हैं , किन्तु यदि ये पर्याप्त रूप से बड़ी हो जाएं ( २-३ मिमी आकार के) तो ये मूत्रवाहिनी में अवरोध उत्पन्न कर सकती हैं। इस स्थिति में मूत्रांगो के आसपास असहनीय पीड़ा होती है।
यह स्थिति आमतौर से 30 से 60 वर्ष के आयु के व्यक्तियों में पाई जाती है और स्त्रियों की अपेक्षा पुरूषों में चार गुना अधिक पाई जाती है। बच्चों और वृद्धों में मूत्राशय की पथरी ज्यादा बनती है, जबकि वयस्को में अधिकतर गुर्दो और मूत्रवाहक नली में पथरी बन जाती है। जिन मरीजों को मधुमेह की बीमारी है उन्हें गुर्दे की बीमारी होने की काफी संभावनाएं रहती हैं। अगर किसी मरीज को रक्तचाप की बीमारी है तो उसे नियमित दवा से रक्तचाप को नियंत्रण करने पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि अगर रक्तचाप बढ़ता है, तो भी गुर्दे खराब हो सकते हैं।

गुर्दे की पथरी के कारण
Cause of kidney stones:
किसी पदार्थ के कारण जब मूत्र सान्द्र (गाढ़ा) हो जाता है तो पथरी निर्मित होने लगती है। इस पदार्थ में छोटे छोटे दाने बनते हैं जो बाद में पथरी में तब्दील हो जाते है। इसके लक्षण जब तक दिखाई नहीं देते तब तक ये मूत्रमार्ग में बढ़ने लगते है और दर्द होने लगता है। इसमें काफी तेज दर्द होता है जो बाजू से शुरु होकर उरू मूल तक बढ़ता है।

तथा रोजाना भोजन करते समय उनमें जो कैल्शियम फॉस्फेट आदि तत्व रह जाते हैं, पाचन क्रिया की विकृति से इन तत्वों का पाचन नहीं हो पाता है। वे गुर्दे में एकत्र होते रहते हैं। कैल्शियम, फॉस्फेट के सूक्ष्म कण तो मूत्र द्वारा निकलते रहते हैं, जो कण नहीं निकल पाते वे एक दूसरे से मिलकर पथरी का निर्माण करने लगते हैं। पथरी बड़ी होकर मूत्र नली में पहुंचकर मूत्र अवरोध करने लगती है। तब तीव्र पीड़ा होती है। रोगी तड़पने लगता है। इलाज में देर होने से मूत्र के साथ रक्त भी आने लगता है जिससे काफी पीड़ा होती है। तथा लंबे समय तक पाचन शक्ति ठीक न रहने और मूत्र विकार भी बना रहे तो गुर्दों में कुछ तत्व इकट्ठे होकर पथरी का रूप धारण कर लेते हैं।

A family history of kidney stones is also a risk factor for developing kidney stones

किसी प्रकार से पेशाब के साथ निकलने वाले क्षारीय तत्व किसी एक स्थान पर रुक जाते है,चाहे वह मूत्राशय हो,गुर्दा हो या मूत्रनालिका हो,इसके कई रूप होते है,कभी कभी यह बडा रूप लेकर बहुत परेशानी का कारक बन जाती है,पथरी की शंका होने पर किसी प्रकार से इसको जरूर चैक करवा लेना चाहिये.

गुर्दे की पथरी के लक्षण
Symptoms of kidney stones
पीठ के निचले हिस्से में अथवा पेट के निचले भाग में अचानक तेज दर्द, जो पेट व जांघ के संधि क्षेत्र तक जाता है। दर्द फैल सकता है या बाजू, श्रोणि, उरू मूल, गुप्तांगो तक बढ़ सकता है, यह दर्द कुछ मिनटो या घंटो तक बना रहता है तथा बीच-बीच में आराम मिलता है। दर्दो के साथ जी मिचलाने तथा उल्टी होने की शिकायत भीहो सकती है। यदि मूत्र संबंधी प्रणाली के किसी भाग में संक्रमण है तो इसके लक्षणों में बुखार, कंपकंपी, पसीना आना, पेशाब आने के साथ-साथ दर्द होना आदि भी शामिल हो सकते हैं ; बार बार और एकदम से पेशाब आना, रुक रुक कर पेशाब आना, रात में अधिक पेशाब आना, मूत्र में रक्त भी आ सकता है। अंडकोशों में दर्द, पेशाब का रंग असामान्य होना। गुर्दे की पथरी के ज्यादातर रोगी पीठ से पेट की तरफ आते भयंकर दर्द की शिकायत करते हैं। यह दर्द रह-रह कर उठता है और कुछ मिनटो से कई घंटो तक बना रहता है इसे ”रीलन क्रोनिन” कहते हैं। यह रोग का प्रमुख लक्षण है, इसमें मूत्रवाहक नली की पथरी में दर्दो पीठ के निचले हिस्से से उठकर जांघों की ओर जाता है।

गुर्दे की पथरी के प्रकार
Types of Kidney Stones
सबसे आम पथरी कैल्शियम पथरी है। पुरुषों में, महिलाओं की तुलना में दो से तीन गुणा ज्यादा होती है। सामान्यतः 20 से 30 आयु वर्ग के पुरुष इससे प्रभावित होते है। कैल्शियम अन्य पदार्थों जैसे आक्सलेट(सबसे सामान्य पदार्थ) फास्फेट या कार्बोनेट से मिलकर पथरी का निर्माण करते है। आक्सलेट कुछ खाद्य पदार्थों में विद्यमान रहता है।
पुरुषों में यूरिक एसिड पथरी भी सामान्यतः पाई जाती है। किस्टिनूरिया वाले व्यक्तियों में किस्टाइन पथरी निर्मित होती है। महिला और पुरुष दोनों में यह वंशानुगत हो सकता है।
मूत्रमार्ग में होने वाले संक्रमण की वजह से स्ट्रवाइट पथरी होती है जो आमतौर पर महिलाओं में पायी जाती है। स्ट्रवाइट पथरी बढ़कर गुर्दे, मूत्रवाहिनी या मूत्राशय को अवरुद्ध कर सकती है।

गुर्दे की पथरी से बचाव के कुछ उपाय:
Some measure of protection from kidney stones:
1. पर्याप्त जल पीयें ताकि 2 से 2.5 लीटर मूत्र रोज बने।पथरी के मरीज को दिन में कम से कम 5-6 लीटर पानी पीना चाहिये। अधिक मात्रा में मुत्र बनने पर छोटी पथरी मुत्र के साथ निकल जाती है।

2. आहार में प्रोटीन, नाइट्रोजन तथा सोडियम की मात्रा कम हो।

3. ऐसे पदार्थ न लिये जांय जिनमें आक्जेलेट्‌ की मात्रा अधिक हो; जैसे चाकलेट, सोयाबीन, मूंगफली, पालक आदि

4. कोका कोला एवं इसी तरह के अन्य पेय से बचें।

5. विटामिन - सी की भारी मात्रा न ली जाय।

6. नारंगी आदि का रस (ज्यूस) लेने से पथरी का खतरा कम होता है।

पथरी में ये खाएं: 
कुल्थी के अलावा खीरा, तरबूज के बीज, खरबूजे के बीज, चौलाई का साग, मूली, आंवला, अनन्नास, बथुआ, जौ, मूंग की दाल, गोखरु आदि खाएं। कुल्थी के सेवन के साथ दिन में 6 से 8 गिलास सादा पानी पीना, खासकर गुर्दे की बीमारियों में बहुत हितकारी सिद्ध होता है।

ये न खाएं:
पालक, टमाटर, बैंगन, चावल, उड़द, लेसदार पदार्थ, सूखे मेवे, चॉकलेट, चाय, मद्यपान, मांसाहार आदि। मूत्र को रोकना नहीं चाहिए। लगातार एक घंटे से अधिक एक आसन पर न बैठें। जिसको भी शरीर मे पथरी है वो चुना कभी ना खाएं !काले अंगूरों के सेवन से परहेज करें।तिल, काजू अथवा खीरे, आँवला अथवा चीकू (सपोटा) में भी आक्सेलेट अधिक मात्रा में होता है।बैगन,फूलगोभी में यूरिक एसिड व प्यूरीन अधिक मात्रा में पाई जाती है।

पथरी का घरेलू इलाज-

1. जिस व्यक्ति को पथरी की समस्या हो उसे खूब केला खाना चाहिए क्योंकि केला विटामिन बी-6 का प्रमुख स्रोत है, जो ऑक्जेलेट क्रिस्टल को बनने से रोकता है व ऑक्जेलिक अम्ल को विखंडित कर देता है। इसके आलावा नारियल पानी का सेवन करें क्योंकि यह प्राकृतिक पोटेशियम युक्त होता है, जो पथरी बनने की प्रक्रिया को रोकता है और इसमें पथरी घुलती है।

2. कहने को करेला बहुत कड़वा होता है पर पथरी में यह भी रामबाण साबित होता है| करेले में पथरी न बनने वाले तत्व मैग्नीशियम तथा फॉस्फोरस होते हैं और वह गठिया तथा मधुमेह रोगनाशक है। जो खाए चना वह बने बना। पुरानी कहावत है। चना पथरी बनने की प्रक्रिया को रोकता है।

3. गाजर में पायरोफॉस्फेट और पादप अम्ल पाए जाते हैं जो पथरी बनने की प्रक्रिया को रोकते हैं। गाजर में पाया जाने वाला केरोटिन पदार्थ मूत्र संस्थान की आंतरिक दीवारों को टूटने-फूटने से बचाता है।

4. इसके अलावा नींबू का रस एवं जैतून का तेल मिलकर तैयार किया गया मिश्रण गुर्दे की पथरी को दूर करने में बहुत हीं कारगर साबित होता है। 60 मिली लीटर नींबू के रस में उतनी हीं मात्रा में जैतून का तेल मिलाकर मिश्रण तैयार कर लें। इनके मिश्रण का सेवन करने के बाद भरपूर मात्रा में पानी पीते रहें।
इस प्राकृतिक उपचार से बहुत जल्द हीं आपको गुर्दे की पथरी से निजात मिल जायेगी साथ हीं पथरी से होने वाली पीड़ा से भी आपको मुक्ति मिल जाएगी।

5. पथरी को गलाने के लिये अध उबला चौलाई का साग दिन में थोडी थोडी मात्रा में खाना हितकर होता है, इसके साथ आधा किलो बथुए का साग तीन गिलास पानी में उबाल कर कपडे से छान लें, और बथुये को उसी पानी में अच्छी तरह से निचोड कर जरा सी काली मिर्च जीरा और हल्का सा सेंधा नमक मिलाकर इसे दिन में चार बार पीना चाहिये, इस प्रकार से गुर्दे के किसी भी प्रकार के दोष और पथरी दोनो के लिए साग बहुत उत्तम माने गये है।

6. जीरे को मिश्री की चासनी अथवा शहद के साथ लेने पर पथरी घुलकर पेशाब के साथ निकल जाती है। इसके अलावा तुलसी के बीज का हिमजीरा दानेदार शक्कर व दूध के साथ लेने से मूत्र पिंड में फ़ंसी पथरी निकल जाती है।

7. एक मूली को खोखला करने के बाद उसमे बीस बीस ग्राम गाजर शलगम के बीज भर दें, फ़िर मूली को गर्म करके भुर्ते की तरह भून लें, उसके बाद मूली से बीज निकाल कर सिल पर पीस लें,सुबह पांच या छ: ग्राम पानी के साथ एक माह तक पीते रहे, पथरी में लाभ होगा|

8. प्याज में पथरी नाशक तत्व होते हैं। करीब 70 ग्राम प्याज को अच्छी तरह पीसकर या मिक्सर में चलाकर पेस्ट बनालें। इसे कपडे से निचोडकर रस निकालें। सुबह खाली पेट पीते रहने से पथरी छोटे-छोटे टुकडे होकर निकल जाती है।

9. पहाडी कुल्थी और शिलाजीत दोनो एक एक ग्राम को दूध के साथ सेवन करने पथरी निकल जाती है

10. एक मूली को खोखला करने के बाद उसमे बीस बीस ग्राम गाजर शलगम के बीज भर दें,फ़िर मूली को गर्म करके भुर्ते की तरह भून लें,उसके बाद मूली से बीज निकाल कर सिल पर पीस लें,सुबह पांच या छ: ग्राम पानी के साथ एक माह तक पीते रहे,पथरी और पेशाब वाली बीमारियों में फ़ायदा मिलेगा।

11. सूखे आंवले को नमक की तरह से पीस लें,उसे मूली पर लगाकर चबा चबा कर खायें,सात दिन के अन्दर पथरी पेशाब के रास्ते निकल जायेगी,सुबह खाली पेट सेवन करने से और भी फ़ायदा होता है।

12. तुलसी के बीज का हिमजीरा दानेदार शक्कर व दूध के साथ लेने से मूत्र पिंड में फ़ंसी पथरी निकल जाती है।

13. पखानबेद नाम का एक पौधा होता है! उसे पथरचट भी कुछ लोग बोलते है! उसके पत्तों को पानी मे उबाल कर काढ़ा बना ले! मात्र 7 से 15 दिन मे पूरी पथरी खत्म!! और कई बार तो इससे भी जल्दी खत्म हो जाती

14. बथुआ को पानी में उबालकर इसके रस में नींबू, नमक व जीरा मिलाकर नियमित पीने से पेशाब में जलन, पेशाब के समय दर्द तथा पथरी दूर होती है।

16. पथरी से बचाव के लिये रातभर मक्के के बाल (सिल्क) को पानी में भिगाकर सुबह सिल्क हटाकर पानी पीने से लाभ होता है। पथरी के उपचार में सिल्क को पानी में उबालकर बनाये गये काढे का प्रयोग होता है।

17. आम के ताजा पत्ते छाया में सुखाकर, बारीक पीस कर आठ ग्राम मात्रा पानी मे मिलाकर प्रात: काल प्रतिदिन लेने से पथरी समाप्त हो सकती है।

18. दो अन्जीर एक गिलास पानी मे उबालकर सुबह के वक्त पीयें। एक माह तक लेना जरूरी है।



19. कुलथी की दाल का सूप पीने से पथरी निकलने के प्रमाण मिले है। २० ग्राम कुलथी दो कप पानी में उबालकर काढा बनालें। सुबह के वक्त और रात को सोने से पहिले पीयें।एक-दो सप्ताह में गुर्दे तथा मूत्राशय की पथरी गल कर बिना ऑपरेशन के बाहर आ जाती है, लगातार सेवन करते रहना राहत देता है।
कुल्थी का पानी विधिवत लेने से गुर्दे और मूत्रशय की पथरी निकल जाती है और नयी पथरी बनना भी रुक जाता है। किसी साफ सूखे, मुलायम कपड़े से कुल्थी के दानों को साफ कर लें। किसी पॉलीथिन की थैली में डाल कर किसी टिन में या कांच के मर्तबान में सुरक्षित रख लें।


           कुल्थी का पानी बनाने की विधि: किसी कांच के गिलास में 250 ग्राम पानी में 20 ग्राम कुल्थी डाल कर ढक कर रात भर भीगने दें। प्रात: इस पानी को अच्छी तरह मिला कर खाली पेट पी लें। फिर उतना ही नया पानी उसी कुल्थी के गिलास में और डाल दें, जिसे दोपहर में पी लें। दोपहर में कुल्थी का पानी पीने के बाद पुन: उतना ही नया पानी शाम को पीने के लिए डाल दें।इस प्रकार रात में भिगोई गई कुल्थी का पानी अगले दिन तीन बार सुबह, दोपहर, शाम पीने के बाद उन कुल्थी के दानों को फेंक दें और अगले दिन यही प्रक्रिया अपनाएं। महीने भर इस तरह पानी पीने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी धीरे-धीरे गल कर निकल जाती है।

20. स्टूल पर चढकर १५-२० बार फ़र्श पर कूदें। पथरी नीचे खिसकेगी और पेशाब के रास्ते निकल जाएगी। निर्बल व्यक्ति यह प्रयोग न करें।

21. दूध व बादाम का नियमित सेवन से पथरी की संभावना कम होती है।

22. गोखरू 10 ग्राम, जल 150 ग्राम, दूध 250 ग्राम को पकाकर आधा रह जाने पर छानकर नित्य पिलाने से मूत्र मार्ग की सारी विकृतियाँ दूर होती हैं ।

23. गिलास अनन्नास का रस, १ चम्मच मिश्री डालकर भोजन से पूर्व लेने से पिशाब खुलकर आता है और पिशाब सम्बन्धी अन्य समस्याए दूर होती है

24. पथरी होने पर नारियल का पानी पीना चाहिए।इसमें जैविक परमाणु होते हैं जो खनिज पदार्थो को उत्पन्न होने से रोकते हैं .

25. 15 दाने बडी इलायची के एक चम्मच, खरबूजे के बीज की गिरी और दो चम्मच मिश्री, एक कप पानी में मिलाकर सुबह-शाम दो बार पीने से पथरी निकल जाती है।

26. पका हुआ जामुन पथरी से निजात दिलाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पथरी होने पर पका हुआ जामुन खाना चाहिए।
27. सहजन की सब्जी खाने से गुर्दे की पथरी टूटकर बाहर निकल जाती है।

28. मिश्री, सौंफ, सूखा धनिया लेकर 50-50 ग्राम मात्रा में लेकर डेढ लीटर पानी में रात को भिगोकर रख दीजिए। अगली शाम को इनको पानी से छानकर पीस लीजिए और पानी में मिलाकर एक घोल बना लीजिए, इस घोल को पी‍जिए। पथरी निकल जाएगी।

29.तीन हल्की कच्ची भिंड़ी को पतली-पतली लम्बी-लम्बी काट लें। कांच के बर्तन में दो लीटर पानी में कटी हुई भिंड़ी ड़ाल कर रात भर के लिए रख दें। सुबह भिंड़ी को उसी पानी में निचोड़ कर भिंड़ी को निकाल लें। ये सारा पानी दो घंटों के अन्दर-अन्दर पी लें। इससे किड़नी की पथरी से छुटकारा मिलता है।

30. महर्षि सुश्रुत के अनुसार सात दिन तक गौदुग्ध के साथ गोक्षुर पंचांग का सेवन कराने में पथरी टूट-टूट कर शरीर से बाहर चली जाती है । मूत्र के साथ यदि रक्त स्राव भी होतो गोक्षुर चूर्ण को दूध में उबाल कर मिश्री के साथ पिलाते हैं ।

31. पतंजलि का दिव्य वृक्कदोष हर क्वाथ १० ग्राम ले कर डेढ़ ग्लास पानी में उबाले .चौथाई शेष रह जाने पर सुबह खाली पेट और दोपहर के भोजन के ५-६ घंटे बाद ले .इसके साथ अश्मरिहर रस के सेवन से लाभ होगा . जिन्हें बार बार पथरी बनाने की प्रवृत्ति है उन्हें यह कुछ समय तक लेना चाहिए

लिथोट्रिप्सी तकनीक 
Lithotripsy technology
पहले पथरी हो जाने पर बड़ा ऑपरेशन ही उसका अंतिम उपाय होता था, लेकिन अब नई तकनीक लिथोट्रिप्सी आ गई है। इससे पथरी का इलाज आसानी से किया जा सकता है । लिथोट्रिप्सी तकनीक के बारे में विस्तृत जानकारी दे रहे हैं , रायपुर स्टोन क्लीनिक के सर्जन डॉ. कमलेश अग्रवाल ।

क्या है लिथोट्रिप्सी तकनीक ?
लिथोट्रिप्सी चिकित्सा जगत की आधुनिक तकनीकों में से एक है गुर्दे की पथरी के इलाज में इसका उपयोग किय जाता है । लिथोट्रिप्सी दो शब्दों से मिलकर बना है । लिथो का अर्थ है स्टोन या पथरी और ट्रिप्सी का अर्थ है तोड़ना । लिथोट्रिप्सी बिना शल्य क्रिया के पथरी को तोड़कर छोटे-छोटे टुकड़ो के रुप में शरीर से बाहर निकालने की आसान व सुरक्षित विधि है ।


प्रकिया 
लिथोट्रिप्सी तकनीक द्वारा गुर्दे, मूत्राशय एवं मूत्रनली में स्थित किसी भी आकार की पथरी को चूरा करके बहुत आसानी से कम समय में निकाला जाता है । लिथोट्रिप्सर नामक मशीन द्वारा ध्वनि तरंगें उत्पन्न करके उस स्थान पर प्रेषित की जाती है , जहाँ पर पथरी होती हैं । ये ध्वनि तरंगें अल्ट्रा साउंड में प्रयुक्त ध्वनि तरंगों की तरह होती है । इन तरंगों द्वारा पथरी को तोड़कर रेत के समान बारीक कणों में बदल दिया जाता है । ये कण पेशाब के साथ आसानी से शरीर से बाहर निकल जाते हैं ।

इलाज के पूर्व परीक्षण 
लिथोट्रिप्सी के इलाज से पूर्व सामान्य परीक्षण किये जाते हैं। यह एक आउटडोर प्रक्रिया है। इसमें मरीज को भर्ती होने की जरुरत नहीं होती। पूरी प्रक्रिया में करीब 30 से 40 मिनट तक का औसत समय लगता है। 

तकनीक के फ़ायदे
लिथोट्रिप्सी द्वारा किसी भी आयु के मरीज का उपचार पूर्णतया सुरक्षित ढंग से किया जा सकता है ।
इसमें किसी तरह की शारीरिक-मानसिक परेशानी नहीं होती।
हृदयरोग, तपेदिक, उच्च रक्तचाप,मधुमेह,अस्थमा अथवा किसी क्रानिक बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए ये विधि उपयुक्त मानी जाती है , क्योंकि ऎसे मरीजों में शल्यक्रिया तुरंत करना संभव नहीं होता है ।
इस तकनीक में मरीज को रक्त की जरुरत नहीं होती,इसलिए किसी अन्य रोग के संक्रमण का खतरा नहीं रहता ।
शरीर में कहीं चीर-फाड़ नहीं की जाती, इस कारण कटनें का निशान नहीं पड़ता ।
लिथोट्रिप्सी मशीन से पित्तनली एवं पेनक्रियाण ग्रंथी का उपचार भी संभव है।

यह उपचार काफी सामान्य है और पूरी प्रक्रिया में कोई दवा अथवा दर्द निवारक इंजेक्शन का प्रयोग नहीं किया जाता ।

सहायक उपचार- हिमालय ड्रग कंपनी की सिस्टोन की दो गोलियां दिन में 2-3 बार प्रतिदिन लेने से शीघ्र लाभ होता है। कुछ समय तक नियमित सेवन करने से पथरी टूट-टूट कर बाहर निकल जाती है। यह मूत्रमार्ग में पथरी, मूत्र में क्रिस्टल आना, मूत्र में जलन आदि में दी जाती है।स्टोनिल कैप्सूल( हकीम हाशमी )एक 100% हर्बल जड़ी बूटी युक्त उपाय अपने को पूरी मूत्र प्रणाली के लिए एक टॉनिक के रूप में दोनों स्वस्थ और रोगग्रस्त गुर्दे के कामकाज और कार्य में सुधार करने की क्षमता के लिए जाना जाता है. यह हर्बल कैप्सूल गुर्दे में पत्थर गठन के एक आम स्वास्थ्य विकार, जो दुनिया में लोगों की काफी संख्या को प्रभावित करता है. उसका उपचार में सहायता करता है यह मुख्य रूप से कैल्शियम का संचय, फॉस्फेट, और गुर्दे में oxalate जो क्रिस्टल या पत्थर को निश्चित रूप से निकल बहार करता है .

आपको गुर्दे की पथरी जिन्हें बार-बार हो रही है उन्हें खान-पान में परहेज बरतना चाहिए, ताकि समस्या से बचा जा सकता है। साथ ही एक स्वस्थ व्यक्ति को तो प्रतिदिन 3-5 लीटर पानी पीना चाहिए| यदि किसी को एक बार पथरी की समस्या हुई, तो उन्हें यह समस्या बार-बार हो सकती है। अतः खानपान पर ध्यान रखकर पथरी की समस्या से निजात पाई जा सकती है।

होमियोपैथिक चिकित्सा : 
Homeopathic treatment of kidney stones
BERBERIS VULGARIS: इस होमियोपैथिक दवा  का मदर टिंचर  पेशाब के  पथरी में  बहुत उपयोगी  हैं।  इस दवा की 10-15 बूंदों को एक चौथाई (1/ 4) कप गुण गुने पानी मे मिलाकर दिन मे चार बार (सुबह,दोपहर,शाम और रात) लेना है। चार बार अधिक से अधिक और कमसे कम तीन बार|इसको लगातार एक से डेढ़ महीने तक लेना है कभी कभी दो महीने भी लग जाते है। 
CHINA 1000: दुबारा पथरी न हो इसके लिए चाइना १००० कि शक्ति में केवल एक दिन तीन समय में खायें और पथरी से हमेशा के लिए छुटकारा पाएं। 
CANTHARIS 6 : यदि पेशाब की  पेशाब में जल जाने जैसा जलन,वेग, कुथन इत्यादि रहे तो कैन्थेरिस से लाभ होगा। यह मूत्र पथरी की बहुमूल्य दवा  है। 
SARSAPARILLA: इसमें पेशाब जल्दी जल्दी लगता है  और थोडा थोडा होता है। पेशाब के साथ छोटी छोटी पथरी निकलती हैं, गुर्दे में दर्द रहता है।पेशाब के अन्त में असह्य कष्ट होना, गर्म चीजों के सेवन से कष्ट बढ़ना, बैठ कर पेशाब करने में तकलीफ के साथ बूंद-बूंद करके पेशाब उतरना और खड़े होकर पेशाब करने पर आसानी से पेशाब उतरना यह सारसापेरिला के लक्षण हैं। 
HEDEOMA: पेशाब में लाल रंग के बालू के कण कि तरह का पदार्थ निकलता है,यूरेटर में दर्द रहता है। 

ARTICA URENCE: अर्टिका यूरेंस : यूरिक एसिड बनने की प्रवृति रोकने के लिए एवं यूरिक एसिड निर्मित पथरी के लिए, उक्त दवा के मूल अर्क का नियमित सेवन करना चाहिए।

LAYCOPODIUMलाइकोपोडियम :पेसाब में रेत के लाल कण दिखाई देना, दाई तरफ गुर्दे में दर्द होता है, पेशाब धीरे-धीरे होना एवं कमर में दर्द रहना, रोगी अकेला रहना पसंद नहीं करता, रात में बार-बार पेशाब होना आदि लक्षण मिलने पर पहले 30 शक्ति में एवं बाद में 200 शक्ति में दवा प्रयोग करनी चाहिए। इसमें प्रोस्टेट ग्रंथि भी बढ़ जाती है।

इन औषधियों के आलावा लक्षणानुसार हाइड्रेज़िया, डायस्कोरिया, ओसीमम कैनम, कैल्केरिया कार्ब आदि  होमियोपैथिक औषधियाँ लाभकारी हैं। 


नोट:-कोई भी नुस्खा ड़ाक्टर की सलाह से अपनाना चाहिए।

गुरुवार, 13 जून 2013

होमियोपैथी और कुछ मिथ


होमियोपैथी को लेकर कई तरह के मिथ और गलत अवधारणाएं हैं। कई लोगों को तो होमियोपैथी पर अटूट विश्वास है, जबकि कई अन्य इसे कौड़ी का भाव नहीं देते। इसकी वजह होमियोपैथी से जुड़ी लोगों की गलतफहमी है, जबकि यह दुनिया भर में इलाज की एक जानी-मानी पद्धति है। इस पद्धति को लेकर लोगों की आम गलतफहमियां क्या हैं, और क्या है हकीकत, जानते हैं. होमियोपैथी दुनिया भर में जानी-मानी इलाज पद्धति है, लेकिन इसकी पॉपुलरिटी आज भी एलोपैथी की तुलना में काफी कम है। इसके कारणों में से प्रमुख है इस पैथी को लेकर प्रचलित कुछ मान्यताएं।

देर से असर करने वाली पैथी नहीं है होमियोपैथी
होमियोपैथी को लेकर जो सबसे आम धारणा है, वह यह कि यह बड़ी सुस्त रफ्तार से असर करता है और मरीज को काफी देर से राहत मिलती है। इस मान्यता के उलट, सच यह है कि अगर मरीज के केस का गहराई से अध्ययन कर सही ट्रीटमेंट किया जाए, तो होमियोपैथी तुरंत असरकारी साबित होता है। जब कोई गंभीर बीमारी हो, तो इलाज लंबे समय तक जारी रखना पड़ सकता है। अगर बीमारी काफी पुरानी है और बुरी तरह मरीज को चपेट में ले चुकी है, तो इलाज कई साल भी चल सकता है, क्योंकि हैमियोपैथी में मरीज की स्थिति पर लगातार नजर रखते हुए सावधानी से ट्रीटमेंट किया जाता है। 

पैथॉलजी से ज्यादा जोर साइन और सिम्पटम पर

लोग ऐसा मानते हैं कि होमियोपैथी से इलाज करने वाले डॉक्टर पैथॉलजी में विश्वास नहीं करते। इसीलिए वे मरीज की कोई पैथॉलजिकल जांच वगैरह नहीं करवाते। सच बात यह है कि किसी भी फिजिशियन के लिए सबसे पहले जरूरी है बीमारी को जानना। उसके बाद ही वह बीमारी के सिम्पटम्स, पैथॉलजी, कोर्स, कॉम्प्लिकेशन आदि के बारे में सही जानकारी ले सकता है। होमियोपैथी के तहत इलाज के दौरान मरीज की समस्याओं को उसके संपूर्ण व्यक्तित्व (सायकॉलजिकल व फिजिकल) के संदर्भ में देखा जाता है, न कि सिर्फ समस्याग्रस्त अंगों तक सीमित रहकर। 

स्टेरॉयड्स के प्रयोग की धारणा गलत

आम तौर पर माना जाता है कि होमियोपैथिक फिजिशियंस मरीज का इलाज करने के लिए स्टेरॉयड्स का इस्तेमाल करते हैं। अस्थमा, आर्थराइटिस आदि क्रॉनिक बीमारियों के इलाज को लेकर तो यह मान्यता लोगों में गहराई तक जड़ जमाई हुई है। लेकिन ज्यादातर मामलों में ऐसे मरीजों को पहले ही स्टेरॉयड्स दिए जा चुके होते हैं। होमियोपैथिक फिजिशियंस अपने पास ऐसे केस आने पर केस की डीटेल स्टडी करते हैं और मरीज के सिम्पटम्स व साइन समझने की कोशिश करते हैं। वे मरीज की हेरिडेटरी हिस्ट्री भी स्टडी करते हैं और यह भी समझने की कोशिश करते हैं कि मरीज को अपने आसपास की किन चीजों से परेशानी होती है। तमाम बातों को समझते हुए उसके अनुकूल दवा दी जाती है। ऐसे में स्टेरॉयड्स का अनावश्यक और नियमित इस्तेमाल होमियोपैथी के सिद्धांतों के खिलाफ है और कोई भी एक्सपर्ट डॉक्टर ऐसा नहीं करता। 

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

होमियोपैथी के प्रति कुछ भ्रांतियाँ



भ्रांति : क्या होमियोपैथी एक अप्रामाणिक चिकित्सा विज्ञान है?
सच : ऐसा बिल्कुल नहीं. कई शोध के बाद यह पाया गया है कि यह चिकित्सा विज्ञान है, क्योंकि इन दवाओं का प्रभाव मानव शरीर पर ही नहीं, बल्कि जानवरों एवं पौधों पर भी पाया गया है. इन्हीं प्रमाणों के आधार पर यह अन्य चिकित्सा प्रणाली के सामान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनायी गयी है.
भ्रांति : होमियोपैथी दवा बहुत धीरे-धीरे असर करती है. रोग को ठीक करने में काफी समय लेती है?
सच : ऐसा बिल्कुल नहीं है. होमियोपैथी दवा की क्रिया निम्न कारणों पर निर्भर है जैसे.. कोई व्यक्ति किसी रोग से अचानक ग्रसित होता है. जैसे संक्रमण, बुखार, सर्दी इत्यादि. ऐसे रोगी को उपयुक्त होमियोपैथी दवा का चयन कर बहुत ही कम समय में रोगमुक्त कर सकते हैं.
पुराने रोग से ग्रसित व्यक्ति को रोगमुक्त करने में कुछ समय लग सकता है, परंतु कुछ पुराने रोग जैसे -एक्जिमा, सराइसिस(त्वचा रोग), अस्थमा, अर्थराइटिस आदि से ग्रसित रोगी यदि दवा का सेवन निरंतर व समय से करें, तो फायदा होगा.
यदि होमियोपैथी दवा का चयन उचित होता है. वह पूर्ण रूप से रोग मुक्त हो जाता है. रोगी को उसकी प्रारंभिक रोगमुक्त अवस्था में ला देता है, परंतु यह स्वाभाविक है कि कुछ समय दवा को कार्य करने में लग सकता है.
भ्रांति : होमियोपैथी प्रारंभ में रोग को बढ़ाती है?
सच : नहीं, ज्यादातर रोगों में ऐसा नहीं होता है. हालांकि, कुछ परिस्थितियों में रोगी होमियोपैथिक दवा खाने के बाद अपने कुछ लक्षणों में वृद्धि होने की शिकायत करता है, जबकि वास्तव में ऐसा होता नहीं है. लक्षणों के बढ़ने के दो कारण हो सकते हैं.

यदि किसी रोगी ने होमियोपैथिक दवा सेवन करने से पहले किसी अन्य चिकित्सा पद्धति का सहारा लिया है, तो उस चिकित्सा के फलस्वरूप, वो अपने रोग को कुछ समय के लिए दबा लेता है, लेकिन रोगमुक्त नहीं करता, परंतु जैसे ही वो होमियोपैथी दवा का सहारा लेता है, तो उसके शरीर में उपस्थित वे सारे लक्षण जो कि नॉन होमियोपैथी दवाओं से दबा कर दिये गये थे, पुन: प्रकट हो जाते हैं. ज्यादातर ऐसी स्थिति चर्म रोग से ग्रसित रोगियों में पायी जाती है, जिन्हें मलहम द्वारा दबा दिया जाता है. यही कारण है कि लोगों में ये धारणा बैठ गयी है कि होमियोपैथी रोग को बढ़ाती है.
दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि जिस उचित होमियोपैथी दवा का चुनाव रोगी के लिए किया गया, उस दवा की शक्ति, रोग की शक्ति से ज्यादा हो गयी, अर्थात जिस शक्ति की दवा की जरूरत रोगी को थी, उस शक्ति की दवा न देकर उस रोगी को उससे ऊंची शक्ति की दवा दे दी गयी. इसके फलस्वरूप एकाएक लक्षणों की तीव्रता बढ़ जाती है, परंतु लक्षणों की तीव्रता लंबे समय तक नहीं रहती और कुछ समय पश्चात अपने आप सामान्य हो जाती है.
भ्रांति : क्या होमियोपैथी से सभी प्रकार के रोग ठीक किये जा सकते हैं?
सच : ऐसा कहना गलत होगा, क्योंकि हर चिकित्सा पद्धति का अपना विस्तार क्षेत्र एवं सीमित दायरा होता है. इसी प्रकार इस चिकित्सा पद्धति के साथ भी है. होमियोपैथी के द्वारा वो सारी समस्याएं जो क्यूट या क्रोनिक डिजीज ठीक की जा सकती है, परंतु यदि कोई बीमारी सजिर्कल है, तो उसके लिए सजिर्कल ही उपाय है.

परंतु कुछ ऐसी भी बीमारियां हैं, जो पूर्ण रूप से सजिर्कल नहीं होतीं जैसे- टांसिल का बढ़ जाना, नाक में मांस बढ़ना, गुर्दे की पत्थरी, मस्सा, बवासीर, भगंदर, मलद्वार में पफटे घाव बच्चेदानी में ट्यूमर, स्तन का ट्यूमर, ओवरी का ट्यूमर इत्यादि. ऐसी बीमारियों का बिना सजिर्कल किये हुए यदि होमियोपैथी चिकित्सा करायी जाये, तो रोगी इन समस्याओं से निजात पा सकता है .
भ्रांति : क्या होमियोपैथी दवा का सेवन करने से दवा का साइट इफेक्ट भी देखने को मिलता है?
सच: होमियोपैथी दवा का सेवन आसानी से किया जा सकता है, क्योंकि इन दवाओं का साइड इफेक्ट नहीं होता. दवा का तात्पर्य उन दवाओं से है, जो किसी विशेष अंग पर ही काम करती है या किसी विशेष अंग-तंत्र पर ही अपना प्रभाव दिखाती है.
जैसे- स्ट्रोप्टोमाइसिन एक एंटी टय़ूबरकूलर ड्रग है, जिसका क्षय रोग में बेहतरीन परिणाम हमें देखने को मिलता है, परंतु साइड इफेक्ट यह है कि ये कान की नस को प्रभावित करती है और बहरापन की समस्या उत्पन्न कर सकती है. होमियोपैथी दवा का चुनाव विशेष अंग या अंग-तंत्र के आधार पर नहीं किया जाता. होमियोपैथी दवा का चुनाव रोगी को ध्यान में रखते हुए उसके सम्मिलित लक्षणों के आधार पर किया जाता है. इसलिए होमियोपैथी चिकित्सा के अंतर्गत विपरीत साइड हमें देखने को नहीं मिलता.
भ्रांति : होमियोपैथी चिकित्सा के दौरान चाय, प्याज, लहसुन, अदरक, हींग आदि का सेवन वजिर्त है ?
सच : यह सत्य नहीं है. प्याज, लहसुन, चाय, कॉफी, पान आदि सभी होमियोपैथी दवा के प्रभाव को नष्ट नहीं करते हैं. कुछ ऐसी चीजें हैं, जो कुछ होमियोपैथी दवा की क्रिया में दखल देते हैं, जैसे-कपूर,अधिक नमक और लहसुन. जब आप कपूर लेते हैं, तो कपूर का उपयोग न करें. Natrium muriaticum दवा लेते हैं, तो ऊपर से अधिक नमक न लें. . Allium sativum दवा लेते समय लहसुन का उपयोग न करें. allium cepa लेते समय प्याज न खाएं. खाने पर परहेज रोग एवं दवा के चयन पर निर्भर करता है. ध्यान रखें कि होमियोपैथी दवा खाने के आधा घंटा पहले और आधा घंटा बाद सुगंधित चीजों को खाने से परहेज करें. यह एक प्रमाणिक तथ्य है कि होमियोपैथी दवा का असर, उन व्यक्तियों में ज्यादा अच्छा देखने को मिला है, जो व्यक्ति धूम्रपान, शराब, गुटखा आदि का सेवन नहीं करते हैं. होमियोपैथी दवा को लेने से पहले मुंह को साफ पानी से साफ कर लेना चाहिए और दवा को साफ जुबान पर ही लेना चाहिए.
चीनी की मात्र नगण्य
भ्रांति : क्या डायबिटिक व्यक्ति होमियोपैथी गोलियों का सेवन कर सकता है?
सच : जी हां, डायबिटीज से पीड़ित व्यक्ति भी इन गोलियों का सेवन कर सकता है, क्योंकि होमियोपैथी गोलियों में चीनी की मात्र न के बराबर होती है.
सेवन कर सकते हैं अंगरेजी दवा के साथ होमियोपैथी
भ्रांति : क्या होमियोपैथी दवाओं का सेवन अंगरेजी दवाओं के साथ किया जा सकता है?
सच: जी हां, होमियोपैथी दवाओं का सेवन कुछ अंगरेजी दवाओं के साथ भी किया जा सकता है जैसे- यदि कोई व्यक्ति जो डायबिटीज के रोगी हैं और इंसुलिन पर निर्भर हैं, तो हम उसका इंसुलिन नहीं बंद करवा सकते, परंतु यदि इस दौरान वह किसी एक्यूट और क्रोनिक डिजीज जैसे एक्जिमा, सराइसिस से ग्रसित होता है, तो हम बिना इंसुलिन बंद कराये होमियोपैथी दवा का प्रयोग कर सकते हैं. रोगी को लाभ मिलता है.
साभार: बिहार राज्य होमियोपैथी चिकित्सा बोर्ड, पटना

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

"माइग्रेन : होमियोपैथिक चिकित्सा"




होमियोपैथी में सिरदर्द और माइग्रेन का लाजवाब इलाज है, जरूरत बस, जरा से लक्षणों पर ध्यान देने की है। यहां हम ऐसे ही तमाम लक्षणों और होमियोपैथिक उपचार की चर्चा कर रहे हैं-सिर की पीड़ा को एक साधारण बीमारी माना जाता है तथा कोई भी ‘पेन-किलर गोली’ खाकर इससे छुटकारा पाने का प्रयास किया जाता है, किन्तु क्या हमने कभी सोचा है कि सिर दर्द स्वयं कोई बीमारी नहीं, बल्कि शरीर की किसी बीमारी का एक लक्षण मात्र है।

लक्षणों के अनुसार ‘माइग्रेन’ का उपचार:-
१. अगर सिर-दर्द अचानक ही उग्र रूप धारण कर लें, लगता हो कि दर्द से सर फट जायेगा। मानो सर पर कई हथौड़ों से वार किया जा रहा हो। रोशनी एवं बातचीत न सुहाती हो। लेटने से सिर दर्द बढ़ जाये एवं बैठने से कम हो। सर के दाहिने हिस्से में पीड़ा हो, तो बेलाडोना 200 की एक बूंद जीभ पर डालते ही मानो जादू हो जायेगा।

२. यदि आधी-शीशी का दर्द सिर के पिछले भाग या गुद्दी से शुरू होकर बांई आंख के ऊपर आकर टिक जाये अथवा सिर के बायें हिस्से में रहे तथा प्रातः काल शुरू होकर दोपहर तक बढ़ जाता हो तो इसे स्पाइजेलिया-30 दिन में 3 बार लेने पर अवश्य ठीक कर देगा।

३. अगर लू लगने से, रसोई में काम करते समय चूल्हे की गर्मी से अथवा बिजली के तेज प्रकाश में कार्य करने से सिर दर्द हो जाये या तकिये पर सिर रखने से दर्द बढ़ जाये। सारे सिर में तथा शरीर में तपकन, हड़कल (पल्सेशन) हो तो ग्लोनॉयन की 30वीं शक्ति का प्रयोग इस रोगी को आश्चर्यचकित रूप से स्वस्थ कर देगा।

४. सिर की गुद्दी में बिजली की लहर (करंट) के समान दर्द हो तथा सिर के दाहिने हिस्से को पकड़ता हो। सिरदर्द रोजाना निश्चित समय पर आता हो। सूर्य की गर्मी के साथ दर्द बढ़ता हो। लेटने अथवा नींद आने से आराम मिलता हो। किसी-किसी रोगी में दर्द दाहिनी आंख पर आकर टिक जाता है- इन लक्षणों पर सेंग्विनेरिया मूल अर्क की पांच-पांच बूंदे चौथाई कप पानी में डालकर दिन में 3 बार लेने पर आधा-शीशी जड़ से चली जाती है।

५. यदि गर्दन या कंधों की मांसपेशियों में ‘अकड़न’ हो तथा कनपटियों में भयंकर दर्द हो जो नाक अथवा ठोढ़ी तक चला जाता हो। सिर दर्द घट जाता हो तो यह जेल्सेसियम का निश्चित क्षेत्र है। इसकी कुछ ही मात्राएं इस प्रकार के ‘माइग्रेन’ को मिटा डालने में समर्थ है।

६. अगर जुकाम दबकर सिर के छोटे-छोटे स्थानों में दर्द ठहर गया हो, आंखों की भौओं को दबाने पर आराम मिलता हो। सिर के एक तरफ ही दर्द हो। दर्द का पूर्वाभास, आंखों के चुंधियाने के रूप में हो तो काली बाईक्रोम-30 दिन में 3 बार एक सप्ताह तक लेना चाहिए। इससे न केवल सिर-दर्द , बल्कि पुराना जुकाम अथवा साइनस का दर्द भी सदा के लिए विदा हो जायेगा।

७. ऐसा ‘सरदर्द’ मानो रोगी अंधा हो जायेगा। प्रातः उठने के साथ ही मानो सिर पर हजारों हथौड़े पर रहे हों। सूर्योदय से दर्द शुरू हो और सूर्य के साथ-साथ बढ़कर सूर्यास्त के समय मिट जाये अथवा घट जाये। रोगी अत्यन्त भावुक एवं संवेदनशीलता प्रकृति का हो अर्थात् जल्दी गुस्सा हो जाता हो अथवा रो पड़ता हो, नमकीन चीजों का प्रेमी हो। सूर्य की गर्मी से डरता हो। सिर दर्द के साथ ही जी मितलाता हो तथा बढ़ने पर उल्टी करता हो तो नेट्रमम्यूर-30 अथवा 200 शक्ति इसकी निश्चित दवा है। कमजोर शरीर वाले स्कूली छात्र-छात्राओं के सिर दर्द की भी यह अचूक औषधि है।

८. रात को सोते-सोते रोगी अचानक सिरदर्द के कारण उठ बैठे तथा भूख से भी तिलमिला उठता हो। नींद खुलने का कारण है-मानो अचानक किसी ने माथे पर चोट दे मारी हो। रोगी को गर्मी के मौसम में भारी सर्दी महसूस होती हो तथा शरीर पर अनावश्यक कपड़े लेपेटे रखता हो। बदन से एक अजीब तरह की दुर्गन्ध आती हो तो सोरिनम-200 की एक या दो मात्राएं दर्द को मिटाकर रोगी का नक्शा ही बदल डालती है।

९. सिर से पिछले हिस्से से उठने वाला दर्द जो पूरे सिर पर फैल जाता हो। सिर पर कपड़ा लपेटने से आराम मिलता हो। ठंडी हवा से सरदर्द बढ़ जाता हो। रोगी को फोड़े-फुंसी, गला पकना आदि बीमारियां समय-समय पर परेशान करती रहती हैं। हाथ-पैर ठंडे रहते हैं। इस ‘ठंडी प्रकृति’ के रोगी को साइलीशिया-30 की 4-4 गोलियां सुबह-शाम अपार शांति प्रदान करने में समर्थ हैं।

१० अगर युवावस्था में सिर में फुंसियां निकली हों जिन्हें दवाइयों से दबा दिया गया हो। इस कारण से भयंकर सिर दर्द होता हो। दर्द में लगता हो जैसे सिर पर हथौड़े चल रहे हों। रक्त संचय के कारण होने वाले सरदर्द में कैलकेरिया कार्ब-30 बेहतरीन औषधि है।

११. खासकर ऐसी महिलाओं में जिन्हें मासिक में रक्तस्राव अधिक होता हो तथा दो मासिक के बीच सिर दर्द की शिकायत हो तो कैलकेरिया कार्ब-30 की एक-एक मात्रा हर तीसरे दिन कुछ दिनों तक देना चाहिए।

१२. एक निश्चित अन्तराल के बाद होने वाला सिरदर्द, जो बांई आंख के ऊपर काटता-सा, शाम को शुरू होकर रात में अपनी तीव्रता के शिखर पर पहुंचता हो, के लिए सल्फर-30 की 4-5 गोली प्रत्येक दो घंटे में जीभ पर रखकर चूसें।

१३. पेट की गड़बड़ी या पुराने कब्ज के कारण भी, जब रक्त का प्रवाह मस्तिष्क की ओर हो जाता है, तब तेज सिरदर्द होने लगता है। इस सिरदर्द में हरकत से रोग बढ़ता है। सिर आगे की ओर झुकाने से लगता है कि सिर फट पड़ेगा। ऐसे में ब्रायोनिया-30 उपयोगी है।

१४. क्रोधी, चिड़चिड़े स्वभाव के ऐसे व्यक्ति जिन्हें वात व्याधि रहती हो, जोड़ों में दर्द होता हो। उनमें सिरदर्द दाहिनी कनपटी में या माथे के एक तरफ से शुरू होता है। कभी-कभी क्रोध करने पर यह दर्द गर्दन और बाजू तक आ पहुंचता है। इसमें ब्रायोनिया-30 मूल अर्क की दो-दो बूंदे निश्चित अंतराल से लेने से लाभ होता है।
१५. इसके अतिरिक्त भी नक्स वोमिका, पल्सटिल्ला, एकोनाइट, नेट्रमसल्फ आदि दवाइयां विभिन्न शक्तियों में चिकित्सक के परामर्शनुसार लेने पर इस रोग को जड़ मूल से मिटाया जा सकता है।

फिर भी  मैं यह कहना चाहूंगा कि हमें ‘सिरदर्द’ को एक साधारण रोग समझ कर इसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। बल्कि इसका कारण जानकर जल्दी से जल्दी इसकी चिकित्सा करानी चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि साधारण-सा ‘सरदर्द’ हमारे लिए ‘मेनिन्जाइटिस’, ‘सिस्टीसरकोसि अथवा ‘ब्रेनट्यूमर’ का रूप धारण कर ले और अत्यन्त गम्भीर अथवा जानलेवा सिध्द हो। 

मंगलवार, 26 मार्च 2013

बच्चों का बुढ़ापा:प्रोजेरिया (Progeria)





2009 में रिलीज हुई हिंदी फिल्म "पा" को आप सब ने देखा होगा.इसमें अमिताभ बच्चन जी ने प्रोजेरिया रोग से ग्रस्त बच्चे (ओरो)की भूमिका की है.आज तक कुदरत की  कलाकारी को कोई भी नहीं समझ पाया। इंसान चाहे कितना पढ़-लिख जाये, लेकिन प्रकृति किसी भी कदम को समझने में कहीं भी सफल नहीं हो पाता। जब फेल हो जाता है तो हार मानकर कह देता है कुछ समझ में नहीं आ रहा है।प्रकृति किसी को लम्बा तो दूसरे को ठिगना, तीसरे को गहरा काला तो उसकी तुलना में अगले को निहायत गोरा। एक को इतना मोटा कि बैठे-बैठे ही सांस लेनी मुश्किल तो उसके विपरीत एक और को बेहद पतला कि लगे जैसे हवा में उड़ जायेगा। ऐसे ही इंसान में एक बीमारी हो जाती है, जिसमें यह छोटी उम्र में ही बुजुर्ग जैसा लगने लगता है। यह प्रेजेरिया कहलाती है।प्रोजेरिया (Progeria) एक ऐसा रोग है जिसमें कम उम्र के बच्चों में भी बुढ़ापे के लक्षण दिखने लगते हैं। यह अत्यन्त दुर्लभ (rare) वंशानुगत रोग है। इसे 'हचिंगसन-गिल्फोर्ड प्रोजेरिया सिंड्रोम' या हचिंगसन-गिल्फोर्ड सिंड्रोम' भी कहते हैं।
                             यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें शिशु अपने जीवनचक्र के दौरान बाल्यकाल, किशोरावस्था और युवावस्था के चरणों को पार कर वृद्धावस्था की तरफ अग्रसर होने की बजाय दो-तीन साल की उम्र में ही बुढ़ापे की तरफ बढ़ने लगता है और इस बीमारी की चपेट में आने वाले बच्चों का जीवन चक्र महज 13 से 21 साल की उम्र तक ही पूरा हो पाता है। प्रोजेरिया को हटचिंसन गिलफोर्ड सिंड्रोम भी कहा जाता है।
                             प्रोजेरिया एक आनुवांशिक बीमारी है। लैमिन-ए जीन में गड़बड़ी होने की वजह से यह बीमारी होती है। यह बीमारी अचानक ही हो जाती है और 100 में से एक मामले में ही यह बीमारी अगली पीढ़ी तक जाती है। ये एक विरली बीमारी रोग है और इसीलिए करीब 80 लाख में से एक व्यक्ति में पाई जाती है।आर्टेमिस अस्पताल के डॉ. छाबड़ा का कहना है कि प्रोजेरिया एक जन्मजात बीमारी और इसमें खास ध्यान देने वाली बात यह है कि जैसे बुढ़ापे में ट्यूमर होता है, इसमें वह नहीं होता है। ज्यादातर बदलाव त्वचा, धमनी और माँसपेशियों में ही रहते हैं। आमतौर पर दो साल की उम्र तक ऐसे लक्षण दिखने लग जाते हैं जिनसे पता लगाया जा सकता है कि बच्चे की वृद्धि नहीं हो रही है। बाल झड़ जाते हैं और दाँत खराब होने लगते हैं। अभी तक इसका कोई इलाज नहीं आया है। इस बारे में अभी तक प्रयोग के आधार पर जो भी कोशिश हो रही हैं उनका मकसद इनमें कोलेस्ट्रोल को कम करना है ताकि उनके जीवन को लंबा किया जा सके।
 
                            बीमार को ऐसे पहचान सकते हैं- मानसिक उम्र उतनी ही, लेकिन शारीरिक उम्र बढ़ती जाती है। मतलब बहुत कम उम्र में ही बुजुर्गों जैसे लक्षण व हाव-भाव दिखने लगते हैं।
- 12-13 वर्ष उम्र में पहुंचते-पहुंचते 64-65 वर्ष उम्र वाले जैसा दिखाई पड़ने लगता है।
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शरीर से चर्बी कम होती जाती है।
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हड्डियों का विकास रूक-सा जाता है।
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शारीरिक विकास अधिक होता है।
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गंजापन।
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चेहरा छोटा, जबड़ा भी छोटा होता जाता है।
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शरीर की खाल में बुजुर्गों जैसी झुर्रियां पड़ती जाती है।
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खून नलियों में बुजुर्गों की तरह कड़ापन (ऐथेरो स्क्लीरोसिस)।
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त्वचा रोग (स्क्लेरोडर्मा)।
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नाक पिचकी हुई।
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दिल की बीमारियां भी हो सकती हैं
रोगी का इलाज ऐसे हो सकता है  इसका इलाज मुश्किल हे लेकिन फिर भी हार्मोनिक थैरोपी से थोड़ा बहुत लाभ हो सकता है।
होमियोपैथिक चिकित्सा यह पैथी किसी विशेष बीमारी का इलाज न कर लक्षणों के आधार पर व्यक्ति की पीड़ा में मानसिक व शारीरिक तौर पर लाभ पहुंचाती है। समान लक्षणों के आधार पर काफी हद तक लाभ पहुंचा सकती है जैसे-
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उम्र से अधिक लगना-बैरायटा कार्ब, कैल्के, फॉस आदि।
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गंजापन- नैट्रम म्यौर, एसिड फॉस आदि।
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झुर्रीदार खाल बुजुर्गों जैसी-एब्रोटे, क्रियोजोट आदि।
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दिली बीमारी- कैक्टस, क्रैटेगस आदि।
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खून की कमी-फैरम फॉस, लिसिथिन आदि।
रोगी की मृत्यु  लगभग दस वर्ष उम्र से कम समय में दिली बीमारी से हो सकता है।
 



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