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गुरुवार, 23 मई 2013

भोजन में फाइबर की जरूरत


स्वास्थ्य चर्चा के क्रम में आज हम भोजन में फाइबर की उपयोगिता के बारे में चर्चा करेंगे.वैसे तो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अनेक तरह की बीमारियाँ हमें अपनी चपेट में ले चुकी हैं लेकिन आमतौर पर जिस बीमारी से आज हर इंसान परेशान है, वह है पेट की बीमारी। आज ज्यादातर लोग पेट दर्द, एसिडिटी, जलन, खट्टी डकार जैसी पेट की बीमारियों से परेशान हैं। इस तरह की समस्याएँ रेशेदार भोजन न करने से होती हैं। 
                                  भोजन के उचित पाचन के लिए फाइबर की जरुरत होती है। आपको यह महसूस कराने के लिए कि आपका पेट भरा है, आहार संबंधी फाइबर आवश्यक है। फाइबर की कमी से कब्ज़, बवासीर तथा रक्त में कोलोस्ट्राल और शक्कर की मात्रा का बढ़ना आदि समस्याएँ आ सकती हैं। इसके विपरीत इसकी अत्यधिक मात्रा के उपयोग से आंतडियों में परेशानी, दस्त या निर्जलीकरण की समस्या भी आ सकती है। वे व्यक्ति जो अपने भोजन में फाइबर के सेवन को बढ़ाते हैं, उन्हें पानी का सेवन भी बढ़ाना चाहिए। जब फाइबर की बात आती है तो छोटे से परिवर्तन आपके फाइबर के सेवन और और समग्र स्वास्थ्य पर एक बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं। फाइबर के सेवन से दिल की बीमारी, मधुमेह, मोटापा और विशिष्ट प्रकार के कैंसर से बचा जा सकता है। महिलाओं को दिनभर में 25 ग्राम रेशा और पुरुषों को लगभग 35 से 40 ग्राम रेशे की आवश्‍यकता होती है। लेकिन हम केवल 15 ग्राम रेशा ही खा पाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि आप अपना मनपसंद खाना छोड़ दें या अपनी जीवनशैली में बदलाव लाएं।
           फाइबर दो तरह का होता है। पहला जल में घुलनशीन और दूसरा अघुलनशील होता है। ये दोनों साथ मिल कर आंतो की सफाई करते हैं। आंतो को स्वास्थ और सुरक्षा प्रदान करते हैं।
घुलनशील फाइबर जैसे पेक्टिन, गम आदि हमे बेरी प्रजाति के फल, अलसी, आड़ू,सेब, ओट, ग्वार की फली आदि से प्राप्त होता है। आंत के प्रोबायोटिक जीवाणु इसका फर्मेंटेशन करते हैं, जिससे शॉर्ट चेन फैटी एसिड बनते हैं। ये जीवाणुओं को पोषण देता है। अघुलनशील फाइबर हमें साबुत अन्न, अलसी, दाल, मटर, मसूर, मेवे, सब्जी और फलों से प्राप्त होता है। इनका फर्मेंटेशन नहीं होता है। लेकिन फिर भी ये बड़े काम की चीज है। ये मल को आयतन प्रदान करते हैं और मल को बाहर निकालने में मदद करते हैं। 

घुलनशील फाइबर के फायदे

१.हृदय रोग का जोखिम कम करता है।
२.रक्त शर्करा को नियंत्रित रखता है।
३.आंतो में हितकारी जीवाणुओं का विकास और पोषण करता है।
४.अतिसक्रिय आहार पथ को सांत्वना और आराम पहुँचाता है।
५.बुरे कॉलेस्टेरोल को कम करता है।

अघुलनशील फाइबर के फायदे

१.कब्जी और दस्त दोनों को ठीक करता है।
२.आंत का शोधन, मर्दन और उपचार करता है।
३.टॉक्सिन, कॉलेस्टेरोल, अपशिष्ट को बाहर निकालता है।
४.आंतो की अम्लता को कम करता है।
५.आंतों को कैंसर से बचाता है।
६.यह मल को आकार और आयतन प्रदान करता है।
७.यह छोटी आंत में जमे मलवे और म्यूकस को भी साफ करता चलता है, जिससे पोषक तत्वों का अवशोषण ८.बेहतर हो जाता है।
९.अघुलनशील फाइबर को बाहर निकालने में आंतों की मशक्कत और कसरत भी हो जाती है।


यहाँ कुछ खाद्य पदार्थ बताए गए हैं जिनका उपयोग करके आप फाइबर को अपने आहार में शामिल कर सकते हैं:
                                    
मक्का: फाइबर युक्त अनाज चुनें। ऐसा अनाज चुनें जिसके एक बार के परोसे गए हिस्से में कम से कम 4 ग्राम फाइबर हो जैसे मक्का आदि।

दालें: अपने नियमित अनाज में उच्च फाइबर युक्त अनाज मिलाएं जैसे राजमा, विभिन्न प्रकार की दालें आदि।

फल: फलों का सेवन ज़्यादा करें। नाश्ते या मिष्ठान्न के रूप में फल खाएं और फलों का रस सीमित मात्रा में पीएं। सेब और नाशपाती जैसे फलों को छिलके सहित खाएं। छिलकों में ही सबसे अधिक फाइबर होता है।


रेशेदार सब्‍जियां :सब्ज़ियों का सेवन अधिक करें। सब्जियाँ फाइबर का अच्छा स्त्रोत हैं उदाहरण के लिए मूली, पत्तागोभी आदि।

ब्राउन ब्रेड : गेंहूँ से बनी हुई ब्रेड और पास्ता का उपयोग करें।

सूखे मेवे: सलाद, दही या अन्न में सूखे मेवे, दानें मिलाएं।

गेहूँ का आटासाबूत गेहूं में रेशेदार चोकर पाया जाता है, जो पाचनतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है।अपने मनपसंद व्यंजनों में मैदे के स्थान पर गेंहूँ के आटे का उपयोग करें।गेहूं का चोकर फाइबर का सबसे संक्रेन्द्रित स्रोत है।गेहूं के चोकर में अघुलनशील फाइबर होता है, जिसे सैलूलोज कहते हैं। इसमें कैल्सियम, सिलीनियम, मैग्नीशियम, पोटैसियम, फॉस्फोरस जैसे खनिजों के साथ-साथ विटमिन ई और बी कॉम्प्लेक्स पाए जाते हैं।
ब्राउन चावल :सामान्य चांवल के स्थान पर ब्राउन राईस का उपयोग करें।

मटर : मटर को चाहे उबाल कर खाएं या फिर कच्‍ची ही खाइये। एक कप मटर के दानों में 16.3 ग्राम रेशा मिलेगा।

ओटमील : ओट्स में बीटा ग्‍लूकन होता है जो कि एक स्‍पेशल टाइप का फाइबर होता है। यह कोलेस्‍ट्रॉल लेवल को कम कर के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है।

मंगलवार, 26 मार्च 2013

बच्चों का बुढ़ापा:प्रोजेरिया (Progeria)





2009 में रिलीज हुई हिंदी फिल्म "पा" को आप सब ने देखा होगा.इसमें अमिताभ बच्चन जी ने प्रोजेरिया रोग से ग्रस्त बच्चे (ओरो)की भूमिका की है.आज तक कुदरत की  कलाकारी को कोई भी नहीं समझ पाया। इंसान चाहे कितना पढ़-लिख जाये, लेकिन प्रकृति किसी भी कदम को समझने में कहीं भी सफल नहीं हो पाता। जब फेल हो जाता है तो हार मानकर कह देता है कुछ समझ में नहीं आ रहा है।प्रकृति किसी को लम्बा तो दूसरे को ठिगना, तीसरे को गहरा काला तो उसकी तुलना में अगले को निहायत गोरा। एक को इतना मोटा कि बैठे-बैठे ही सांस लेनी मुश्किल तो उसके विपरीत एक और को बेहद पतला कि लगे जैसे हवा में उड़ जायेगा। ऐसे ही इंसान में एक बीमारी हो जाती है, जिसमें यह छोटी उम्र में ही बुजुर्ग जैसा लगने लगता है। यह प्रेजेरिया कहलाती है।प्रोजेरिया (Progeria) एक ऐसा रोग है जिसमें कम उम्र के बच्चों में भी बुढ़ापे के लक्षण दिखने लगते हैं। यह अत्यन्त दुर्लभ (rare) वंशानुगत रोग है। इसे 'हचिंगसन-गिल्फोर्ड प्रोजेरिया सिंड्रोम' या हचिंगसन-गिल्फोर्ड सिंड्रोम' भी कहते हैं।
                             यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें शिशु अपने जीवनचक्र के दौरान बाल्यकाल, किशोरावस्था और युवावस्था के चरणों को पार कर वृद्धावस्था की तरफ अग्रसर होने की बजाय दो-तीन साल की उम्र में ही बुढ़ापे की तरफ बढ़ने लगता है और इस बीमारी की चपेट में आने वाले बच्चों का जीवन चक्र महज 13 से 21 साल की उम्र तक ही पूरा हो पाता है। प्रोजेरिया को हटचिंसन गिलफोर्ड सिंड्रोम भी कहा जाता है।
                             प्रोजेरिया एक आनुवांशिक बीमारी है। लैमिन-ए जीन में गड़बड़ी होने की वजह से यह बीमारी होती है। यह बीमारी अचानक ही हो जाती है और 100 में से एक मामले में ही यह बीमारी अगली पीढ़ी तक जाती है। ये एक विरली बीमारी रोग है और इसीलिए करीब 80 लाख में से एक व्यक्ति में पाई जाती है।आर्टेमिस अस्पताल के डॉ. छाबड़ा का कहना है कि प्रोजेरिया एक जन्मजात बीमारी और इसमें खास ध्यान देने वाली बात यह है कि जैसे बुढ़ापे में ट्यूमर होता है, इसमें वह नहीं होता है। ज्यादातर बदलाव त्वचा, धमनी और माँसपेशियों में ही रहते हैं। आमतौर पर दो साल की उम्र तक ऐसे लक्षण दिखने लग जाते हैं जिनसे पता लगाया जा सकता है कि बच्चे की वृद्धि नहीं हो रही है। बाल झड़ जाते हैं और दाँत खराब होने लगते हैं। अभी तक इसका कोई इलाज नहीं आया है। इस बारे में अभी तक प्रयोग के आधार पर जो भी कोशिश हो रही हैं उनका मकसद इनमें कोलेस्ट्रोल को कम करना है ताकि उनके जीवन को लंबा किया जा सके।
 
                            बीमार को ऐसे पहचान सकते हैं- मानसिक उम्र उतनी ही, लेकिन शारीरिक उम्र बढ़ती जाती है। मतलब बहुत कम उम्र में ही बुजुर्गों जैसे लक्षण व हाव-भाव दिखने लगते हैं।
- 12-13 वर्ष उम्र में पहुंचते-पहुंचते 64-65 वर्ष उम्र वाले जैसा दिखाई पड़ने लगता है।
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शरीर से चर्बी कम होती जाती है।
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हड्डियों का विकास रूक-सा जाता है।
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शारीरिक विकास अधिक होता है।
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गंजापन।
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चेहरा छोटा, जबड़ा भी छोटा होता जाता है।
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शरीर की खाल में बुजुर्गों जैसी झुर्रियां पड़ती जाती है।
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खून नलियों में बुजुर्गों की तरह कड़ापन (ऐथेरो स्क्लीरोसिस)।
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त्वचा रोग (स्क्लेरोडर्मा)।
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नाक पिचकी हुई।
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दिल की बीमारियां भी हो सकती हैं
रोगी का इलाज ऐसे हो सकता है  इसका इलाज मुश्किल हे लेकिन फिर भी हार्मोनिक थैरोपी से थोड़ा बहुत लाभ हो सकता है।
होमियोपैथिक चिकित्सा यह पैथी किसी विशेष बीमारी का इलाज न कर लक्षणों के आधार पर व्यक्ति की पीड़ा में मानसिक व शारीरिक तौर पर लाभ पहुंचाती है। समान लक्षणों के आधार पर काफी हद तक लाभ पहुंचा सकती है जैसे-
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उम्र से अधिक लगना-बैरायटा कार्ब, कैल्के, फॉस आदि।
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गंजापन- नैट्रम म्यौर, एसिड फॉस आदि।
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झुर्रीदार खाल बुजुर्गों जैसी-एब्रोटे, क्रियोजोट आदि।
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दिली बीमारी- कैक्टस, क्रैटेगस आदि।
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खून की कमी-फैरम फॉस, लिसिथिन आदि।
रोगी की मृत्यु  लगभग दस वर्ष उम्र से कम समय में दिली बीमारी से हो सकता है।
 



सोमवार, 28 जनवरी 2013

स्वास्थ संजीवनी

गतिशीलता ही जीवन है और गतिहीनता ही मृत्यु। गतिशील जीवन ही भविष्य में पल्लवित और पुष्पित होता हुआ संसार को सौरभमय बना देता है।मन की प्रफुल्ता से हमारा स्वास्थ भी सुन्दर और निरोग रहता है।जीवन जीना और स्वस्थ रहना एक मानवीय आवश्यकता के साथ साथ एक कला भी है ,यदि सही तरीके से कुछ नियमानुसार जिन्दगी को ढाल ले तो बहुत हद तक हम सुखी एंव निरोग रह सकते है। जैसे की कोई भी काम एक प्लान के अनुसार शुरू करते हैं उसी प्रकार हमारी दिनचर्या या जीवन शैली भी एक प्लान के अनुसार होनी चाहिए। आज हम इन्ही कुछ खास बिन्दुओ पर प्रकाश डालेंगे।
  1. सूर्योदय से दो घंटे पहले हमे अवश्य जग जाना चाहिए।देर तक सोना स्वस्थ के लिए बहुत ही हानिकारक है।इस समय प्रकृति मुक्तहस्त से स्वास्थ्य,प्राणवायु, प्रसन्नता, मेघा, बुद्धि की वर्षा करती है। 
  2. सुबह उठ कर तांबे के लोटे में भरा पानी का सेवन जो रात्रि में ही रखा हो करना चाहिए,कम से कम दो ग्लास की मात्रा होनी चाहिए। बासी मुँह 2-3 गिलास शीतल जल के सेवन की आदत सिरदर्द, अम्लपित्त, कब्ज, मोटापा, रक्तचाप, नैत्र रोग, अपच सहित कई रोगों से हमारा बचाव करती है।
  3. नित्य क्रिया के पश्चात सुबह में एक मील तक टहलने अवश्य ही जाये। उसके बाद प्राणायाम,आसन और व्यायाम 15 से 20 मिनट करना चाहिए।
  4. प्रतिदिन हो सके तो गुनगुने पानी से रगड़  रगड़ स्नान करना सेहत के लिए बहुत ही लाभदायक है। स्नान के समय सर्वप्रथम जल सिर पर डालना चाहिए, ऐसा करने से मस्तिष्क की गर्मी पैरों से निकल जाती है
  5. सूर्य स्नान भी शरीर के लिए बहुत ही लाभप्रद है।इससे प्राकृतिक रूप से विटामिन 'डी' की प्राप्ति होती है। सुबह में आधे घंटे धुप में बैठे।
  6. हो सके तो प्रतिदिन नही तो सप्ताह में सरसों तेल या ओलिव आयल से शरीर की अच्छी तरह से मालिस करनी चाहिए।
  7. सुबह का नास्ता  सुपाच्य और पौष्टिक होना चाहिए।सुबह में नास्ते  की आदत अवश्य डाले।
  8. भोजन करने से पूर्व हाथ की अच्छी तरह से साफ कर  लेना नितांत आवश्यक है।
  9. ठूस ठूस कर  खाने से बचना चाहिए। हमेश भोजन भूख से कम ही करना बेहतर है।
  10. भोजन हमेशा शांतचित  होकर करना चाहिये। प्रत्येक निवाला को खूब चबा चबाकर  खाना चाहिए।
  11. भोजन करने के क्रम में बार बार पानी नही पीनी चाहिये। आवश्यकता के अनुसार  दो-चार घूंट पी  सकते हैं। भोजन करने के लगभग 45 मिनट बाद ही पानी पीनी चाहिये। एक बात और भोजन से पहले भी पानी का  सेवन न करे,नही तो जठराग्नि मंद पड़ जाती है।
  12. सुलभता के अनुसार भोजन में सलाद, हरी साग-सब्जी,और मौसमी फलो का सेवन करना चाहिए।
  13. भोजन के अंत में मठ्ठा का सेवन भी पाचन के लिए लाभप्रद है।
  14. भोजन के बाद  हाथ और दाँतों  की अच्छी तरह सफाई करनी चाहिये। भोजन के बाद  लघुशंका कर  थोड़ी देर टहलना भी चाहिए।
  15. भोजन करते समय ढीले ढाले वस्त्रों को ही धारण करना चाहिए।
  16. प्रकृति विरुद्ध,मौसम विरुद्ध और  शरीर विरुद्ध भोजन से वचना चाहिए। भोजन ज्यादा गरम  या ज्यादा ठंडा भी नही होना चाहिए। बसी भोजन से परहेज करना चाहिए।
  17. सप्ताह में एक दिन उपवास भी आवश्यक है,उस दिन अन्न का सेवन न करें,कुछ फल के रस का ही सेवन करें।इससे हमारा स्वास्थ ठीक रहता है,पेट सबंधी बीमारियों से बचाव होता है।
  18. भोजन के तुरंत बाद सोना कई बिमारियों को न्योता देना है।
  19. रात्रि का भोजन सोने के तीन  घंटे पहले करें। यदि रात्रि फल, दूध  लेना है तो भोजन के एक घंटे बाद लें।
  20. खाने के तुरंत बाद सहवास से बचना चाहिए। सहवास के तुरंत बाद शिशु को माँ का दूध वर्जित है।
  21. सोने से पहले हाथ-पैर धोकर पोंछ ले, अपने इष्टदेव का स्मरण करते हुए सो जाएँ। सर्वप्रथम चित होकर दस सांसे ले,फिर दायें करवट छः गहरी सांसे लें,फिर बायीं करवट लेकर सो जाएँ।
  22. सोने के समय मुहँ ढँक कर  नही सोना चाहिए। सोने का कमरा भी हवादार हो बहुत ही अच्छा।
  23. सोने से पहले संगीत सुनना  भी लाभप्रद है।
  24. यदि स्वस्थ रहना है तो शराब,धूम्रपान और बुरे व्यसनों से दूर रहना चाहिए।
  25. दिन में सोने से जठराग्नि मंद पड़ जाती है।जिससे शरीर में भारीपन,शरीर टूटना,जी  मिचलाना ,सिरदर्द,ह्रदय में भारीपन अदि लक्षण उत्पन्न हो जाते है।
  26. रात्रि जागरण से वात की वृद्धि होती है,जिससे शरीर रुक्ष होता है।बैठे बैठे थोड़ी  झपकी लेना स्वास्थ  के लिए अच्छा है।
  27.  दिन में 2 बार मुँह में जल भरकर, नैत्रों को शीतल जल से धोना नेत्र दृष्टि के लिए लाभकारी है।
  28. नहाने से पूर्व, सोने से पूर्व एवं भोजन के पश्चात् मूत्र त्याग अवश्य करना चाहिए। यह आदत आपको कमर दर्द, पथरी तथा मूत्र सम्बन्धी बीमारियों से बचाती है।
  29. भोजन के प्रारम्भ में मधुर-रस (मीठा), मध्य में अम्ल, लवण रस (खट्टा, नमकीन) तथा अन्त में कटु, तिक्त, कषाय (तीखा, चटपटा, कसेला) रस के पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
  30. स्वास्थ्य चाहने वाले व्यक्ति को मूत्र, मल, शुक्र, अपानवायु, वमन, छींक, डकार, जंभाई, प्यास, आँसू नींद और परिश्रमजन्य श्वास के वेगों को उत्पन्न होने के साथ ही शरीर से बाहर निकाल देना चाहिए।


     (नोट:आपकी अच्छी दिनचर्या के इंतजार में, आपका परामर्श सर आँखों पर।)

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