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मंगलवार, 30 जनवरी 2018

मांसपेशियों के दर्द: Homeopathic treatment for muscle aches

मांसपेशियों में दर्द बहुत आम है, और कई अलग अलग चीजों के कारण हो सकता है। कोई चीज़ पकड़ते या उठाते हुए, सीढ़ियां चढ़ते हुए या फिर तेज भागने से मांसपेशियां खिंच सकती है। इसे मांसपेशियों में खिंचाव या तनाव कहा जाता है। मांसपेशियों का ये खिंचाव हाथ, पैर, जोड़ों या पीठ में हो सकता है। इसके अलावा इससे घुटने, कंधे, कोहनी में सूजन या दर्द भी उठ सकता है। कभी कभी बहुत अधिक व्यायाम करने से भी मांसपेशियों में दर्द हो जाता है। आजकल की व्‍यस्‍त और भाग-दौड़ भरी दिनचर्या में मांसपेशियों में दर्द एक आम समस्‍या बन गई है। वैसे तो मांसपेशियों का दर्द किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है, लेकिन तीस से चालीस वर्ष की आयुवर्ग के युवाओं में यह समस्‍या तेजी से बढ़ रही है। इस दर्द का सामना कुछ लोगों को कभी-कभी होता है, लेकिन कुछ लोगों को स्थाई रूप से इसका सामना करना पड़ता है।

Homeopathic Remedies for muscle pain and aches

मांसपेशियों के दर्द को होम्योपैथिक औषधियों से दूर करने के लिए कुछ प्रभावी उपचार उपलब्ध है।

Homeopathic Medicines to Help You Beat Spring Aches and Pain

Homeopathic treatment for muscle aches

What is the top best homeopathic cure for muscle pain and weakness?

Top 4 homeopathic medicine for muscle pain and weakness

आर्निका: मांसपेशियों के दर्द में आर्निका एक प्रभावी औषधि है। चोट लगने या गिरने के कारण होनेवाले माँसपेशियों के दर्द में आर्निका उपयोगी है। चोट लगने में सबसे पहले आर्निका की तरफ ध्यान जाता है। इस औषधि के लोशन का बाह्य उपयोग भी लाभकारी है।

Single medicines like Arnica montana help relieve these common spring aches and pain.

सिमसिफुएगा: इसे ऐक्टिया रेसिमोसा भी कहा जाता है। शारीरिक-लक्षणों के दब जाने पर मानसिक-लक्षणों का प्रकट हो जाना और मानसिक-लक्षणों के दब जाने पर शारीरिक-लक्षणों का प्रकट होना इस औषधि का विशेष गुण है। यह शीत-प्रधान औषधि है। Often times people that will benefit from cimicifuga are prone to depression and hormone imbalance.

नक्स वोमिका: नक्सवोमिका मासपेशियों के दर्द में काफी प्रभावी रूप से असर करती है। मासपेशियों के ऐठन, अकड़न का भाव दिखाई पड़ता है। Often times people that will benefit from nux vomica suffer from digestive problems such as heartburn or stomach aches and they are easily irritated or constantly feel fatigued.  नक्स प्रकृति का व्यक्ति बड़ा नाजुक-मिजाज (Oversensitive) होता है। ऊंची आवाज, तेज रोशनी, हवा का तेज झोंका – किसी चीज को बर्दाश्त नहीं कर सकता।  नक्स को जहां तक संभव हो, प्रात:काल नहीं देना चाहिये। औषधि लेने के बाद किसी प्रकार का मानसिक-कार्य-पढ़ना-लिखना, वाद-विवाद, ध्यान आदि नहीं करना चाहिये।

रस टॉक्स: विश्राम से रोग-वृद्धि; हरकत से रोग घटना, प्रथम हरकत से दर्द, गर्मी से, गर्मी सूखी हवा से रोग में कमी नमी या ठंड को न सह सकना, लगातार हरकत से रोग में कमी गर्मी या पसीने की हालत में भीग जाने या ठंड लगने से उत्पन्न हुए रोग मांसपेशियों के अकड़ जाने से उनमें दर्द होने से बेचैनी आदि लक्षण रहने पर यह औषधि कारगर है मांसपेशियों के दर्द में। इस औषधि का मुख्य प्रभाव मांसपेशियों, पुट्ठों पर होता है। मांसपेशियों के पुट्ठे अकड़ जाते हैं, दर्द करने लगते हैं। This treatment works best if the symptoms tend to improve when the person is active or applies warm applications.

Also read slip disc problem

इन मुख्य औषधियों के अलावा बहुत सारी होमियोपैथिक औषधियाँ जो मांसपेशियों के दर्द में लक्षणानुसार उपयोग की जाती हैं, जैसे की ब्रायोनिया, मैग फास, क्यूप्रम मेटालिकम ,रूटा  आदि।    


शनिवार, 20 मई 2017

"आँख आना" (Conjunctivitis)


Conjunctivitis

सुर्ख लाल गुलाबी आंखें, उनसे रिसता पानी, सूजी हुई पलके, उनका चिपचिपापन ‘आंख आने’ का पर्याय हैं। बोल-चाल की भाषा का यह पर्याय आंख के रोगी होने का सूचक है जिसे चिकित्सा की भाषा में कंजंक्टिवाइटिस कहा जाता है। Conjunctivitis एक आम वायरल इन्फ़ेक्शन है जो कभी-कभी बैक्टीरिया से भी होता है, इसे आम भाषा में आँख आना कहते हैं .इस बीमारी में आखों के उजले भाग पर संक्रमण हो जाता है और इसका रंग लाल हो जाता है। यह संक्रमण एक आदमी से दूसरे तक आसानी से पहुंचता है। हालांकि कई बार धूल, धुंआ और प्रदूषण से भी यह समस्या हो जाती है।इस बीमारी के दौरान संक्रमित इंसान को आंखों में खुजली, धुंधला दिखना जैसी समस्याएं होती हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, दिन में खूब पानी पीना इससे बचने का एक अच्छा उपाय है। इसके अलावा हरी सब्जियों, ताजे फलों का सेवन, अच्छी नींद लेना आदि भी इस बीमारी को दूर रखने में मदद करता है। ठंडी चीजों, जैसे ककड़ी आदि को आखों पर रखने से भी इस मौसम में ताजगी महसूस होती है।
लक्षण :

The eyes feel light prick when the eye comes and it feels like something stuck in the eye. In this disease, pain is also caused by opening an eye and the thickness of the disease also increases due to the disease, so the eyelids stick in the night.
This is an infectious disease. It also spread through the use of patient towels or handkerchief. Today, we are telling you some of its home remedies that you can easily get comfort in this disease.
अचानक एक या दोनों आंखों में जलन आरंभ होती है और किरकिरापन महसूस होता है। आंखें लाल-गुलाबी हो जाती हैं, उनमें सूजन, पानी व मवाद आने की स्थिति प्रकट होती है। सोकर उठने पर पलकों के बाल आपस में चिपके मिलते हैं, आंख खोलना मुश्किल हो जाता है। कभी-कभी दर्द व खाज की भी शिकायत होती है। आंखें थकी सी रहती है, पढ़ना-तेज रोशनी में देखना कठिन हो जाता है। रोग अधिक उग्र होने पर नेत्र-श्लेष्मिका का सूक्ष्म रक्त नाड़ियों से रक्तस्राव भी संभव है।

Symptoms

Bacterial conjunctivitis affects both eyes. The eyes will usually feel gritty and irritated with a sticky discharge.
The eyelids may be stuck together, particularly in the mornings, and there may be discharge or crusting on the eyelashes.

आंख आने` की बीमारी के बचने के कुछ उपाए-
  • संक्रमित आंख को छूने या रगड़ने से बचें।
  • दिन में अपनी आंखों को कई बार ठंडे पानी से धोएं। खासकर दिनभर के काम के बाद घर लौटने पर यह जरूर करें।
  • किसी दूसरे का तौलिया, रूमाल, तकिया, बिस्तर आदि इस्तेमाल करने से बचें।
  • दुपहिया वाहन पर चलते समय हमेशा धूप के चश्मे का इस्तेमाल करें।
  • हमेशा चश्मा पहन कर ही तैराकी करें।
  • जो इस बीमारी से पहले से ही ग्रसित हैं, उनसे दूर रहें।
  • आंखों पर जोर देने वाला कोई काम न करें। घर में बैठकर आराम करें। आपके साथ उनका भी भला होगा, जिनको आपके कारण रोग हो सकता है। प्रभावित आंख के छूने के बाद दरवाजे की चिटकनी, बर्तन, फ्लश की जंजीर आदि को छुएं तो तौलिए के माध्यम से। अन्य लोभ भी रोगी की आंखों से अपनी आंख को दूर रखें।
आँख का लाल होना, दर्द होना और आँख से पानी आना इसके मुख्य लक्षण हैं. आँख आने पर आँखों में कुछ अटका हुआ सा प्रतीत होता है. इस रोग में आँख खोलने से भी दर्द होता है और रोग के बढ़ने पर गाढ़ा -गाढ़ा पदार्थ भी निकलता है इसलिए रात में पलकें चिपक जाती हैं, जो कि पीड़ादायक है.

यह एक संक्रामक रोग है, यह रोगी के तौलिये या रुमाल के इस्तेमाल से भी फैलता है. आज हम आपको इसके कुछ घरेलू उपचारों से अवगत कराते हैं
Conjunctivitis home remedies
1- मुलहठी को दो घंटे तक पानी में भिगोकर रखें. उसके बाद उस पानी में रुई डुबोकर पलकों पर रखें, ऐसा करने से आँखों की जलन व दर्द में आराम मिलता है.

2 -आधे गिलास पानी में दो चम्मच त्रिफ़ला चूर्ण दो घंटे भिगोकर रखें. अब इसे छान लें, इस पानी से दिन में 3 -4 बार छींटें मारकर आँखें धोने से लाभ होता है.

3 -नीम के पानी से आँख धोने के बाद आँखों में गुलाबजल डालें लाभ होगा.

4 -हरी दूब (घास ) का रस निकालें अब इस रस में रुई भिगोकर पलकों पर रखें, आँखों में ठंडक मिलेगी.

5 -हरड़ को रात भर पानी में भिगोकर रखें. सुबह उस पानी को छानकर उससे आँख धोएं, आँखों की लाली और जलन दूर होगी.

6 -दूध पर जमी मलाई उतार  लें, अब इसे दोनों पलकों पर रख कर ऊपर से रुई रखकर पट्टी बांध दें. यह प्रयोग रात को सोते समय करें, लाभ होगा.

7- प्रातःकाल उठते ही अपना बासी थूक भी संक्रमित आँखों पर लगा सकते हैं.
होमियोपैथिक उपचार :
Homeopathic Treatment for Conjunctivitis
Conjunctivitis

हिपर सल्फ (Hepar Sulph) -आँखें आने पर लाली एवं मवाद बनने के लक्षण दिखाई देना, पलको का सूज जाना एवं उनमे टपटप के साथ दर्द महसूस होना,गर्म वस्तु से सिकाई से आराम, ठंढ से तकलीफ का बढ़ जाना, दिन की अपेक्षा रात एवं प्रातःकाल में तकलीफ का बढ़ना जैसे लक्षणों में हिपर सल्फ ३०,२०० शक्ति लाभप्रद है।
कोनायम (Conium Maculatum) - आँख आ जाने की स्थिति में रोगी का निरंतर आखँ बंद रखने की इच्छा होना, सामान्य रौशनी भी सहन न कर पाना जैसे लक्षणों में इस औषधि की ३० शक्ति लाभकारी है। 
क्रोटेलस (Crotalus) - आँख आ जाने पर नेत्र गोलकों के श्वेत भाग में सूजन आ जाना, रोगी का आँखे न खोल पाना, आँखों का रंग पीला पड़ जाना, रेटिना में सूजन न रहने पर भी रक्त स्राव होना, पलकों के अग्र भाग में दर्द, स्त्रियों की माहवारी का समय बढ़ जाना जैसे लक्षणों में इस दवा की ३०, २०० शक्ति काफी लाभकारी है। 
साइलीशिया (Silicea) - कनीनिका पर अल्सर के छाले  पड़ जाना, सूजन का आ जाना, कनीनिका में मवाद का आना, इसमें छेद हो जाना, आसपास के स्थान का निष्क्रिय हो जाना, पलको के बाल  झड़ जाना, लगातार गुहेरियों का होना आदि लक्षणों में साइलीशिया की २०० शक्ति की दवा बेहद लाभकारी है। 
कैलिआयोड (Calcarea Iodata) - शरीर में उपदंश के कारण आँखों का संक्रमित हो जाना, आँखों में भारीपन एवं दर्द का होना, परे मिश्रित औषधियों के सेवन के कारण  आँखों का प्रभावित हो जाना आदि लक्षणों में इस औषधि की ३० शक्ति लाभकारी है। 
सल्फर ( Sulphur) - पलकों और कनीनिका के बीच घर्षण महसूस होना, रोगी को आँखों के अंदर बालू के कण चुभने जैसा महसूस होना, आंखों का सूज जाना, गर्मी के मौसम में अत्यधिक बेचैनी, अग्नि के सम्पर्क में आने पर दर्द और जलन महसूस होना अदि लक्षणों में सल्फर ३० शक्ति की औषधि लाभप्रद है। 
एपिस मेल ( Apis Mellifica ) - निरंतर जलन और खुजली के कारण आँखों की पलकों में सूजन, आँखों में डंक मरने जैसा दर्द, आँखों के कोने से पीब युक्त श्लेष्मा का निकलना जैसे लक्षणों में एपिस मेल की ३० शक्ति उपयोगी है। आंख की सूजन में एपिस का विशेष लक्षण यह है कि आंख के नीचे की पलक सूज कर पानी के थैले जैसी हो जाती है।
Conjunctivitisइयूफ़्रेसिया आफी (Euphrasia Offi.) - आँख आने की किसी भी अवस्था में इयूफ़्रेसिआ २०० लाभकारी है।  कनीनिका पर फफोले एवं छले पड़ जाना, चिपचिपा स्राव का निकलना, आँखों पर अतिरिक्त दबाव महसूस होना, आंखौं से कड़वा और नाक से गर्म स्राव होते रहना, आँखे चपक जाना, धुंधला दिखाई देना, सूर्य की रौशनी में तकलीफ बढ़ जाने पर इस दवा की १० बून्द मूल अर्क एक गिलास साफ पानी में घोलकर आँखों को धोते रहना चाहिए। इसका आई ड्राप भी मिलता है।
एकोनाइट ( Aconite Nap) - ठंढी हवा के लगते ही पलकों में सूजन का बढ़ जाना, आँखों में प्रदाह के कारण शुष्क और लाल हो जाना, आँखों में गर्मी महसूस होना, रोगी का वात एवं गठिया से ग्रसित आदि लक्षणों में इस दवा की ३० शक्ति लाभकारी है। 
हिपर सल्फ (Hepar Sulph) - आँखों में नेत्र शोथ के कारण स्पर्श एवं ठंढी हवा के प्रति अत्यधिक सवेदनशील हो जाना, पलको का सूज कर लाल हो जाना, नेत्र से अधिक पीले  श्लेष्मा का स्राव होना आदि रहने पर २०० शक्ति की दवा लाभकारी है। 

नोट : ऊपर उल्लेखित मुख्य औषधियों के अतिरिक्त बहुत सारी औषधियां हैं जो लक्षणानुसार प्रयोग की जाती हैं। 


रविवार, 13 सितंबर 2015

A handbook of materia medica and homoeopathic therapeutics (E-Book)


सोमवार, 2 जून 2014

मस्सों का होम्योपैथिक उपचार (Homeopathic remedies for warts)

इसके पहले के अंक में हम मस्सों का घरेलू उपचार के बारे में जानकारी दिया था, आज हम मस्सों का होमियोपैथिक उपचार के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगें। आज होमियोपैथी की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। खास बात यह है की इस पद्धति में रोगी पर लगातार नजर रखते हुए रोग से उत्पन्न शारीरिक और मानसिक लक्षणों के आधार पर ही चिकित्सा की जाती है अर्थात इस पद्धति में बीमारी के आधार पर नही वरन रोगी के तन मन के हालात को देखते हुए चिकित्सा की जाती है।होम्योपैथी 'समः समं, शमयति' के सिद्धांत पर काम करती है, जिसका अर्थ है समान की समान से चिकित्सा अर्थात एक तत्व जिस रोग को पैदा करता है, वही उस रोग को दूर करने की क्षमता भी रखता है।
इस पद्धति के द्वारा रोग को जड़ से मिटाया जाता है।किसी भी बीमारी की चिकित्सा करते समय ---रोगी के धातुगत लक्षण,मानसिक लक्षण और रोग के लक्षणों के साथ जिस दवा के लक्षणों (Majority of symptoms) सबसे अधिक मेल खाता हो,उसी दवा का प्रयोग सर्वप्रथम करना चाहिए। आइये अब हम मस्सों का इलाज होमियोपैथी से करते हैं जो निरापद और लाभकारी है।

थूजा :थूजा एक प्रधान एंटीसाइकोटिक दवाहै। इस औषधि का प्रयोग किसी भी प्रकार के मस्सों में किया जा सकता है। मस्सों के यह सबसे अच्छी औषधि है। मस्सों के झुण्ड निकलने, सिर के पीछे मस्से जैसे दाने होने, ठोड़ी पर मस्से होने, लटकने वाले मस्से होने, खूनी मस्से जिससे कभी-कभी खून निकलता रहता है। इन सभी प्रकार के मस्सों को ठीक करने के लिए थूजा औषधि की 30 और 200  शक्ति का सेवन करना लाभदायक होता है। इन मस्सों में थूजा औषधि के सेवन के साथ-साथ थूजा Q (मूल अर्क ) को रूई पर लगाकर मस्सों पर लगाना चाहिए।
गर्भावस्था के दौरान स्त्री को पहले कुछ दिनों तक सल्फर औषधि की 30 शक्ति का सेवन कराने और फिर कुछ दिनों तक थूजा औषधि की 30 शक्ति का सेवन कराने और अंत में मर्क सौल औषधि की 30 शक्ति सेवन कराने से बच्चे को मस्से नहीं होते। यदि त्वचा पर मस्से गोभी की तरह दिखाई दे तो इस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। योनि के ऊपर -उसमे  दर्द होता है की हाथ लगाया  जाता  स्वर यंत्र के अर्बुद में थूजा काफी लाभप्रद है। 
कैलकेरिया कार्ब : कठोर, नोकदार व चुभने वाले मस्से जिनमें सूजन आने के बाद कभी-कभी जख्म भी बन जाते हैं।चेहरे पर, गर्दन पर, और शरीर के ऊपरी हिस्से के मस्से में लाभकारी।  इस तरह के मस्से को ठीक करने के लिए कैलकेरिया कार्ब औषधि की 12 शक्ति का प्रयोग करना लाभकारी होता। नाक  अर्बुद से रक्तस्राव  होता है। 
नाइट्रिक ऐसिड : फूलगोभी की तरह बड़े खुरदरे मस्से, टेढ़े-मेढ़े मस्से एवं ऐसे मस्से जिसे धोने से बदबूदार खून निकलने लगता हो। छूने  पर भी खून निकलने लगता है।इस तरह के मस्सों में नाइट्रिक ऐसिड औषधि की 12 शक्ति का प्रयोग किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग लटकने एवं होंठों पर मस्से की तरह दाने होने पर भी किया जाता है।
नैट्रम म्यूर : पुराने मस्सेऐसे मस्से जिसमें दर्द हो और मस्से को हल्का सा छू देने पर असहनीय दर्द हो। मस्से कभी-कभी जख्म में बदल जाता है।हाथ और अंगूठे में अनगिनित मस्से, ऐसे लक्षणों वाले मस्सों का उपचार नैट्रम-म्यूर औषधि की 30 शक्ति से फयदेमन्द होता है। यह रक्तहीन,कमजोर और हरित पाण्डु रोग ग्रस्त स्त्रियों की बीमारी में खास रूप से फायदा करती है। 
सल्फर : यदि कठोर एवं दर्द वाले मस्से हो गए हों और उसमें तपकन महसूस होता हो तो सल्फर औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करें।
ऐन्टिम टार्ट : पुरुषों के जननेन्द्रिय की सुपारी के पीछे मस्से हो गए हों तो ऐन्टिम टार्ट औषधि की 12 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
कॉस्टिकम : कास्टिकम एक प्रधान सॉरा-बिष-नाशक और फास्फोरस की विरोधिनी दवा है। अगर शरीर पर छोटे-छोटे बहुत से ठोस मस्से हो गए हों जिसके जड़ मुलायम एवं ऊपर के मुंह कठोर और नोकदार  हो तो ऐसे मस्सों को ठीक करने के लिए कॉस्टिकम औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना लाभकारी होता है। नाखूनों के किनारे, बाहों, हाथों, पलकों एवं चेहरे पर होने वाले मस्सों में भी इस औषधि का उपयोग किया जाता है।
कैलि म्यूर : हाथों पर मस्से होने पर कैलि म्यूर औषधि का सेवन करने के साथ इस औषधि की 3x मात्रा को एक चम्मच पानी में मिलाकर लोशन बनाकर मस्सों पर लगाना भी चाहिए।
सीपिया : जननेन्द्रिय की आगे की त्वचा के अगले भाग या शरीर पर बड़े-बड़े कठोर एवं काले मस्से होने पर सीपिया औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना हितकारी होता है। सीपिया के बाद सल्फर की जरूरत पड़ती है। 
नैट्रम-म्यूर : हथेलियों पर मस्से होने पर नैट्रम-म्यूर औषधि की 3x से 200  शक्ति का सेवन करना लाभकारी होता है।
स्थान विशेष के मस्सों में उपयोगी औषधियाँ :
मुहं में : कास्टिकम, एसिड नाइट्रिकम, थूजा 
भौं में : कास्टिकम,
आँख की पलकों में : एसिड नाइट्रिकम 
आँख के नीचे : सल्फर 
नाक में : थूजा,कास्टिकम 
मुहं के कोने में : काण्डुरैगों 
दाढ़ी में : लाइकोपोडियम 
जीभ पर : आरम  म्यूर 
गर्दन पर : एसिड नाइट्रिकम 
बाहँ पर :कैल्केरिया,कास्टिकम,कास्टिकम,सीपिया,नाइट्रिक एसिड,सल्फर 
तलहथी पर: नैट्रम म्यूर, अनकॉर्डियम 
अंगुली में : कैल्केरिया, कास्टिकम,लैक्सिस, नैट्रम मयूर,नाइट्रिक एसिड,सल्फर,थूजा, सीपिया 
लिंगमुण्ड पर : एसिड नाइट्रिक,एसिड फास, थूजा 
लिंगाग्र चर्म : सिनाबेर,इयूकैलिप् 
"सुझाव और परामर्श सादर आमंत्रित" 
धन्यबाद 

रविवार, 25 मई 2014

मस्सों का घरेलू उपचार (Home remedies for warts)

प्रिये मित्रों मस्सा शब्द से शायद ही आप अनजान हों।मस्से शरीर पर कहीं भी हों खूबसूरती को कम कर देते हैं, विशेषकर चेहरे पर होने वाले मस्से। मस्सा (wart) शरीर पर कहीं कहीं काले रंग का उभरा हुआ मांस का छोटा दाना जो चिकित्सा विज्ञान के अनुसार एक प्रकार का चर्मरोग माना जाता है। यह प्रायः सरसों अथवा मूँग के आकार से लेकर बेर तक के आकार का होता है। यह प्रायः हाथों और पैर पर होता है किन्तु शरीर के अन्य अंगों पर भी हो सकता है।त्वचा पर पेपीलोमा वायरस के कारण छोटे खुरदरे कठोर गोल पिण्ड बन जाते हैं जिसे मस्सा कहते हैं।
मस्से विषाणु संक्रमण से पैदा होते हैं। प्रायः 'मानव पेपिल्लोमैविरस' नामक विषाणु की
कोई प्रजाति इसका कारण होती है। लगभग दस प्रकार के मस्से होते हैं। मस्से संक्रमण (छुआछूत) से हो सकते हैं और शरीर में वहाँ प्रवेश करते हैं जहाँ त्वचा कटी-फटी हो। प्रायः ये कुछ माह में स्वयं समाप्त हो जाते हैं किन्तु कभी-कभी वर्षों तक बने रह सकते हैं या पुनः हो सकते हैं।शरीर पर अनचाहे मस्सों के उग जाने से मन से बार बार यही आवाज आती है कि इन मस्सों से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है। ये मस्से आपकी सुदरता में धब्बा बन कर आपको परेशान कर रहे हैं तो इन आसान उपायों की सहायता से आप इनसे छुटकारा पा सकते हैं। 
१. रोज दो तीन बार प्याज का लेप मस्सों पर करने से ये मस्से जड़ से खत्म हो जाएंगे। प्याज को काट कर मस्से पर घिसना भी लाभप्रद है। 
२. शरीर की त्वचा पर यदि छोटे-छोटे काले मस्से हो गए हों तो उन पर काजू के छिलकों का लेप लगाने से मस्से साफ हो जाते हैं।
3. चूना और घी एक समान मात्रा में लेकर दोनों को खूब फेंटकर सुरक्षित रखें। उसे दिन में 3-4 बार मस्सों पर लगाएं। उससे मस्से जड़ से हट जाएंगे और दूबारा नहीं होंगे।
४. सोडा कास्टिक 6 ग्राम को 250 ग्राम की बोतल में घोलकर सुरक्षित जगह पर रख दें। सावधानी से रूई की सहायता से मस्सों पर लगाएं। मस्सों को दूर करने के लिए यह रामबाण दवा है। 
५. बी काम्पलेक्स, विटामिन ए, सी, ई युक्तआहार के सेवन से मस्सों को दूर किया जा सकता है।मस्सों से छुटकारा पाने के लिए पोटेशियम बहुत लाभदायक है। पोटेशियम बहुत सी साग-सब्जी और फलों में पाया जाता है। जैसे - सेब, केला, अंगूर, आलू, मशरूम, टमाटर, पालक इत्यादि।
६. खट्टी सेब का रस मस्सों पर लगाने से मस्सों के छोटे-छोटे टुकड़े होकर गिर जाएंगे।
७. मुहासे या मस्से हों तो फिटकरी और काली मिर्च आधा-आधा ग्राम पानी में पीसकर मुहा पर मलने से लाभ होता है।
८. बरगद के पेड़ के पत्तों का रस मस्सों के उपचार के लिए बहुत ही असरदार होता है। इस प्रयोग से त्वचा सौम्य हो जाती है और मस्से अपने आप गिर जाते हैं।
९. एक चम्मच कोथमीर के रस में एक चुटकी हल्दी डालकर सेवन करने से मस्सों से राहत मिलती है।
१०. कच्चे आलू का एक स्लाइस नियमित रूप से दस मिनट तक मस्से पर लगाकर रखने से मस्सों से छुटकारा मिल जायेगा।
११. मस्सा खत्म करने के लिए एक अगरबत्ती जला लें और अगरबत्ती के जले हुए गुल को मस्से का स्पर्श कर तुरन्त हटा लें। ऐसा 8-10 बार करें, इस उपाय से मस्सा सूखकर झड़ जाएगा।
१२. ताजा अंजीर लें। इसे कुचलकर -मसलकर इसकी कुछ मात्रा मस्से पर लगावें और ३० मिनिट तक लगा रहने दें फ़िर गरम पानी से धोलें। ३-४ हफ़्ते में मस्से समाप्त होंगे।
१३. केले के छिलके को अंदर की तरफ से मस्से पर रखकर उसे एक पट्टी से बांध लें। और ऐसा दिन में दो बार करें और लगातार करते रहें जब तक कि मस्से ख़तम नहीं हो जाते।
१४. अरंडी का तेल नियमित रूप से मस्सों पर लगायें। इससे मस्से नरम पड़ जायेंगे, और धीरे धीरे गायब हो जायेंगे। अरंडी के तेल के बदले कपूर के तेल का भी प्रयोग कर सकते हैं। 
१५. कलौंजी के कुछ दाने सिरके में पीस कर मस्सों पर लगा कर सो जाए कुछ दिनों में मस्से
कट जायेंगे।
१६. लहसून के एक टुकड़े को पीस लें, लेकिन बहुत महीन नहीं, और इस पीसे हुए लहसून को मस्से पर रखकर पट्टी से बांध लें। इससे भी मस्सों के उपचार में सहायता मिलती है।१७. एक बूँद ताजे मौसमी का रस मस्से पर लगा दें, और इसे भी पट्टी से बांध लें। ऐसा दिन में लगभग 3 या 4 बार करें। ऐसा करने से मस्से गायब हो जायेंगे। 
१८. बंगला, मलबारी, कपूरी, या नागरबेल के पत्ते के डंठल का रस मस्से पर लगाने से मस्से झड़ जाते हैं। अगर तब भी न झड़ें, तो पान में खाने का चूना मिलाकर घिसें। 
१९. अम्लाकी को मस्सों पर तब तक मलते रहें जब तक मस्से उस रस को सोख न लें। या अम्लाकी के रस को मस्से पर मल कर पट्टी से बांध लें।
२०. कसीसादी तेल मस्सों पर रखकर पट्टी से बांध लें।
२१. थूहर का दूध या कार्बोलिक एसिड सावधानीपूर्वक लगाने से मस्से निकल जाते हैं। -मस्सों पर अलो वेरा को दिन में तीन बार लगायें। ऐसा एक सप्ताह तक करते रहें, मस्से गायब हो जायेंगे।
२२. बेकिंग सोडा और अरंडी तेल को बराबर मात्रा में मिलाकर इस्तेमाल करने से मस्से धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं।
२३. हरे धनिए को पीसकर उसका पेस्ट बना लें और इसे रोजाना मस्सों पर लगाएं। 
२४. चेहरे को अच्छी तरह धोएं और कॉटन को सिरके में भिगोकर तिल-मस्सों पर लगाएं। दस मिनट बाद गर्म पानी से फेस धो लें। कुछ दिनों में मस्से गायब हो जाएंगे।
२५. रात को सोते वक्त और सुबह के समय मस्सों पर शहद लगाने के लाभकारी परिणाम मिले हैं।
२६. ग्वार पाठा (एलोवेरा) से मस्से की चिकित्सा की जा सकती है। एलोवेरा के रस में रूई का फ़ाया (काटन बाल) एक मिनट के लिये भिगोएं फ़िर इसे मस्से पर रखें और चिपकने वाली पटी (एढीसिव टेप। से स्थिर कर दें। यह प्रक्रिया दिन में कई बार करना उचित है। ३-४ हफ़्ते में मस्से साफ़ हो जाएंगे।
२७. ताजा अंजीर मसलकर इसकी कुछ मात्रा मस्से पर लगाएं। 30 मिनट तक लगा रहने दें। फिर गुनगुने पानी से धो लें। मस्से खत्म हो जाएंगे।

अगले अंक में मस्सों का होमियोपैथिक उपचार पढ़ें  ……। 

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

"मूत्र रोग में होमियोपैथी" (Homeopathy in Urological Diseases)



हमारा जीवन अनमोल है, दूसरा धन है स्वास्थ्य। स्वस्थ्य व्यक्ति ही सांसारिक सुखो का भरपूर उपयोग कर सकता है,कहा भी गया है की "एक तंदुरस्ती हजार नियामत", अतः प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए की सदैव निरोग रहने का प्रयत्न करता रहे। आज हम मूत्र रोग और इसके होमियोपैथिक चिकित्सा निदान पर चर्चा करेंगे। 

मूत्र का रोग भी हो सकता है, ऐसा कोए निरोग व्यक्ति नही सोच सकता है, लेकिन जिसे यह रोग हो जाता है वहीं काफी परेशान हो जाता है। मूत्र विकार के अंतर्गत कई रोग आते हैं जिनमें मूत्र की जलन, मूत्र रुक जाना, मूत्र रुक-रुककर आना, मूत्रकृच्छ और बहुमूत्र प्रमुख हैं| यह सभी रोग बड़े कष्टदायी होते हैं। यदि इनका यथाशीघ्र उपचार न किया जाए तो घातक परिणाम भुगतने पड़ते हैं। भागदौड की जिन्दगी जीनेवाले लोगों में मूत्र रोग की समस्या होती है। जीवन शैली से यह बीमारी जुड़ गयी है। इसके कारण न सिर्फ मूत्र रोग बल्कि नपुंसकता की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। उन्होंने बताया कि यौन मार्ग की सफाई पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। सफाई के अभाव में संक्रमण होने की संभावना रहती है। ऐसे रोगी जिनके मूत्र मार्ग में 5 मि.मी.से कम आकार की पथरी कोई परेशानी नहीं कर रही है तो चिंता करने की बात नहीं है। ऐसे लोगों को 24 घंटे में इतना पानी पीना चाहिए जिससे कि दो-तीन लीटर पेशाब हो सके।
कारण:
यदि मूत्राशय में पेशाब इकट्ठा होने के बाद किसी रुकावट की वजह से बाहर न निकले तो उसे मूत्रावरोध कहते हैं| स्त्रियों में किसी बाहरी चीज के कारण तथा पुरुषों में सूजाक, गरमी आदि से मूत्राशय एवं मूत्र मार्ग पर दबाव पड़ता है जिससे पेशाब रुक जाता है| वृद्ध पुरुषों की पौरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट ग्लैंड) बढ़ जाती है जिसके कारण उनका मूत्र रुक जाता है|
मूत्रकृच्छ में पेशाब करते समय दर्द होता है| जब मूत्राशय में दर्द उत्पन्न होता है तो पेशाब रुक जाता है| इसी प्रकार हिस्टीरिया (स्त्री रोग), चिन्ता, सिर में चोट लग जाना, आमाशय का विकार, खराब पीना, आतशक, कब्ज, पौष्टिक भोजन की कमी आदि के कारण भी बार-बार पेशाब आता है|मूत्र पथ का संक्रमण समुदाय-प्राप्त हो सकता है या अस्पताल में मूत्र पथ में उपयोग किये जानेवाले उपकरण (मूत्राशय कैथीटेराइजेशन) के जरिये भी प्राप्त हो सकता है। समुदाय-प्राप्त संक्रमण बैक्टीरिया के द्वारा होते है। इनमें सबसे सामान्य जन्तु ‘ई. कोलई’ कहा जाता है। प्रतिरोधी बैक्टीरिया और फंगस (कवक) से अस्पताल-प्राप्त संक्रमण हो सकते हैं।
पहचान:
मूत्र की कमी या न निकलने से मूत्राशय फूल जाता है| रोगी को बड़ी बेचैनी होती है| मूत्र बड़े कष्ट के साथ बूंद-बूंद करके निकलता है| कब्ज, मन्दाग्नि, अधिक प्यास, पेशाब अधिक आने, मूत्र पीला होने आदि के कारण रोगी को नींद नहीं आती| वह दिन-प्रतिदिन कमजोर होता जाता है| कमर, जांघों तथा पिंडलियों में दर्द होता है|
निदान:
इस संक्रमण का पता करने के लिए कई प्रकार के परीक्षण हैं, इनमें सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है मूत्र का विश्लेषण करना। जाँच के लिए मूत्र का नमूना भेजा जाता है। उसमें अगर बैक्टीरिया और श्वेत रक्त कोशिकाओं की मौजूदगी से मरीज़ के संक्रमण से ग्रसित होने का पता लगता है। इसके अलावा भी कई जाँचें कराई जा सकती हैं जैसे टोटल ब्लड काउंट, इंट्रावीनस पायलोग्राम (आईवीपी), सीटी स्कैन और ब्लड कल्चर।
लक्षणानुसार होमियोपैथिक चिकित्सा:
१. डायबिटीज-इसीपीड्स(इसमें चीनी विल्कुल नही रहती) अधिक मात्र में और जल्दी जल्दी पेशाब होने के साथ पेशाब में यूरिया निकलना, उसके साथ प्यास, शीर्णता और बेचैनी रहना। इस तरह के मूत्र सबंधी बीमारी में हेलोनियस ३०,२०० काफी लाभप्रद है। 
२. रात के समय पेशाब का बढ़ना,अधिक मात्रा में पेशाब का होना, दिन में भी बार बार पेशाब का होना साथ ही अधिक प्यास का लगाना आदि लक्षणों में प्लैण्टेगो Q,2X, 3X शक्ति की दवा काफी  लाभप्रद है। 
३. पेशाब होने के पहले और बाद में मूत्र नली में जलन होने पर रोग कोई भी हो वल्गेरिस Q पाँच बून्द दो ५० मिली पानी में मिला कर तीन समय लें, शर्तिया लाभप्रद है। 
४. पेशाब रुक रुक कर होना, मानो मूत्र यंत्र में पक्षाघात हो गया हो।  प्रोस्टेट ग्रंथि की वृद्धि हो गयी हो तो इसके लिए कोनायम ३० का सेवन दिन में तीन बार करने से बीमारी में राहत  मिल जाती है। इस तरह की बीमारी में सेबलसेरु ३० भी काफी लाभप्रद है।
५. पेशाब करते वक्त नही बल्कि अन्य समय में मूत्राशय में जलन होने पर स्टेफिसेग्रिया ३० रामबाण अौषधी का काम करता है।  
६. काइल्यूरिया की बीमारी में पेशाब या तो पानी की तरह बिलकुल साफ रहता है या फिर मैदे की बुकनी की तरह खूब गाढ़ा, दूध या चाय की तरह के रंग वाला होता है। इस तरह की बीमारी में सिट्लिंजिया Q,३,६ शक्ति की दवा काफी लाभप्रद है। 
७. पेशाब का वेग बना रहना, रात के समय ही यह वेग ज्यादा रहना। वेग रहने पर भी मूत्राशय की शक्ति घट जाना, जिस कारण बहुत देर बैठने पर भी पेशाब का धीरे धीरे होना,पेशाब होने के बाद भी बूंद बूंद पेशाब टपका करना, आग की तरह पेशाब का गरम होना लक्षणों में केलि कार्ब ३० शक्ति की दवा का तीन बार चार चार गोली का सेवन करना चाहिए। 
८. पेशाब करते समय जोर लगाना, मूत्रावरोध, जलन, मूत्राशय ग्रीवा में दर्द,मूत्र पथरी निकलने के समय भयंकर दर्द, इसमें बायोकेमिक दवा मैग्नेशिया फास १२X काफी लाभप्रद है।  चार चार गोली ग्राम पानी के साथ लेने से रोग की तीव्रता में लाभदायक सिद्ध होती है। 
९. बहुमूत्र रोग की प्रधान परिक्षित दवा नेट्रम फास १२X है। १०. बहुत मात्रा में पीले रंग का पेशाब का होना, छीकते या खांसते समय, या अनजाने में चलते चलते पेशाब का निकलना, पेशाब करते समय किसी के अगल बगल रहने पर पेशाब का न उतरना, ऐसी परिस्थिति में नेट्रम म्यूर ३X से उच्च शक्ति की दवा काफी लाभप्रद है। 
११. पेशाब में रक्तस्राव, पेशाब में लाल रंग की तलछट, पेशाब में चीनी का होना, आपेक्षिक गुरुत्व घट जाना, मूत्राशय में प्रदाह और स्फीति, सुई चभने सा दर्द रहने पर केलि फास ३X से उच्च शक्ति की दवा का प्रयोग करना चाहिए। 
१२. सर्जिकल आपरेशन होने के बाद पेशाब के बंद होने पर कास्टिकम ३० लाभप्रद है। 
१३. मूत्राशय के भीतर एक प्रकार का दर्द होता है,मानो  मूत्राशय फूल उठा हो बार बार और जल्दी जल्दी पेशाब का होना, पेशाब में बदबू रहती है, रोगी के शरीर पर सूजन आ जाती है और वह सो नही पाता  है, इस तरह की बीमारी में मैजलिस क्यू या ३ शक्ति की दवा का प्रयोग करें चाहिए। 
१४. गर्भवती स्त्रियों के पेशाब में या साधारण पेशाब में एल्बुमेन या फास्फेट रहने पर हेलोनियस ३०, २०० की शक्ति फायदा करती है।
१५. रात में बार बार पेशाब बहुत मात्र में होना,एकाएक इतने जोर से पेशाब का लगना  मानों कपड़े में हो जायेगा,, बिछोने में ही पेशाब का हो जाना और ऐसा समझना की ठीक पेशाब की जगह पर ही पेशाब कर रहें हैं; किन्तु नींद खुलने पर मालूम होना की  था ऐसी स्थिति में क्रियोजोटम ६X शक्ति से १००० शक्ति की दवा का प्रयोग करना चाहिए।  
१६. रोगी को तेज प्यास,शरीर का चमड़ा फीका और सुखा, शरीर में भयानक दाह, रह रह कर पसीना होना, साफ पानी की तरह बार बार पेशाब होना और उसके साथ पतले डीएसटी आना, वमन शोथ इत्यादि लक्षण रहने पर एसिड एसेटिक ३० शक्ति की दवा लाभप्रद है। 
१७. चीनी मिला बहुमूत्र बार बार होना अधिक भूख-प्यास, रोगी का दिन पर दिन दुबला होते जाना पेट में वायु इकठा होना पाकस्थली में जलन रहने पर यूरेनियम नाइट्रिकम २X,६X, ३० शक्ति की दवा लाभकारी होती है।  
१८. सिजिजियम जम्बोलिनम क्यू और २X शक्ति की दवा चीनी मिले बहुमूत्र की प्रधान दवा है। ड़ॉ बोरिक का कथन है- "पेशाब से चीनी का परिणाम घटाने या दूर करनेवाली इसके जोड़ की प्राय कोई दूसरी दवा नही दिखाई देती।"
१९. बहुत चीनी मिला पेशाब, उसके साथ ही अत्यंत पसीना मनो नहा लिया हो इसमें ऐमोन  एसेटिक फायदा करती है। २०. पेशाब में घोड़े की पेशाब की तरह गंध हो, अनजाने में पेशाब हो जाता हो, वाट गठिया की बीमारी हो तो एसिड नाइट्रिक विशेष रूप से लाभप्रद है। 
२१. खून का पेशाब या खून मिला पेशाब होने पर टेरेबिएन्था  लाभप्रद है।

इनके अलावा भी बहुत सारी होमियोपैथिक औषधियाँ हैं जो मूत्र विकार में लाभकारी हैं।यहाँ  सभी का परिचय देना सम्भव नही दिख रहा है। क्योकि बहुत सारे  मित्र यह बोलते हैं की आपका आलेख  बहुत विस्तृत होता है, पर क्या करूँ आधे अधूरे आलेख लिख ही नही पाता। 
धन्यबाद   

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

"पायरिया और उपचार"

दांतों का एक बहुत ही प्रचलित रोग है पायरिया। पायरिया दाँतों की एक गंभीर बीमारी होती है जो दाँतों के आसपास की मांसपेशियों को संक्रमित करके उन्हें हानि पहुँचाती है। यह बीमारी स्वास्थ्य से जुड़े अनेक कारणों से होती है, और सिर्फ दांतों से जुड़ी समस्याओं तक सीमित नहीं होतीं। यह बीमारी दाँतों और मसूड़ों पर निर्मित हो रहे जीवाणुओं के कारण होती है।दांतों की साफ सफाई में कमी होने से जो बीमारी सबसे जल्दी होती है वो है पायरिया। सांसों की बदबू, मसूड़ों में खून और दूसरी तरह की कई परेशानियां। जाड़े के मौसम में पायरिया की वजह से ठंडा पानी पीना मुहाल हो जाता है। पानी ही क्यों कभी-कभी तो हवा भी दांतों को सिहरा देता है।
पायरिया के लक्षण और कारण:
नियमित आहार और दाँतों की रक्षा में रुक्षांस की कमी या पूर्ण रूप से अभाव, दाँतों में खान पान के कण अटकना और दाँतों का सड़ना, दाँतों पर अत्यधिक मैल जमना, मुँह से दुर्गन्ध का निकलना और मुँह में अरुचिकर स्वाद का निर्माण होना, जीवाणुओं का पसरण, मसूड़ों में जलन का एहसास होना और छालों का निर्माण होना, जरा सा छूने पर भी मसूड़ों से रक्तस्राव होना इत्यादि पायरिया के लक्षण होते हैं।असल में मुंह में 700 किस्म के बैक्टीरिया होते हैं। इनकी संख्या करोड़ों में होती है। अगर समय पर मुंह, दांत और जीभ की साफ-सफाई नहीं की जाए तो ये बैक्टीरिया दांतों और मसूड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं। पायरिया होने पर दांतों को सपोर्ट करने वाले जॉ बोन को नुकसान पहुंचता है।
पायरिया के आयुर्वेदिक उपचार:
1. नीम के पत्ते साफ कर के छाया में सुखा लें। अच्छी तरह सूख जाएँ तब एक बर्तन में रखकर जला दें और बर्तन को तुरंत ढँक दें। पत्ते जलकर काले हो जाएँगे और इसकी राख काली होगी। इसे पीसकर कपड़छान कर लें। जितनी राख हो, उतनी मात्रा में सेंधा नमक पीसकर शीशी में भर लें। इस चूर्ण से तीन-चार बार मंजन कर कुल्ले कर लें। भोजन के बाद दाँतों की ठीक से सफाई कर लें। यह नुस्खा अत्यंत गुणकारी है।
2. चुटकी भर सादा नमक चुटकी भर हल्दी में चार पांच बुंद सरसों का तेल मिला कर उंगली से दांतों पर लगाकर 20 मिनट तक रखें लार आवे तो थुकते रहें लिजिये सर पायरिया एक ही दिन में ठीक हो जावेगा तथा ज्यादा ही पुराना है तो 3 दिन लगेगें व रोज करेंगें तो जिदंगी भर वापस नहीं होगा। साथ में त्रिफला गुग्गल की 1 से 3 दिन में तीन बार लें और रात में 1 से 3 ग्राम त्रिफला का सेवन करें।
3. अपने दाँत नीम के दातुन से ब्रश करें।
4. कच्चे अमरुद पर थोडा सा नमक लगाकर खाने से भी पायरिया के उपचार में सहायता मिलती है, क्योंकि यह विटामिन सी का उम्दा स्रोत होता है जो दाँतों के लिए लाभकारी सिद्ध होता है।
5. घी में कपूर मिलाकर दाँतों पर मलने से भी पायरिया मिटाने में सहायता मिलती है।
6. काली मिर्च के चूरे में थोडा सा नमक मिलाकरदाँतों पर मलने से भी पायरिया के रोग से छुटकारा पाने के लिए काफी मदद मिलती है।
7. 200 मिलीलीटर अरंडी का तेल, 5 ग्राम कपूर, और 100 मिलीलीटर शहद को अच्छी तरह मिला दें, और इस मिश्रण को एक कटोरी में रखकर उसमे नीम के दातुन को डुबोकर दाँतों पर मलें और ऐसा कई दिनों तक करें। यह भी पायरिया को दूर करने के लिए एक उत्तम उपचार माना जाता है।
8. आंवला जलाकर सरसों के तेल में मिलाएं,इसे मसूड़ों पर धीरे-धीरे मलें।
9.खस, इलायची और लौंग का तेल मिलाकर मसूड़ों में लगाएं। 
10. जीरा, सेंधा नमक, हरड़, दालचीनी, दक्षिणी सुपारी को समान मात्रा में लें, इसे बंद बर्तन में जलाकर पीस लें,इस मंजन का नियमित प्रयोग करें।

11. सादी तम्बाकू, पर्याप्त मात्रा में लेकर तवे पर काला होने तक भूनें। फिर पीसकर कपड़छान कर महीन चूर्ण कर लें। इसके वजन से आधी मात्रा में सेंधा नमक और फिटकरी बराबर मात्रा में लेकर पीस लें और तीनों को मिलाकर तीन बार छान लें, ताकि ये एक जान हो जाएँ।
इस मिश्रण को थोड़ी मात्रा में हथेली पर रखकर इस पर नीबू के रस की 5-6 बूँदें टपका दें। अब इससे दाँतों व मसूढ़ों पर लगाकर हलके-हलके अँगुली से मालिश करें। यह प्रयोग सुबह और रात को सोने से पहले 10 मिनट तक करके पानी से कुल्ला करके मुँह साफ कर लें।जो तम्बाकू का प्रयोग नहीं करते उन्हें इसके प्रयोग में तकलीफ होगी। उन्हें चक्कर आ सकते हैं। अत: सावधानी के साथ कम मात्रा में मंजन लेकर प्रयोग करें।

12. दशना संस्कार चूर्ण पायरिया के उपचार के लिए एक बहुत ही प्रचलित औषधि है। यह पाउडर मसूड़ों से रक्तस्राव और पस के निर्माण पर नियंत्रण रखता है, और मुँह से दुर्गन्ध हटाने में भी सहायता करता है।
13. गंधक रसायन ५ ग्राम + आरोग्यवर्धिनी बटी ५ ग्राम + कसीस भस्म ५ ग्राम + शुभ्रा(फिटकरी) भस्म ५ ग्राम + सोना गेरू १० ग्राम + त्रिफला चूर्ण २० ग्राम; इन सबको घोंट करके मिला लीजिये। इस पूरी दवा की बराबर वजन की कुल इक्कीस पुड़िया बना लीजिये। सुबह – दोपहर – शाम को एक-एक पुड़िया एक कप पानी में घोल कर मुंह में भर कर जितनी देर रख सकें रखिये फिर उसे निगल लीजिये। 
14. अनार के छिलके पानी मे डाल कर खूब खौला कर ठंडा कर लें । इस पानी से दिन मे तीन चार बार कुल्ले करें । इससे मुंह की बदबू से बहुत जल्द छुटकारा मिल जाएगा ।
15. गरम पानी मे एक चुटकी नमक मिला कर रोज सुबह शाम कुल्ले करने से दांत की तकलीफ मे आराम मिलता है ।
16. बादाम के छिलके तथा फिटकरी को भूनकर फिर इनको पीसकर एक साथ मिलाकर एक शीशी में भर दीजिए। इस मंजन को दांतों पर रोजाना मलने से पायरिया रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
17. पायरिया होने पर कपूर का टुकड़ा पान में रखकर खूब चबाने और लार एवं रस को बाहर निकालने से पायरिया रोग खत्म होता है।
18. 5 से 6 बूंद गर्म पानी में लौंग का तेल 1 गिलास गर्म पानी में मिलाकर प्रतिदिन गरारे व कुल्ला करने से पायरिया रोग नष्ट होता है।
होमियोपैथिक उपचार :होमियोपैथी में Hecla  Lava(हेकला लावा) दाँतों  की बिमारियों के लिए एक उत्कृष्ट औषधि है। मसूढ़ों में फोड़ा, घाव, नासूर(पायरिया), दाँतों में कीड़े लगकर दाँतों में क्षय होना या मसूढ़ों कि हड्डी में घाव (carious teeth), मुँह में स्नायु शूल दर्द, मसूढ़ों के चारो ओर सूजन के साथ दाँतों में शूल का दर्द इत्यादि बिमारियों में हेकला लावा  फायदा करती है। 
पायरिया में इसका टूथ पाउडर भी व्यवहृत  होता है। इसकी 2x शक्ति ग्लासरीन  में मिलाकर दाँतों में लगाना भी चाहिए। 


बचाव और सावधानियाँ :
1. कब्ज़ियत से बचें। गर्म पानी में एप्सम सॉल्ट मिलाकर नहाने की भी सलाह दी जाती है।
2. दिन में दो बार दाँतों को सही और नियमित रूप से ब्रश करना बहुत ज़रूरी होता है। शरीर में मौजूद विषैले तत्वों के निष्काशनके लिए पानी का सेवन भरपूर मात्रा में करें। विटामिन सी युक्त फल, जैसे कि आंवला, अमरुद, अनार, और संतरे का भी सेवन भरपूर मात्रा में करें।
3. पायरिया के इलाज के दौरान रोगी को मसाले रहित उबली सब्ज़ियों का ही सेवन करें।
4. मसालेदार खान पान, जंक फ़ूड और डिब्बाबंद आहार का सेवन बिल्कुल भी न करें। 
चीज़ और दूध के अन्य उत्पादनों का सेवन बिल्कुल भी न करें, क्योंकि इनका दाँतों से चिपकने का खतरा होता है, और जीवाणुओं के बढ़ने में सहायता करते हैं। 
6. धूम्रपान और तम्बाकू के सेवन से भी बचें क्योंकि यह पायरिया की बीमारी को बढाते हैं।
7. पायरिया रोग से पीड़ित रोगी को कभी-भी चीनी, मिठाई या डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों का उपयोग नहीं करना चाहिए। 

बुधवार, 12 मार्च 2014

क्या आपका शिशु सोते हुए बिस्तर पर पेशाब करता है?

शिशुओं का कहीं भी पेशाब कर देना आम बात होती है, खास करके रात में सोते समय नींद में पेशाब करना। यदि ३-४ वर्ष की आयु होने पर भी बच्चा बिस्तर पर पेशाब करे तो यह एक बीमारी मानी जायेगी। यदि इसकी उचित चिकित्सा न की जाए तो बच्चा पाँच वर्ष से ज्यादा उम्र होने पर भी बिस्तर में पेशाब कर  दिया करते हैं। बच्चे को इस बीमारी से बचने के लिए शैशवकाल से हिन् कुछ सावधानियां रखना जरूरी होता है। उसे सोने से पहले शू-शू कि आवाज करते हुए पेशाब करा देनी चाहिए। उन्हें शाम को ८ बजे के बाद ज्यादा पानी नही पिलानी चाहिए।रात 1-2 बजे के लगभग उसे धीरे से जगाइए और शौचालय में ले जाइए, जहाँ उसे पेशाब करने के लिए फुसलाइए या प्रेरित कीजिए। यदि बच्चा नहीं जागता है, तो उसे धीरे से उठाकर शौचालय में ले जाइए और पेशाब कराइए।जिस कमरे में बच्चा सोता है, उस कमरे में रात्रि में मंद लाइट जलाकर रखें, जिससे बच्चा रात्रि में खुद अकेले जाकर बाथरूम में मूत्र का त्याग कर सकें  अगली सुबह जब बच्चा उठे और बिस्तर सूखा मिले तो बिस्तर गीला नहीं करने के लिए उसकी तारीफ करें।  किसी योग्य चिकित्सक से भी सलाह लेने में संकोच न करें। कुछ बच्चों में बिस्तर में पेशाब करने कि आदत सी हो जाती है। इस आदत को दूर करने के लिए बच्चे के साथ अत्यंत स्नेहपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। उसे डांटना,फटकारना, धिक्कारना या शर्मिंदा करना कदापि उचित नहीं है। उसके साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करना चाहिए और धर्यपूर्वक प्यार से समझना चाहिए। यदि बच्चा दस वर्ष की उम्र के बाद भी बिस्तर पर पेशाब करता है, तो फिर किसी बीमारी का पता लगाने के लिए विशेषज्ञ की सेवा लेना जरूरी होता है। इसे उचित चिकित्सा से ठीक क्या जा सकता है। आइये हम कुछ लाभप्रद उपायों पर विचार करते हैं .......

घरलू चिकित्सा : 
१. अगर शिशु बिस्तर में पेशाब करता हो तो एक कप ठण्डे फीके दूध में एक चम्मच शहद मिलाकर सुबह-शाम चालिस दिनों तक पिलाइए और तिल-गुड़ का एक लड्डू रोज खाने को दीजिए। अपने शिशु को लड्डू चबा-चबाकर खाने के लिए कहिए और फिर शहद वाला एक कप दूध पीने के लिए दें। बच्चे को खाने के लिए लड्डू सुबह के समय दें। इस लड्डू के सेवन से कोई नुकसान नहीं होता। अत: आप जब तक चाहें इसका सेवन करा सकते हैं।

२. सोने से पूर्व 1 ग्राम अजवाइन का चूर्ण कुछ दिनों तक नियमित रूप से खिलाएं या अजवाइन को पानी में काढ़ा बनाकर भी सेवन कराया जा सकता है। 

३. जायफल को पानी में घिस कर पाव चम्म्च मात्रा में लेकर एक कप कुनकुने दूध में मिला कर  सुबह शाम पिलाने से भी यह बीमारी दूर हो जाती है। 

४. गूलर के पेड़ की भीतरी छाल ५० ग्राम + पीपल की छाल ५० ग्राम + अर्जुन की छाल ५० ग्राम + सोंठ ५० ग्राम + राई(मोहरी या काली सरसों) २५ ग्राम + काले तिल १०० ग्राम ; इन सबको मिला कर भली प्रकार से महीन कर लें। यदि संभव हो तो इसमें शिलाजीत ५० ग्राम मिला कर दो-दो रत्ती की गोलियां बना लें। इससे बच्चे को दवा लेने में आसानी होगी साथ ही आपका बच्चा एकदम स्वस्थ और पुष्ट बना रहेगा।

आयुर्वेदिक चिकित्सा : 
नवजीवन रस की १-१ गोली सुबह और शाम को दूध के साथ देने से यह व्याधि दूर हो जाती है। 

होमियोपैथिक चिकित्सा : 
इस बीमारी में होमियोपैथी में दो  मुख्य औषधियाँ व्यवहार में लायी जाती है-कैलिफास और  क्रियोजोटम। इनमें से किसी भी दवा को लक्षणानुसार चुन कर  २-३ गोली ३० शक्ति की, दिन में तीन बार बच्चे के मुहँ  में डालकर चूसने के लिए कहें। लाभ होने पर दवा बंद कर  दें।  

"याद रखें आज का बालक ही कल का पालक है"


गुरुवार, 13 जून 2013

होमियोपैथी और कुछ मिथ


होमियोपैथी को लेकर कई तरह के मिथ और गलत अवधारणाएं हैं। कई लोगों को तो होमियोपैथी पर अटूट विश्वास है, जबकि कई अन्य इसे कौड़ी का भाव नहीं देते। इसकी वजह होमियोपैथी से जुड़ी लोगों की गलतफहमी है, जबकि यह दुनिया भर में इलाज की एक जानी-मानी पद्धति है। इस पद्धति को लेकर लोगों की आम गलतफहमियां क्या हैं, और क्या है हकीकत, जानते हैं. होमियोपैथी दुनिया भर में जानी-मानी इलाज पद्धति है, लेकिन इसकी पॉपुलरिटी आज भी एलोपैथी की तुलना में काफी कम है। इसके कारणों में से प्रमुख है इस पैथी को लेकर प्रचलित कुछ मान्यताएं।

देर से असर करने वाली पैथी नहीं है होमियोपैथी
होमियोपैथी को लेकर जो सबसे आम धारणा है, वह यह कि यह बड़ी सुस्त रफ्तार से असर करता है और मरीज को काफी देर से राहत मिलती है। इस मान्यता के उलट, सच यह है कि अगर मरीज के केस का गहराई से अध्ययन कर सही ट्रीटमेंट किया जाए, तो होमियोपैथी तुरंत असरकारी साबित होता है। जब कोई गंभीर बीमारी हो, तो इलाज लंबे समय तक जारी रखना पड़ सकता है। अगर बीमारी काफी पुरानी है और बुरी तरह मरीज को चपेट में ले चुकी है, तो इलाज कई साल भी चल सकता है, क्योंकि हैमियोपैथी में मरीज की स्थिति पर लगातार नजर रखते हुए सावधानी से ट्रीटमेंट किया जाता है। 

पैथॉलजी से ज्यादा जोर साइन और सिम्पटम पर

लोग ऐसा मानते हैं कि होमियोपैथी से इलाज करने वाले डॉक्टर पैथॉलजी में विश्वास नहीं करते। इसीलिए वे मरीज की कोई पैथॉलजिकल जांच वगैरह नहीं करवाते। सच बात यह है कि किसी भी फिजिशियन के लिए सबसे पहले जरूरी है बीमारी को जानना। उसके बाद ही वह बीमारी के सिम्पटम्स, पैथॉलजी, कोर्स, कॉम्प्लिकेशन आदि के बारे में सही जानकारी ले सकता है। होमियोपैथी के तहत इलाज के दौरान मरीज की समस्याओं को उसके संपूर्ण व्यक्तित्व (सायकॉलजिकल व फिजिकल) के संदर्भ में देखा जाता है, न कि सिर्फ समस्याग्रस्त अंगों तक सीमित रहकर। 

स्टेरॉयड्स के प्रयोग की धारणा गलत

आम तौर पर माना जाता है कि होमियोपैथिक फिजिशियंस मरीज का इलाज करने के लिए स्टेरॉयड्स का इस्तेमाल करते हैं। अस्थमा, आर्थराइटिस आदि क्रॉनिक बीमारियों के इलाज को लेकर तो यह मान्यता लोगों में गहराई तक जड़ जमाई हुई है। लेकिन ज्यादातर मामलों में ऐसे मरीजों को पहले ही स्टेरॉयड्स दिए जा चुके होते हैं। होमियोपैथिक फिजिशियंस अपने पास ऐसे केस आने पर केस की डीटेल स्टडी करते हैं और मरीज के सिम्पटम्स व साइन समझने की कोशिश करते हैं। वे मरीज की हेरिडेटरी हिस्ट्री भी स्टडी करते हैं और यह भी समझने की कोशिश करते हैं कि मरीज को अपने आसपास की किन चीजों से परेशानी होती है। तमाम बातों को समझते हुए उसके अनुकूल दवा दी जाती है। ऐसे में स्टेरॉयड्स का अनावश्यक और नियमित इस्तेमाल होमियोपैथी के सिद्धांतों के खिलाफ है और कोई भी एक्सपर्ट डॉक्टर ऐसा नहीं करता। 

मंगलवार, 28 मई 2013

"अल्कोहलिस्म" में होमियोपैथी कारगर

औगुन कहूं सराब का, ज्ञानवंत सुनि लेय
मानुष सों पसुवा करै, द्रव्य गांठि का देय


शराब का उपभोग मजे तथा जीवन का आनंद लेने के साथ जुड़ा हुआ है. लेकिन अत्यधिक मात्रा में गैरजिम्मेवार तरीके से इसका सेवन जीवन को ही दूर कर देता है.शराब की बुरी लत को ‘अल्कोहलिस्म’ कहते हैं. जब कोई इनसान शराब का आदी हो जाये और वह उसके बगैर अपने को कमजोर समझने लगे. किसी भी कीमत पर उसे छोड़ने को तैयार न हो, उसकी कमी उसे हमेशा महसूस होती रहे. उसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहे. ऐसी स्थिति में शराब का सेवन उसके परिवार व स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह होता है.
शराब जो पहले शौक बनती है. फिर आदत और बाद में जरूरत बन कर इनसान को शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, सामाजिक एवं वित्तीय रूप से काफी नुकसान पहुंचाती है. ऐसा हम हमेशा टीवी चैनलों या अखबारों के माध्यम से देखते और पढ़ते हैं कि इनसान ज्यादातर गलत काम शरीब पीकर ही करता है. यहां तक कि बलात्कार जैसी गंदी वारदात भी शराब को पीकर ही करता है. वरना कोई चार/पांच साल तक की बच्चियों का बलात्कार कभी होश में नहीं कर सकता है, शराब ही उसके मानसिक संतुलन को बिगाड़ देती है.

                          जब ऐसी गंदी लत किसी को लग ही जाती है, तब उसे इस दलदल से निकालने का हम चिकित्सकों का कर्त्तव्य हो जाता है कि वह इंसान शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक एवं सामाजिक स्तर पुन: मान-सम्मान पा सके. ऐसी लत को छुड़ाने में होमियोपैथिक दवाइयां काफी कारगर होती है. वशर्ते वह इन्सान दवाओं को दिल से स्वीकार करें. 
शराब की इस बुरी लत को ‘अल्कोहलिस्म’ कहते हैं. जब कोई इनसान शराब का इतना आदी हो जाये कि वह उसके बगैर अपने को कमजोर समझने लगे और किसी भी कीमत पर उसे छोड़ने को तैयार न हो, उसकी कमी उसे हमेशा महसूस होती रहे, उसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहे.

अल्कोहलिस्म यानी शराब की लत का शरीर के विभिन्न अंगों पर क्या असर होता है, पहले यह जान लें.
पाचन तंत्र: सुबह उठते ही उल्टी जैसा लगना, भूख में कमी,अनपच जैसा पतला शौच करना, कभी-कभी मुंह से उल्टी के साथ रक्त जैसा आना, आंत नली का कैंसर तक हो जाना.
यकृत (लीवर): यकृत की कोशिकाओं में चर्बी जमा हो जाना (फैटी लीवर), सिरोसिस लीवर, पेन्क्रियाज में सूजन.
दिमागी तंत्र: यादाश्त में कमी, सोचने, समझने की क्षमता कम हो जाती है.
मांसपेशियां: छाती एवं कमर की मांसपेशियां सूखने लगती है.
अस्थि तंत्र: हड्डियां कमजोर हो जाती है. कैल्शियम, मैग्निशियम, फास्फोरस एवं विटामिन डी की कमी से, हड्डी टूटने पर जुड़ना मुश्किल हो जाता है, हड्डी की मज्जा कमजोर होकर, लाल रक्त कण, श्वेत रक्त कण एवं प्लेटलेट का बनना कम कर देता है.
हारमोनल तंत्र: चीनी की बीमारी हो जाती है, इंसुलीन की कमी से.

हृदय तंत्र: उच्च रक्त दबाव हो जाता है. (हाइ ब्लड प्रेशर)
श्वास नली तंत्र : दमा की शिकायत हो जाती है, क्योंकि प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है.
त्वचा: बैक्टीरिया, फ फूंदी जल्द असर करते हैं और जल्दी समाप्त नहीं होते हैं, क्योंकि प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है. सोरियेसिस जैसा चर्म रोग भी हो सकता है, किडनी की खराबी भी होती है.
मर्दो में नपुंसकता एवं टेस्टीस (अंडकोष) सूख जाते हैं. स्त्रियों में ओवरी एवं बच्चेदानी में खराबी, बच्चा न होना, बार-बार गर्भ गिरना (हेबिचुअल अबोरशन) इत्यादि बीमारी हो जाती है. 

कारगर है होमियोपैथिक दवाइयां

स्टरकुलिया एकुमिनाटा: शरीर में अत्यधिक कमजोरी लगे जैसा हृदय की गति कम हो गयी हो, यह दवा भूख बढ़ाती है और खाना पचाने में सहायक होती है. मुंह का स्वाद ऐसा कर देती है कि शराब की महक से नफरत होने लगती है और उसकी इच्छा को कम कर देती है. 5-10 बूंद अर्क में सुबह-रात आधे कप पानी के साथ लें.

अवेना साटाइवा: मानसिक एवं यौन संबंधी कमजोरी लगे. शराब के बिना एक पल भी रहना मुश्किल लगे. नींद बिल्कुल गायब हो जाये, तब 10 से 20 बूंद मूल अर्क में थोड़ा सुसुम पानी के साथ सुबह-रात लें.

क्यूरीकस ग्लैडियम स्प्रिटस: शराब से पैदा हुए डर बुरे असर को यह दवा काटती है.शराब के प्रति नफरत पैदा करती है, क्योंकि यह दवा लेने के बाद जब भी कोई शराब लेता है, तब उसे उल्टी के जैसा लगता है या उल्टी हो सकती है, इसलिए डर से शराब छोड़ने लगता है. यह दवा 10 बूंद मूल अर्क लेकर एक चम्मच पानी के साथ दिन से चार बार दिन भर लें.
नक्स वोमिका: वैसे स्वभाव के लोग शराब अधिक लेते हों, पतले, चिड़चिड़े हो, जरा सा भी शोर रोशनी और खुशबू बर्दाश्त न होती हो. सुबह उठते ही या खाना खाने के बाद उल्टी के जैसा लगता हो, भूख में बहुत कमी रहती हो और हमेशा शराब की जरूरत महसूस होती है. तब 200 शक्ति की दवा रोज रात में ले. काफी लाभ पहुंचेगा और शराब के द्वारा पैदा सभी खराबियों को सही कर देगा.
कैप्सीकम: वैसे शराब की लतवाले रोगी, जो मोटे शरीर के हों, शारीरिक काम बिल्कुल न करना चाहे और अकेले घर ही में रहना पसंद करते हों (होम सिकनेस) यहां तक की नहाना न चाहें, गंदा रहने की आदत रहे. दोनों हाथों को सीधा रखने पर कंपन रहे (डेलेरियम ट्रेमर). तब 200 शक्ति की दवा रोज सुबह-रात लें.
नोट: दवा का सेवन कम से कम तीन महीने तक करें
बिशेष :एक संगठन ऐसा है जो हमारे चाहने पर हमारी मदद कर सकता है और वो है -एल्कोहलिक एनोनिमस. एल्कोहलिक एनोनिमस एक विश्वव्यापी संगठन है, जिसने पूरी दुनिया में तीस करोड़ से अधिक लोगों की मदद की है. भारत में भी इसके कई केंद्र हैं जो देश भर में फैले हुए हैं. उनसे संपर्क का विवरण निम्न प्रकार है. दूरभाष से संपर्क करने के लिए +919022771011 पर कॉल कर सकते हैं या AAAAआपका नाम, पता तथा दूरभाष संख्या लिखकर 56363 पर एसएमएस कर सकते हैं.

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

होमियोपैथी के प्रति कुछ भ्रांतियाँ



भ्रांति : क्या होमियोपैथी एक अप्रामाणिक चिकित्सा विज्ञान है?
सच : ऐसा बिल्कुल नहीं. कई शोध के बाद यह पाया गया है कि यह चिकित्सा विज्ञान है, क्योंकि इन दवाओं का प्रभाव मानव शरीर पर ही नहीं, बल्कि जानवरों एवं पौधों पर भी पाया गया है. इन्हीं प्रमाणों के आधार पर यह अन्य चिकित्सा प्रणाली के सामान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनायी गयी है.
भ्रांति : होमियोपैथी दवा बहुत धीरे-धीरे असर करती है. रोग को ठीक करने में काफी समय लेती है?
सच : ऐसा बिल्कुल नहीं है. होमियोपैथी दवा की क्रिया निम्न कारणों पर निर्भर है जैसे.. कोई व्यक्ति किसी रोग से अचानक ग्रसित होता है. जैसे संक्रमण, बुखार, सर्दी इत्यादि. ऐसे रोगी को उपयुक्त होमियोपैथी दवा का चयन कर बहुत ही कम समय में रोगमुक्त कर सकते हैं.
पुराने रोग से ग्रसित व्यक्ति को रोगमुक्त करने में कुछ समय लग सकता है, परंतु कुछ पुराने रोग जैसे -एक्जिमा, सराइसिस(त्वचा रोग), अस्थमा, अर्थराइटिस आदि से ग्रसित रोगी यदि दवा का सेवन निरंतर व समय से करें, तो फायदा होगा.
यदि होमियोपैथी दवा का चयन उचित होता है. वह पूर्ण रूप से रोग मुक्त हो जाता है. रोगी को उसकी प्रारंभिक रोगमुक्त अवस्था में ला देता है, परंतु यह स्वाभाविक है कि कुछ समय दवा को कार्य करने में लग सकता है.
भ्रांति : होमियोपैथी प्रारंभ में रोग को बढ़ाती है?
सच : नहीं, ज्यादातर रोगों में ऐसा नहीं होता है. हालांकि, कुछ परिस्थितियों में रोगी होमियोपैथिक दवा खाने के बाद अपने कुछ लक्षणों में वृद्धि होने की शिकायत करता है, जबकि वास्तव में ऐसा होता नहीं है. लक्षणों के बढ़ने के दो कारण हो सकते हैं.

यदि किसी रोगी ने होमियोपैथिक दवा सेवन करने से पहले किसी अन्य चिकित्सा पद्धति का सहारा लिया है, तो उस चिकित्सा के फलस्वरूप, वो अपने रोग को कुछ समय के लिए दबा लेता है, लेकिन रोगमुक्त नहीं करता, परंतु जैसे ही वो होमियोपैथी दवा का सहारा लेता है, तो उसके शरीर में उपस्थित वे सारे लक्षण जो कि नॉन होमियोपैथी दवाओं से दबा कर दिये गये थे, पुन: प्रकट हो जाते हैं. ज्यादातर ऐसी स्थिति चर्म रोग से ग्रसित रोगियों में पायी जाती है, जिन्हें मलहम द्वारा दबा दिया जाता है. यही कारण है कि लोगों में ये धारणा बैठ गयी है कि होमियोपैथी रोग को बढ़ाती है.
दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि जिस उचित होमियोपैथी दवा का चुनाव रोगी के लिए किया गया, उस दवा की शक्ति, रोग की शक्ति से ज्यादा हो गयी, अर्थात जिस शक्ति की दवा की जरूरत रोगी को थी, उस शक्ति की दवा न देकर उस रोगी को उससे ऊंची शक्ति की दवा दे दी गयी. इसके फलस्वरूप एकाएक लक्षणों की तीव्रता बढ़ जाती है, परंतु लक्षणों की तीव्रता लंबे समय तक नहीं रहती और कुछ समय पश्चात अपने आप सामान्य हो जाती है.
भ्रांति : क्या होमियोपैथी से सभी प्रकार के रोग ठीक किये जा सकते हैं?
सच : ऐसा कहना गलत होगा, क्योंकि हर चिकित्सा पद्धति का अपना विस्तार क्षेत्र एवं सीमित दायरा होता है. इसी प्रकार इस चिकित्सा पद्धति के साथ भी है. होमियोपैथी के द्वारा वो सारी समस्याएं जो क्यूट या क्रोनिक डिजीज ठीक की जा सकती है, परंतु यदि कोई बीमारी सजिर्कल है, तो उसके लिए सजिर्कल ही उपाय है.

परंतु कुछ ऐसी भी बीमारियां हैं, जो पूर्ण रूप से सजिर्कल नहीं होतीं जैसे- टांसिल का बढ़ जाना, नाक में मांस बढ़ना, गुर्दे की पत्थरी, मस्सा, बवासीर, भगंदर, मलद्वार में पफटे घाव बच्चेदानी में ट्यूमर, स्तन का ट्यूमर, ओवरी का ट्यूमर इत्यादि. ऐसी बीमारियों का बिना सजिर्कल किये हुए यदि होमियोपैथी चिकित्सा करायी जाये, तो रोगी इन समस्याओं से निजात पा सकता है .
भ्रांति : क्या होमियोपैथी दवा का सेवन करने से दवा का साइट इफेक्ट भी देखने को मिलता है?
सच: होमियोपैथी दवा का सेवन आसानी से किया जा सकता है, क्योंकि इन दवाओं का साइड इफेक्ट नहीं होता. दवा का तात्पर्य उन दवाओं से है, जो किसी विशेष अंग पर ही काम करती है या किसी विशेष अंग-तंत्र पर ही अपना प्रभाव दिखाती है.
जैसे- स्ट्रोप्टोमाइसिन एक एंटी टय़ूबरकूलर ड्रग है, जिसका क्षय रोग में बेहतरीन परिणाम हमें देखने को मिलता है, परंतु साइड इफेक्ट यह है कि ये कान की नस को प्रभावित करती है और बहरापन की समस्या उत्पन्न कर सकती है. होमियोपैथी दवा का चुनाव विशेष अंग या अंग-तंत्र के आधार पर नहीं किया जाता. होमियोपैथी दवा का चुनाव रोगी को ध्यान में रखते हुए उसके सम्मिलित लक्षणों के आधार पर किया जाता है. इसलिए होमियोपैथी चिकित्सा के अंतर्गत विपरीत साइड हमें देखने को नहीं मिलता.
भ्रांति : होमियोपैथी चिकित्सा के दौरान चाय, प्याज, लहसुन, अदरक, हींग आदि का सेवन वजिर्त है ?
सच : यह सत्य नहीं है. प्याज, लहसुन, चाय, कॉफी, पान आदि सभी होमियोपैथी दवा के प्रभाव को नष्ट नहीं करते हैं. कुछ ऐसी चीजें हैं, जो कुछ होमियोपैथी दवा की क्रिया में दखल देते हैं, जैसे-कपूर,अधिक नमक और लहसुन. जब आप कपूर लेते हैं, तो कपूर का उपयोग न करें. Natrium muriaticum दवा लेते हैं, तो ऊपर से अधिक नमक न लें. . Allium sativum दवा लेते समय लहसुन का उपयोग न करें. allium cepa लेते समय प्याज न खाएं. खाने पर परहेज रोग एवं दवा के चयन पर निर्भर करता है. ध्यान रखें कि होमियोपैथी दवा खाने के आधा घंटा पहले और आधा घंटा बाद सुगंधित चीजों को खाने से परहेज करें. यह एक प्रमाणिक तथ्य है कि होमियोपैथी दवा का असर, उन व्यक्तियों में ज्यादा अच्छा देखने को मिला है, जो व्यक्ति धूम्रपान, शराब, गुटखा आदि का सेवन नहीं करते हैं. होमियोपैथी दवा को लेने से पहले मुंह को साफ पानी से साफ कर लेना चाहिए और दवा को साफ जुबान पर ही लेना चाहिए.
चीनी की मात्र नगण्य
भ्रांति : क्या डायबिटिक व्यक्ति होमियोपैथी गोलियों का सेवन कर सकता है?
सच : जी हां, डायबिटीज से पीड़ित व्यक्ति भी इन गोलियों का सेवन कर सकता है, क्योंकि होमियोपैथी गोलियों में चीनी की मात्र न के बराबर होती है.
सेवन कर सकते हैं अंगरेजी दवा के साथ होमियोपैथी
भ्रांति : क्या होमियोपैथी दवाओं का सेवन अंगरेजी दवाओं के साथ किया जा सकता है?
सच: जी हां, होमियोपैथी दवाओं का सेवन कुछ अंगरेजी दवाओं के साथ भी किया जा सकता है जैसे- यदि कोई व्यक्ति जो डायबिटीज के रोगी हैं और इंसुलिन पर निर्भर हैं, तो हम उसका इंसुलिन नहीं बंद करवा सकते, परंतु यदि इस दौरान वह किसी एक्यूट और क्रोनिक डिजीज जैसे एक्जिमा, सराइसिस से ग्रसित होता है, तो हम बिना इंसुलिन बंद कराये होमियोपैथी दवा का प्रयोग कर सकते हैं. रोगी को लाभ मिलता है.
साभार: बिहार राज्य होमियोपैथी चिकित्सा बोर्ड, पटना

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

"माइग्रेन : होमियोपैथिक चिकित्सा"




होमियोपैथी में सिरदर्द और माइग्रेन का लाजवाब इलाज है, जरूरत बस, जरा से लक्षणों पर ध्यान देने की है। यहां हम ऐसे ही तमाम लक्षणों और होमियोपैथिक उपचार की चर्चा कर रहे हैं-सिर की पीड़ा को एक साधारण बीमारी माना जाता है तथा कोई भी ‘पेन-किलर गोली’ खाकर इससे छुटकारा पाने का प्रयास किया जाता है, किन्तु क्या हमने कभी सोचा है कि सिर दर्द स्वयं कोई बीमारी नहीं, बल्कि शरीर की किसी बीमारी का एक लक्षण मात्र है।

लक्षणों के अनुसार ‘माइग्रेन’ का उपचार:-
१. अगर सिर-दर्द अचानक ही उग्र रूप धारण कर लें, लगता हो कि दर्द से सर फट जायेगा। मानो सर पर कई हथौड़ों से वार किया जा रहा हो। रोशनी एवं बातचीत न सुहाती हो। लेटने से सिर दर्द बढ़ जाये एवं बैठने से कम हो। सर के दाहिने हिस्से में पीड़ा हो, तो बेलाडोना 200 की एक बूंद जीभ पर डालते ही मानो जादू हो जायेगा।

२. यदि आधी-शीशी का दर्द सिर के पिछले भाग या गुद्दी से शुरू होकर बांई आंख के ऊपर आकर टिक जाये अथवा सिर के बायें हिस्से में रहे तथा प्रातः काल शुरू होकर दोपहर तक बढ़ जाता हो तो इसे स्पाइजेलिया-30 दिन में 3 बार लेने पर अवश्य ठीक कर देगा।

३. अगर लू लगने से, रसोई में काम करते समय चूल्हे की गर्मी से अथवा बिजली के तेज प्रकाश में कार्य करने से सिर दर्द हो जाये या तकिये पर सिर रखने से दर्द बढ़ जाये। सारे सिर में तथा शरीर में तपकन, हड़कल (पल्सेशन) हो तो ग्लोनॉयन की 30वीं शक्ति का प्रयोग इस रोगी को आश्चर्यचकित रूप से स्वस्थ कर देगा।

४. सिर की गुद्दी में बिजली की लहर (करंट) के समान दर्द हो तथा सिर के दाहिने हिस्से को पकड़ता हो। सिरदर्द रोजाना निश्चित समय पर आता हो। सूर्य की गर्मी के साथ दर्द बढ़ता हो। लेटने अथवा नींद आने से आराम मिलता हो। किसी-किसी रोगी में दर्द दाहिनी आंख पर आकर टिक जाता है- इन लक्षणों पर सेंग्विनेरिया मूल अर्क की पांच-पांच बूंदे चौथाई कप पानी में डालकर दिन में 3 बार लेने पर आधा-शीशी जड़ से चली जाती है।

५. यदि गर्दन या कंधों की मांसपेशियों में ‘अकड़न’ हो तथा कनपटियों में भयंकर दर्द हो जो नाक अथवा ठोढ़ी तक चला जाता हो। सिर दर्द घट जाता हो तो यह जेल्सेसियम का निश्चित क्षेत्र है। इसकी कुछ ही मात्राएं इस प्रकार के ‘माइग्रेन’ को मिटा डालने में समर्थ है।

६. अगर जुकाम दबकर सिर के छोटे-छोटे स्थानों में दर्द ठहर गया हो, आंखों की भौओं को दबाने पर आराम मिलता हो। सिर के एक तरफ ही दर्द हो। दर्द का पूर्वाभास, आंखों के चुंधियाने के रूप में हो तो काली बाईक्रोम-30 दिन में 3 बार एक सप्ताह तक लेना चाहिए। इससे न केवल सिर-दर्द , बल्कि पुराना जुकाम अथवा साइनस का दर्द भी सदा के लिए विदा हो जायेगा।

७. ऐसा ‘सरदर्द’ मानो रोगी अंधा हो जायेगा। प्रातः उठने के साथ ही मानो सिर पर हजारों हथौड़े पर रहे हों। सूर्योदय से दर्द शुरू हो और सूर्य के साथ-साथ बढ़कर सूर्यास्त के समय मिट जाये अथवा घट जाये। रोगी अत्यन्त भावुक एवं संवेदनशीलता प्रकृति का हो अर्थात् जल्दी गुस्सा हो जाता हो अथवा रो पड़ता हो, नमकीन चीजों का प्रेमी हो। सूर्य की गर्मी से डरता हो। सिर दर्द के साथ ही जी मितलाता हो तथा बढ़ने पर उल्टी करता हो तो नेट्रमम्यूर-30 अथवा 200 शक्ति इसकी निश्चित दवा है। कमजोर शरीर वाले स्कूली छात्र-छात्राओं के सिर दर्द की भी यह अचूक औषधि है।

८. रात को सोते-सोते रोगी अचानक सिरदर्द के कारण उठ बैठे तथा भूख से भी तिलमिला उठता हो। नींद खुलने का कारण है-मानो अचानक किसी ने माथे पर चोट दे मारी हो। रोगी को गर्मी के मौसम में भारी सर्दी महसूस होती हो तथा शरीर पर अनावश्यक कपड़े लेपेटे रखता हो। बदन से एक अजीब तरह की दुर्गन्ध आती हो तो सोरिनम-200 की एक या दो मात्राएं दर्द को मिटाकर रोगी का नक्शा ही बदल डालती है।

९. सिर से पिछले हिस्से से उठने वाला दर्द जो पूरे सिर पर फैल जाता हो। सिर पर कपड़ा लपेटने से आराम मिलता हो। ठंडी हवा से सरदर्द बढ़ जाता हो। रोगी को फोड़े-फुंसी, गला पकना आदि बीमारियां समय-समय पर परेशान करती रहती हैं। हाथ-पैर ठंडे रहते हैं। इस ‘ठंडी प्रकृति’ के रोगी को साइलीशिया-30 की 4-4 गोलियां सुबह-शाम अपार शांति प्रदान करने में समर्थ हैं।

१० अगर युवावस्था में सिर में फुंसियां निकली हों जिन्हें दवाइयों से दबा दिया गया हो। इस कारण से भयंकर सिर दर्द होता हो। दर्द में लगता हो जैसे सिर पर हथौड़े चल रहे हों। रक्त संचय के कारण होने वाले सरदर्द में कैलकेरिया कार्ब-30 बेहतरीन औषधि है।

११. खासकर ऐसी महिलाओं में जिन्हें मासिक में रक्तस्राव अधिक होता हो तथा दो मासिक के बीच सिर दर्द की शिकायत हो तो कैलकेरिया कार्ब-30 की एक-एक मात्रा हर तीसरे दिन कुछ दिनों तक देना चाहिए।

१२. एक निश्चित अन्तराल के बाद होने वाला सिरदर्द, जो बांई आंख के ऊपर काटता-सा, शाम को शुरू होकर रात में अपनी तीव्रता के शिखर पर पहुंचता हो, के लिए सल्फर-30 की 4-5 गोली प्रत्येक दो घंटे में जीभ पर रखकर चूसें।

१३. पेट की गड़बड़ी या पुराने कब्ज के कारण भी, जब रक्त का प्रवाह मस्तिष्क की ओर हो जाता है, तब तेज सिरदर्द होने लगता है। इस सिरदर्द में हरकत से रोग बढ़ता है। सिर आगे की ओर झुकाने से लगता है कि सिर फट पड़ेगा। ऐसे में ब्रायोनिया-30 उपयोगी है।

१४. क्रोधी, चिड़चिड़े स्वभाव के ऐसे व्यक्ति जिन्हें वात व्याधि रहती हो, जोड़ों में दर्द होता हो। उनमें सिरदर्द दाहिनी कनपटी में या माथे के एक तरफ से शुरू होता है। कभी-कभी क्रोध करने पर यह दर्द गर्दन और बाजू तक आ पहुंचता है। इसमें ब्रायोनिया-30 मूल अर्क की दो-दो बूंदे निश्चित अंतराल से लेने से लाभ होता है।
१५. इसके अतिरिक्त भी नक्स वोमिका, पल्सटिल्ला, एकोनाइट, नेट्रमसल्फ आदि दवाइयां विभिन्न शक्तियों में चिकित्सक के परामर्शनुसार लेने पर इस रोग को जड़ मूल से मिटाया जा सकता है।

फिर भी  मैं यह कहना चाहूंगा कि हमें ‘सिरदर्द’ को एक साधारण रोग समझ कर इसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। बल्कि इसका कारण जानकर जल्दी से जल्दी इसकी चिकित्सा करानी चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि साधारण-सा ‘सरदर्द’ हमारे लिए ‘मेनिन्जाइटिस’, ‘सिस्टीसरकोसि अथवा ‘ब्रेनट्यूमर’ का रूप धारण कर ले और अत्यन्त गम्भीर अथवा जानलेवा सिध्द हो। 

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