बुधवार, 24 जनवरी 2018

सांस की नली की सूजन (Bronchitis)-Homeopathic treatment of Bronchitis

Homeopathic treatment of Bronchitis
Bronchitis symptoms & treatments - Illnesses & conditions
सर्दियों के मौसम में ठण्डी हवाओं और नमी  के कारण शरीर के विभिन्न अंगों में परेशानियां होती है, इन्हीं में से एक है सांस की नली की सूजन। रोगी की सांस की नली के आगे का हिस्सा जो टेंटुए से आगे फेफड़ों तक जाता है उस पूरी की पूरी नली को सांस की नली कहा जाता है। जब सूजन आवाज की नली से भी आगे गहराई में चली जाती है उस समय जो खांसी उठती है उसे सांस की नली की सूजन कहा जाता है। इसमें रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि सांस की नली में बलगम जमा हुआ है जिसे काफी जोर लगाकर निकालना पड़ता है। सांस नली की दीवारें इंफेक्शन व सूजन की वजह से अनावश्यक रूप से कमजोर हो जाती हैं। इस वजह से इनका आकार नलीनुमा न रहकर गुब्बारेनुमा या फिर सिलेंडरनुमा हो जाता है। कई प्रकार के बैक्टीरिया की प्रजातियां श्वास रोग के मामलों के लिए जिम्मेदार हैं। अगर कोई व्यक्ति अचानक गर्म मौसम से ठण्डे मौसम में पहुंचता है तो अचानक इस बदलाव के कारण रोगी की सांस की नली में सूजन आ जाती है। यह मुख्य रूप से बच्चों में होता है और सूजन वाले वायुमार्ग से साँस लेना मुश्किल होता है। यदि सूजन आगे फेफड़ों में प्रवेश करती है, तो यह निमोनिया पैदा कर सकता है। सांस नली बलगम या सूजन की वजह से संकरी हो जाती है। सिगरेट पीने वालों, फैक्टरी में रसायनों के बीच काम करने वालों और प्रदूषण में रहने वाले लोगों को यह खासतौर पर होती है। सांस की नली में सूजन आने के लक्षणों में रोगी को हल्का-हल्का सा बुखार आता है, ठण्ड लगने लगती है, सूखी खांसी होती रहती है और सांस लेने में रुकावट होती है। अगर रोगी को इन लक्षणों के आधार पर सही उपचार या चिकित्सा न मिले तो उसकी यह सूजन बढ़कर फेफड़ों तक पहुंच जाती है जिसे न्युमोनिया कहा जाता है। रोग के कारगर इलाज के लिए इसके कारणों को ढूंढ़कर और उन पर नियंत्रण करना आवश्यक है। 

How Bronchitis Is Treated


Homeopathic treatment of Bronchitis
What Is Acute and Chronic Bronchitis Symptoms Cure in Hindi

HOMOEOPATHY FOR BRONCHITIS

Top Homeopathic Remedies for bronchitis


सांस की नली की सूजन के रोग मे होमियोपैथिक औषधियों का प्रयोग:

1. ट्युबर्क्युलीनम- सांस की नली की सूजन या फेफड़ों के दूसरे रोग में अक्सर चिकित्सक ट्युबर्क्युलीनम औषधि को सबसे पहले दे देते है क्योंकि उनके मुताबिक इस औषधि से ही रोगी को लाभ मिल जाता है। जिस तरह से सल्फर औषधि को दूसरी औषधियों के बीच-बीच में दे दिया जाता है वैसे ही इसको भी दे सकते है। लेकिन इन दोनों औषधियों में से सिर्फ एक का ही सेवन किया जा सकता है।


2. ब्रायोनिया- रोगी की सांस की नली में दर्द सा होता है जिसके कारण रोगी को ऐसा लगता है जैसे कि उसकी सांस की नली पक गई हो। रोगी अगर ज्यादा तेज आवाज में बोलता है या सिगरेट आदि पीता है तो उसकी खांसी चालू हो जाती है। सांस की नली में दर्द सा होना, ठण्डी हवा से गर्म कमरे में घुसते ही खांसी उठ पड़ना आदि सांस की नली के रोग वाले लक्षणों में ब्रायोनिया औषधि की 30 शक्ति का सेवन करना अच्छा रहता है।

3. ऐन्टिम-टार्ट- रोगी की सांस की नली में सूजन आ जाने के रोग वाले लक्षणों में रोगी की छाती बलगम के मारे हर समय घड़घड़ाती रहती है लेकिन बलगम बहुत कम मात्रा में निकलता है। रोगी को रात में सोते समय इस प्रकार की खांसी होती है जैसे कि उसका दम घुट रहा हो और उसे खांसते-खांसते उठकर बैठना पड़ता है। रोगी की सांस की नलियों में बलगम भरा हुआ रहता है। इस प्रकार के लक्षणों में अगर रोगी को ऐन्टिम-टार्ट औषधि की 3X मात्रा या 30 या 200 शक्ति देना लाभकारी रहता है।

4. फास्फोरस- आवाज की नली तथा सांस की नली में दर्द होने के साथ-साथ अन्दर की ओर जमे हुए बलगम को बाहर निकालने के लिए रोगी को जोर-जोर से खांसना पड़ता है, लेकिन फिर भी रोगी को लगता है कि बलगम तो बाहर निकल ही नहीं रहा। सांस की नली की गहराई में, छाती में, नीचे की तरफ खुरखुरी सी होना, अगर बलगम निकलता है तो वो गाढ़ा सा मवाद वाला निकलता है। जहां से सांस की नली फेफड़ों में जाने के लिए 2 भागों में बंट जाती है उस स्थान पर खुरखुरी सी होने लगती है इस तरह के लक्षणों में रोगी को फास्फोरस या आर्सेनिक ऐल्बम औषधि की 30 शक्ति देने से लाभ मिलता है।


5. फेरम-फॉस- सांस की नली में सूजन के रोगी को जब रोग की शुरुआती अवस्था में किसी प्रकार के लक्षण नजर नहीं आते जैसे उसे बेचैनी महसूस नहीं होती तो ऐकोनाइट औषधि दी जा सकती है। अगर जलन या किसी प्रकार के मानसिक लक्षण उत्पन्न नहीं होते तो बेलाडोना औषधि का सेवन उपयोगी रहता है। फेरम-फास इन दोनों औषधियों के बीच में दी जा सकने वाली औषधि है। इसके अलावा रोगी शरीर से काफी हष्ट-पुष्ट नज़र आता है लेकिन अन्दर से वह बहुत कमजोर होता है। रोगी को सांस लेने में परेशानी होती है, थोड़ी दूर पैदल चलते ही रोगी हांफने लगता है, रोगी को खांसी के साथ खून आने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों में भी फेरम-फॉस औषधि की 3x मात्रा या 3 या 6 शक्ति दी जा सकती है।



6. कार्बो-वेज- अगर सांस की नली के नीचे का हिस्सा खुश्क हो और रोगी को ऐसा महसूस हो जैसेकि उसके ऊपर के भाग में खुरखुरी हो रही है जिसके कारण रोगी को खांसी उठती है। रोगी का गला बैठ जाए, रोग सर्दी के या बरसात के मौसम मे बढ़ जाता है। इस रोग के लक्षण शाम के समय या ज्यादा तेज बोलने से भी बढ़ जाते है। रोगी की जीवन जीने की इच्छा बिल्कुल खत्म हो जाती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को कार्बो-वेज की 30 शक्ति लाभदायक रहती है।

7. नक्स-वोमिका- सांस की नली के ऊपर के भाग में चिपचिपे से बलगम का जमना, सांस की नली के उस भाग में जो वक्षास्थि के पीछे है उसमें खुरखुरी सी होना जिससे रोगी को खांसी शुरू हो जाती है। रोगी जब सांस को बाहर छोड़ता है तो उसकी खांसी शुरू हो जाती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को नक्स-वोमिका औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग कराना उचित रहता है।

8. कैलकेरिया कार्ब- सांस की नली में खुरखुराहट सी होना जैसे वहां पर कोई पंख सा छू रहा हो जिसके कारण रोगी को खांसी उठने लगती है। रोगी जब भोजन करता है तो उसको खांसी होने लगती है ऐसा लगता है जैसे की सांस की नली में कोई चीज अटकी है जिससे खुरखुराहट सी हो रही है। बलगम का बहुत ही कठिनाई से निकलना, ऐसा लगना जैसे कि बलगम का कोई थक्का सांस की नली के कभी ऊपर आता है और कभी नीचे चला जाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को कैलकेरिया कार्ब औषधि की 30 शक्ति का सेवन लाभदायक रहता है।

9. इपिकाक- बच्चे को छोटी उम्र में ही सांस की नली में सूजन आने के रोग के लक्षणों में हर समय खांसी होती रहती है, उसकी सांस सही तरह से नहीं आती, छाती हर समय घड़घड़ाती रहती है, उल्टी आने लगती है। रोगी अगर खांसता है या सांस लेता है तो दोनों ही अवस्थाओं में धड़धड़ की आवाज होती रहती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को इपिकाक औषधि की 3, 30 या 200 शक्ति का सेवन कराना चाहिए। यह औषधि रोगी के गले में जमे बलगम को भी निकाल देता है।

10. कैपसिकम- रोगी जैसे ही रात को सोने के लिए लेटता है उसकी आवाज की नली तथा सांस की नली में ऐसा महसूस होता है जैसे की उसमे कीड़े से रेंग रहे हो, सांस की नली में खुरखुराहट के साथ बार-बार छींके सी आती रहना आदि लक्षणों में रोगी को कैपसिकम औषधि की 3 या 6 शक्ति देना लाभदायक रहता है।

11. सल्फर- सांस की नली में लगातार खुरखुराहट सी होना, रोगी की छाती के अन्दर से सूखी या बलगम वाली खांसी का उठना, रोगी का रोग रात के समय बढ़ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में रोगी को सल्फर औषधि की 30 शक्ति देना लाभदायक रहता है।

12. ऐन्टिम-टार्ट- रोगी की सांस की नली में सूजन आ जाने के रोग वाले लक्षणों में रोगी की छाती बलगम के मारे हर समय घड़घड़ाती रहती है लेकिन बलगम बहुत कम मात्रा में निकलता है। रोगी को रात में सोते समय इस प्रकार की खांसी होती है जैसे कि उसका दम घुट रहा हो और उसे खांसते-खांसते उठकर बैठना पड़ता है। रोगी की सांस की नलियों में बलगम भरा हुआ रहता है। फेफड़े के हर प्रकार के रोग में जब छाती में कफ भरा हो, घड़-घड़ करता हो, चाहे जुकाम हो, ब्रोंकाइटिस हो, क्रूप हो, खासी हो, न्यूमोनिया हो, प्लूरो-न्यूमोनिया हो, तब ऐन्टिम टार्ट प्रमुख औषधि का काम करती हैं। इस प्रकार के लक्षणों में अगर रोगी को ऐन्टिम-टार्ट औषधि की 3X मात्रा या 30 या 200 शक्ति देना लाभकारी रहता है। 

13. स्टैनम- सांस की नली में बलगम जमा होने के कारण खुरखुराहट होने से खांसी उठना, रोगी को जितनी भी बार खांसी होती है हर बार रोगी की सांस की नली के नीचे वाले हिस्से में दर्द सा होता है। सांस की नली में से पीले रंग का, बदबूदार, मीठा सा बलगम आना जैसे लक्षणों में स्टैनम औषधि की 3 या 30 शक्ति देना लाभकारी रहता है।

14. कैनाबिस सैटाइवा- सुबह उठने पर रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसकी सांस की नली में बहुत सारा बलगम जमा हुआ पड़ा है जिसे आसानी से निकाला भी नहीं जा सकता। रोगी अगर ज्यादा खांसता है तो उसकी सांस की नली में दर्द होने लगता है। रोगी के बहुत ज्यादा खांसने पर बलगम ढीला हो जाता है लेकिन रोगी को खांसी लगातार होती रहती है। इन लक्षणों में अगर रोगी को कैनाबिस सैटाइवा औषधि की 3 शक्ति दी जाए तो रोगी को इससे बहुत आराम मिलता है।

विशेष: सांस नली की सूजन में धूम्रपान से बचाना चाहिए, धूल धुऐं से बचाना चाहिए, दूध और इससे बनी चीजों से परहेज करना चाहिए, ज्यादा ठंढ और ज्यादा गर्म स्थानों पर जाने से बचाना चाहिए। सेब के सिरका सेवन करना, हरी सब्जियों का सेवन लाभप्रद होता है। ४ लौंग को आधे ग्लास पानी में उबाल कर गुनगुना ही शहद मिला कर सेवन करना लाभकारी होगा।

बुधवार, 10 जनवरी 2018

बिच्छु डंक का होमियोपैथिक इलाज (Scorpion sting homeopathic treatment)

बिच्छु डंक का होमियोपैथिक इलाज

बिच्छू काटने पर कितना दर्द होता है इसको वहीं जानता है जिसको बिच्छु ने डंक मारा हो। ऐसे तो बहुत सारे घरेलू उपचार हैं परन्तु मैं यहाँ केवल होमियोपैथिक इलाज के बारे में ही चर्चा करूँगा। 
सर्वप्रथम आप  Silicea साइलीसिया २०० शक्ति की दवा १-१ बून्द १०-१० मिनट के अंतराल पर केवल तीन बार दें।  इससे बिच्छु का डंक बाहर आ जायेगा और  आधा कष्ट दूर हो जायेगा। इसके बाद आप निचे लिखे औषधि का सेवन करें। 
Scorpion sting homeopathic treatment
Scorpion sting homeopathic treatment

एपिस, द्रौणा, इचिनेसिया और लीडम पाल
की मूल औषधि यानि Q शक्ति का मिश्रण तैयार करें और १०-१० बून्द पांच पांच मिनट पर रोगी को दें। ज्यादा कष्ट में ५ बून्द दवा 2CC डिसटिल वाटर के साथ मिला कर  काटे स्थान पर त्वचा में इंजेक्ट कर दें।  यह आजमाया और शर्तिया कष्ट को दूर करने में लाभकारी है। 

. धन्यवाद,


शनिवार, 20 मई 2017

"आँख आना" (Conjunctivitis)


Conjunctivitis

सुर्ख लाल गुलाबी आंखें, उनसे रिसता पानी, सूजी हुई पलके, उनका चिपचिपापन ‘आंख आने’ का पर्याय हैं। बोल-चाल की भाषा का यह पर्याय आंख के रोगी होने का सूचक है जिसे चिकित्सा की भाषा में कंजंक्टिवाइटिस कहा जाता है। Conjunctivitis एक आम वायरल इन्फ़ेक्शन है जो कभी-कभी बैक्टीरिया से भी होता है, इसे आम भाषा में आँख आना कहते हैं .इस बीमारी में आखों के उजले भाग पर संक्रमण हो जाता है और इसका रंग लाल हो जाता है। यह संक्रमण एक आदमी से दूसरे तक आसानी से पहुंचता है। हालांकि कई बार धूल, धुंआ और प्रदूषण से भी यह समस्या हो जाती है।इस बीमारी के दौरान संक्रमित इंसान को आंखों में खुजली, धुंधला दिखना जैसी समस्याएं होती हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, दिन में खूब पानी पीना इससे बचने का एक अच्छा उपाय है। इसके अलावा हरी सब्जियों, ताजे फलों का सेवन, अच्छी नींद लेना आदि भी इस बीमारी को दूर रखने में मदद करता है। ठंडी चीजों, जैसे ककड़ी आदि को आखों पर रखने से भी इस मौसम में ताजगी महसूस होती है।
लक्षण :

The eyes feel light prick when the eye comes and it feels like something stuck in the eye. In this disease, pain is also caused by opening an eye and the thickness of the disease also increases due to the disease, so the eyelids stick in the night.
This is an infectious disease. It also spread through the use of patient towels or handkerchief. Today, we are telling you some of its home remedies that you can easily get comfort in this disease.
अचानक एक या दोनों आंखों में जलन आरंभ होती है और किरकिरापन महसूस होता है। आंखें लाल-गुलाबी हो जाती हैं, उनमें सूजन, पानी व मवाद आने की स्थिति प्रकट होती है। सोकर उठने पर पलकों के बाल आपस में चिपके मिलते हैं, आंख खोलना मुश्किल हो जाता है। कभी-कभी दर्द व खाज की भी शिकायत होती है। आंखें थकी सी रहती है, पढ़ना-तेज रोशनी में देखना कठिन हो जाता है। रोग अधिक उग्र होने पर नेत्र-श्लेष्मिका का सूक्ष्म रक्त नाड़ियों से रक्तस्राव भी संभव है।

Symptoms

Bacterial conjunctivitis affects both eyes. The eyes will usually feel gritty and irritated with a sticky discharge.
The eyelids may be stuck together, particularly in the mornings, and there may be discharge or crusting on the eyelashes.

आंख आने` की बीमारी के बचने के कुछ उपाए-
  • संक्रमित आंख को छूने या रगड़ने से बचें।
  • दिन में अपनी आंखों को कई बार ठंडे पानी से धोएं। खासकर दिनभर के काम के बाद घर लौटने पर यह जरूर करें।
  • किसी दूसरे का तौलिया, रूमाल, तकिया, बिस्तर आदि इस्तेमाल करने से बचें।
  • दुपहिया वाहन पर चलते समय हमेशा धूप के चश्मे का इस्तेमाल करें।
  • हमेशा चश्मा पहन कर ही तैराकी करें।
  • जो इस बीमारी से पहले से ही ग्रसित हैं, उनसे दूर रहें।
  • आंखों पर जोर देने वाला कोई काम न करें। घर में बैठकर आराम करें। आपके साथ उनका भी भला होगा, जिनको आपके कारण रोग हो सकता है। प्रभावित आंख के छूने के बाद दरवाजे की चिटकनी, बर्तन, फ्लश की जंजीर आदि को छुएं तो तौलिए के माध्यम से। अन्य लोभ भी रोगी की आंखों से अपनी आंख को दूर रखें।
आँख का लाल होना, दर्द होना और आँख से पानी आना इसके मुख्य लक्षण हैं. आँख आने पर आँखों में कुछ अटका हुआ सा प्रतीत होता है. इस रोग में आँख खोलने से भी दर्द होता है और रोग के बढ़ने पर गाढ़ा -गाढ़ा पदार्थ भी निकलता है इसलिए रात में पलकें चिपक जाती हैं, जो कि पीड़ादायक है.

यह एक संक्रामक रोग है, यह रोगी के तौलिये या रुमाल के इस्तेमाल से भी फैलता है. आज हम आपको इसके कुछ घरेलू उपचारों से अवगत कराते हैं
Conjunctivitis home remedies
1- मुलहठी को दो घंटे तक पानी में भिगोकर रखें. उसके बाद उस पानी में रुई डुबोकर पलकों पर रखें, ऐसा करने से आँखों की जलन व दर्द में आराम मिलता है.

2 -आधे गिलास पानी में दो चम्मच त्रिफ़ला चूर्ण दो घंटे भिगोकर रखें. अब इसे छान लें, इस पानी से दिन में 3 -4 बार छींटें मारकर आँखें धोने से लाभ होता है.

3 -नीम के पानी से आँख धोने के बाद आँखों में गुलाबजल डालें लाभ होगा.

4 -हरी दूब (घास ) का रस निकालें अब इस रस में रुई भिगोकर पलकों पर रखें, आँखों में ठंडक मिलेगी.

5 -हरड़ को रात भर पानी में भिगोकर रखें. सुबह उस पानी को छानकर उससे आँख धोएं, आँखों की लाली और जलन दूर होगी.

6 -दूध पर जमी मलाई उतार  लें, अब इसे दोनों पलकों पर रख कर ऊपर से रुई रखकर पट्टी बांध दें. यह प्रयोग रात को सोते समय करें, लाभ होगा.

7- प्रातःकाल उठते ही अपना बासी थूक भी संक्रमित आँखों पर लगा सकते हैं.
होमियोपैथिक उपचार :
Homeopathic Treatment for Conjunctivitis
Conjunctivitis

हिपर सल्फ (Hepar Sulph) -आँखें आने पर लाली एवं मवाद बनने के लक्षण दिखाई देना, पलको का सूज जाना एवं उनमे टपटप के साथ दर्द महसूस होना,गर्म वस्तु से सिकाई से आराम, ठंढ से तकलीफ का बढ़ जाना, दिन की अपेक्षा रात एवं प्रातःकाल में तकलीफ का बढ़ना जैसे लक्षणों में हिपर सल्फ ३०,२०० शक्ति लाभप्रद है।
कोनायम (Conium Maculatum) - आँख आ जाने की स्थिति में रोगी का निरंतर आखँ बंद रखने की इच्छा होना, सामान्य रौशनी भी सहन न कर पाना जैसे लक्षणों में इस औषधि की ३० शक्ति लाभकारी है। 
क्रोटेलस (Crotalus) - आँख आ जाने पर नेत्र गोलकों के श्वेत भाग में सूजन आ जाना, रोगी का आँखे न खोल पाना, आँखों का रंग पीला पड़ जाना, रेटिना में सूजन न रहने पर भी रक्त स्राव होना, पलकों के अग्र भाग में दर्द, स्त्रियों की माहवारी का समय बढ़ जाना जैसे लक्षणों में इस दवा की ३०, २०० शक्ति काफी लाभकारी है। 
साइलीशिया (Silicea) - कनीनिका पर अल्सर के छाले  पड़ जाना, सूजन का आ जाना, कनीनिका में मवाद का आना, इसमें छेद हो जाना, आसपास के स्थान का निष्क्रिय हो जाना, पलको के बाल  झड़ जाना, लगातार गुहेरियों का होना आदि लक्षणों में साइलीशिया की २०० शक्ति की दवा बेहद लाभकारी है। 
कैलिआयोड (Calcarea Iodata) - शरीर में उपदंश के कारण आँखों का संक्रमित हो जाना, आँखों में भारीपन एवं दर्द का होना, परे मिश्रित औषधियों के सेवन के कारण  आँखों का प्रभावित हो जाना आदि लक्षणों में इस औषधि की ३० शक्ति लाभकारी है। 
सल्फर ( Sulphur) - पलकों और कनीनिका के बीच घर्षण महसूस होना, रोगी को आँखों के अंदर बालू के कण चुभने जैसा महसूस होना, आंखों का सूज जाना, गर्मी के मौसम में अत्यधिक बेचैनी, अग्नि के सम्पर्क में आने पर दर्द और जलन महसूस होना अदि लक्षणों में सल्फर ३० शक्ति की औषधि लाभप्रद है। 
एपिस मेल ( Apis Mellifica ) - निरंतर जलन और खुजली के कारण आँखों की पलकों में सूजन, आँखों में डंक मरने जैसा दर्द, आँखों के कोने से पीब युक्त श्लेष्मा का निकलना जैसे लक्षणों में एपिस मेल की ३० शक्ति उपयोगी है। आंख की सूजन में एपिस का विशेष लक्षण यह है कि आंख के नीचे की पलक सूज कर पानी के थैले जैसी हो जाती है।
Conjunctivitisइयूफ़्रेसिया आफी (Euphrasia Offi.) - आँख आने की किसी भी अवस्था में इयूफ़्रेसिआ २०० लाभकारी है।  कनीनिका पर फफोले एवं छले पड़ जाना, चिपचिपा स्राव का निकलना, आँखों पर अतिरिक्त दबाव महसूस होना, आंखौं से कड़वा और नाक से गर्म स्राव होते रहना, आँखे चपक जाना, धुंधला दिखाई देना, सूर्य की रौशनी में तकलीफ बढ़ जाने पर इस दवा की १० बून्द मूल अर्क एक गिलास साफ पानी में घोलकर आँखों को धोते रहना चाहिए। इसका आई ड्राप भी मिलता है।
एकोनाइट ( Aconite Nap) - ठंढी हवा के लगते ही पलकों में सूजन का बढ़ जाना, आँखों में प्रदाह के कारण शुष्क और लाल हो जाना, आँखों में गर्मी महसूस होना, रोगी का वात एवं गठिया से ग्रसित आदि लक्षणों में इस दवा की ३० शक्ति लाभकारी है। 
हिपर सल्फ (Hepar Sulph) - आँखों में नेत्र शोथ के कारण स्पर्श एवं ठंढी हवा के प्रति अत्यधिक सवेदनशील हो जाना, पलको का सूज कर लाल हो जाना, नेत्र से अधिक पीले  श्लेष्मा का स्राव होना आदि रहने पर २०० शक्ति की दवा लाभकारी है। 

नोट : ऊपर उल्लेखित मुख्य औषधियों के अतिरिक्त बहुत सारी औषधियां हैं जो लक्षणानुसार प्रयोग की जाती हैं। 


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